मोहन भागवत ने कहा कोरोना से पूरी दुनिया जूझ रही है ,जीवन तो चल रहा है स्वयंसेवकों को लगता होगा कि शाखा बंद है , नित्य कार्यक्रम बंद है। ऐसा नहीं है। शाखा भी लग रही है और संघ का काम भी

प्रभात झा

(भाजपा राष्ट्रीय उपाध्यक्ष एवं पूर्व सांसद)

हाल ही में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत ने;वर्तमान परिदृश्य और हमारी भूमिका;
विषय पर अपने विचार प्रस्तुत करते हुए कहा कि कोरोना से पूरी दुनिया जूझ रही है। जीवन तो चल रहा है। स्वयंसेवकों
को लगता होगा कि शाखा बंद है , नित्य कार्यक्रम बंद है। ऐसा नहीं है। शाखा भी लग रही है और संघ का काम भी चल
रही है। बस उसका स्वरुप बदल गया है।
मोहन भागवत जी के उपर्युक्त विचारों को लेकर विश्लेषकों और मेरे कुछ विपक्षी दलों के राजनीतिक मित्र हतप्रभ
है कि ऐसी क्या बात है संघ में कि यह संगठन किसी भी परिस्थिति में अहर्निश सक्रिय रहता है। इस कोरोना काल में भी
संघ सक्रियता के नए आयामों के माध्यम से गतिशील है। सच में संघ अद्भुत है। यह दुनिया का एकमात्र ऐसा संगठन है जो
अपने स्थापना काल से ही दिनो दिन आगे बढ़ रहा है। यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि कुछ लोग संघ की छवि को धूमिल करने में जुटे
रहते हैं। 39;संघ का सच क्या है', इस पर मैंने प्रस्तुत लेख में विचार प्रस्तुत किये हैं। हालांकि न मैं संघ का प्रवक्ता हूं और न
ही संघ का अधिकारी , लेकिन बाल्यकाल से ही संघ से जुड़ा हूं। अतः एक साधारण स्वयंसेवक के नाते इसकी विशेषता पर
अपने अनुभव साझा कर रहा हूं।
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ अपनी अनूठी कार्यपद्धति के कारण विश्व में जाना जाता है। संघ की सबसे बड़ी विशेषता है
कि यह सांस्कृतिक संगठन समाज आधारित है न कि सरकार आधारित। संघ विश्व का ऐसा संगठन है जिसका निरंतर
विकास हो रहा है। नेहरूजी , इंदिराजी और नरसिम्हाराव जैसे तीन-तीन प्रधानमंत्रियों ने अपने-अपने कार्यकाल में तीन-
तीन बार राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ पर प्रतिबंध लगाया पर संघ न रुका , न झुका, न थका, उलटे समाज के सहयोग से
निरंतर बढ़ता ही रहा है।
लोग सोचते हैं कि संघ सतत् अपनें कार्य में कैसे लगा रहता है। शायद उन्हें यह नहीं पता कि यहां सभी राष्ट्र के
स्वयंसेवक के नाते स्वप्रेरणा से कार्य करते हैं। यहां कार्य करने वाले सभी स्वयंसेवक का एक ही भाव होता है 'निःस्वार्थ
भावना। जब सभी का भाव निःस्वार्थ होता है तो टकराहट जन्म ही नहीं ले पाती। 'तेरा तुझको अर्पण क्या लागे मेरा' की
भावना से बढ़ रहा राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का स्वयंसेवक। इस भौतिकवादी समय में लाभ-हानि न सोचकर सतत काम में
लगे रहते हैं। 'देश हमें देता है सबकुछ, हम भी तो कुछ देना सीखें' की स्पष्टता रहती है।
संघ के संस्थापक और आद्य सरसंघचालक डॉ. केशव बलिराम हेडगेवारजी ने सन 1925 को जब
विजयादशमी के दिन नागपुर में प्रथम शाखा शुरू की तो उपस्थित स्वयंसेवकों ने कहा कि आप संघ के गुरु बन जाईये। डॉ.
हेडगेवारजी ने कहा कि हम सबका गुरु व्यक्ति नहीं परमपवित्र भगवाध्वज होगा। यहीं से संदेश चला गया कि संघ व्यक्ति
आधारित नहीं बल्कि विचार आधारित मां भारती के सेवार्थ कार्य करने वाला एक सुदृढ़ सांस्कृतिक संगठन बनेगा। हिंदू
संस्कृति की विजयपताका विश्व में फहराएगा।
देश भर में संघ की सात्विक और आध्यात्मिक प्रभाव बढ़ता देख तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू ने
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को तबसे ज्यादा बदनाम और समाप्त करने की कोशिश की, जब से संघ की प्रेरणा से भारतीय
राजनीति में जनसंघ का जन्म हुआ। उससे पूर्व गांधी हत्याकांड में झूठा आरोप लगाकर जिस तरह से स्वयंसेवकों को यातना

