बात बेबाक चन्द्र शेखर शर्मा की”तलाक़ दे तो रहे हो इताब-ओ-क़हर के साथ , मेरा शबाब भी लौटा दो मेरी महर के साथ ।”

“तलाक़ दे तो रहे हो इताब-ओ-क़हर के साथ ,
मेरा शबाब भी लौटा दो मेरी महर के साथ ।”
हमेशा की तरह साल में एक बार याद करने की परंपरा के साथ अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस की हार्दिक बधाई, शुभकामनाएं…..
अमूनन महिला उत्पीड़न बलात्कार, छेड़छाड़,
दहेज हत्या की खबरों से भरे रहने वाले नामी गिरामी अखबारों , न्यूज़ चैनलों में 8 मार्च अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस पर महिलाओं की शान में कसीदे गढ़े व उनकी हिम्मत औऱ कामो की सराहना करते नारीशक्ति का एकदिवसीय गुणगान किया जाएगा ।
गुजरे बालिका दिवस के बाद आज मुझे फिर “बेटी है तो कल है” “बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ” “नारी तू नारायणी ” के नारों व जुमलों के बीच “काम नहीं कर सकते तो चूड़ीयाँ पहन लो” का जुमला भी याद आ रहा । क्या 21वी सदी की ओर दौड़ते भागते आधुनिक समाज मे महिलाओ की कलाईयों का श्रृंगार , सुहाग के प्रतिक की निशानी इतनी कमजोर और कामचोर है कि कुछ नहीं करने या अकर्मण्यता का प्रतीक बनी हुई है ? चूड़ीयाँ भेंट करना या पहनने का जुमला बना हुआ है । कामचोर नेताओ अधिकारियो को चूड़ीयाँ भेंट करने की खबरे अक्सर सुनने को मिलती है, मैं आज तक नहीं समझ पाया कि आखिर ये जुमला बना क्यों ?
महिला दिवस है तो सवाल पूछना तो बनता है कि आखिर चूड़ियां कमजोरी की निशानी क्यों ? बावजूद इसके अटल सत्य है कि इन्हीं चूड़ी वाले हाथों के बिना गृहस्थी और दुनियादारी का पहिया चलना कठिन ही नहीं असंभव भी है।
वैसे पुरुषवादी समाज भले ही औरत के दुर्गा रूप को पूजता हो पर चाहत हमेशा दासी की रहती है । समाज भी होलिका, सीता ,पद्मावती जैसी औरतों को पूजता है जो जल के मरने को तैयार हों वरना ज़िंदा रहने और लड़ने वाली औरतों को फूलन देवी ,शूर्पणखा ,कुलक्षणा कह हंसता है । आखिर कब तक महिलाएं महज विचार-विमर्श , खबरों और भाषणों की विषय वस्तु बनकर रहेंगी ? अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस के अवसर पर महिलाओं का सम्मान होना अच्छी बात है उनका सम्मान एक ही दिन क्यों रोज़ होना चाहिए । घर की चौखट से चांद होते हुए मंगल तक के सफर , घर के चूल्हा चौका , बच्चे सम्हालने से लेकर ,नौकरी , समाज सेवा और राजनीति के अखाडे तक किसी भी क्षेत्र मे महिलाएं पीछे नही है । कंधा से कंधा मिला के काम करने के बावजूद पुरूष प्रधान समाज महिलाओ की स्वतंत्रता व कंधे से कंधा मिला कर काम कर पाने के जज्बे को पचा नही पा रहा ।
“बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ” के नारे के बीच आज महिला अधिकारों और सम्मान की बात होती है , जगह जगह सरकारी आयोजनों में महिलाओं का सम्मान होता है । इस सम्मान के बीच मुझे कूड़े के ढेर पर फेंक दी गई बच्ची का चेहरा याद आता , याद आता है घर से पिट कर आई महिला टीचर जो अपने बच्चो को उनका अधिकार और कानून की जानकारी देती है । याद उस अबोध बच्ची का चेहरा आता है जो किशोरावस्था में गर्भ में नन्ही सी जान लिए विज्ञान का पाठ प्रजनन और निषेचन के प्रश्नोत्तर रटती परीक्षा की तैयारी करती है , याद उन एसिड अटैक व बलात्कार पीड़िता व परिजनों का चेहरा भी आता है जो न्याय की आस में कानून की खामियों का फायदा उठाते अपराधियो से लोहा लेते अड़ी खड़ी है , याद उन स्कूली बच्चियों की आती है जो प्रशासनिक लापरवाही के चलते स्कूल में सेनेटरी पैड वेंडिंग मशीन लगने के बावजूद सेनेटरी पैड से वंचित शर्मसार हो दाग छुपाते घर लौटती है , याद उस महिला का चेहरा भी आता है जो गृहस्थी की गाड़ी चलाने और बच्चो के सुनहरे भविष्य के सपने संजोए ठेला रिक्शा खिंचते और ऑटो रिक्शा चलाते अक्सर दिख जाती है ,याद उस महिला नेत्री का चेहरा भी आता है जो महिला उत्थान और जागृति की बाते घूंघट में करती है पर खुद घूंघट की बेड़ियों से बाहर नही आ पाती। याद उन रबर स्टेम्प रूपी जनप्रतिनिधि बनी महिलाओं की भी आती है जो दशकों से राजनीति में दिखती तो है पर पहचान के नाम पर आज भी नाम के पीछे पति के नाम का पुछल्ला और पति रूपी प्रतिनिधि चिपका हुआ है । इन सारी बातो के बीच आज कई महिलाएॅ समाज मे अपनी अलग पहचान बना कर समाज के विभिन्न क्षेत्रो मे सफलता पूर्वक अपना नाम रोशन कर रही है किन्तु चिन्ता का विषय है कि इनकी संख्या अब भी उंगलियो में गिनी जा सकने लायक ही है।

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