दी गई आज भी रोंगटे खड़े कर देती है। तत्कालीन सरसंघचालक विश्व के सबसे सबलतम आध्यात्मिक पुरुष डॉ. माधव
सदाशिव गोलवलकर “गुरूजी” को जेल तक भेज दिया। संघ पर यातनाओं का दौर चला प्रतिबंध लगा दिया गया। पर सत्य
की जीत हुई। न्यायालय ने कहा कि गांधी ह्त्या में संघ का और संघ के स्वयंसेवकों का कोई लेना-देना नहीं है। कांग्रेस
सहित तत्कालीन शासक को मुंह की खानी पड़ी।
मुझे याद है , एक साक्षात्कार में कांग्रेस के वरिष्ठ नेता वसंत साठे ने मुझे कहा था कि 'मैं समझ ही नहीं पाता कि
संघ का विरोध लोग क्यों करते हैं। उन्होंने यह भी कहा कि 'आपातकाल में मैंने इंदिराजी को कहा था, पर उन्होंने एक नहीं
सुनी।
संघ का कार्य निरंतर चलता रहता है। संघ की स्पष्ट मान्यता है कि संघ शाखा लगाएगा और सवयंसेवक दसों
दिशाओं में समाज के हर क्षेत्र में काम खड़ा करेंगे। सबसे अच्छी बात है कि संघ किसी को अपना प्रतिद्वंदी नहीं मानता। यहां
तक कि संघ को जो अपना दुश्मन मानते हैं उसके बारे में गुरूजी कहा करते थे कि हमारा आज का विरोधी कल का समर्थक
होगा। हमें इसी भाव से काम करना है। संघ संस्कृति और राष्ट्र ध्वज की भावना को लेकर काम करता है।
आज स्थिति क्या है कि देश में मनुष्य को परिवार में मिलने वाले संस्कार के अलावा राष्ट्रीय संस्कार का शिक्षण
कहीं दिया जा रहा है क्या? कहीं नहीं। संघ का प्रमुख उद्देश्य है चरित्र निर्माण करना और मनुष्य को संस्कारवान बनाना।
यही नहीं आज बाल्यकाल से बच्चे अपनी भारतीय संस्कृति में पलें-बढ़ें , अध्ययन करें , इसके लिए संघ की प्रेरणा से विद्या
भारती के मार्गदर्शन में देशभर में लाखों विद्यार्थी सरस्वती शिशु मंदिर के माध्यम से अध्ययन करते हैं।
तरुण विद्यार्थियों के लिए अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद। देश के हिंदू सनातन धर्म के रक्षार्थ विश्व हिंदू
परिषद। मजदूरों के बीच, कर्मचारियों के बीच, शिक्षकों के बीच , समाज के इन वर्गों के बीच काम करने के लिए भारतीय
मजदूर संघ की स्थापना। ये सभी संगठन संघ की प्रेरणा से परंतु अपनी योजना से काम करते हैं। किसानों के बीच काम करने
के लिए भारतीय किसान संघ, वनवासियों के बीच काम करने के लिए वनवासी कल्याण आश्रम, संस्कार भारती, सेवा
भारती, लघु उद्योग भारती, क्रीड़ा भारती, आरोग्य भारती , संस्कृत भारती, प्रज्ञा भारती, विज्ञान भारती, भारत
विकास परिषद, राष्ट्रीय संपादक परिषद, स्वदेशी जागरण मंच , हिंदू स्वयंसेवक संघ, अखिल भारतीय शिक्षण मंडल
जैसे अनेक संस्थान आज के विभिन वर्गों में काम कर रहे हैं।
भारत प्रकाशन , विश्व संवाद केंद्र , दीनदयाल शोध संस्थान, अखिल भारतीय इतिहास संकलन समिति ,
भरतीय विचार केंद्र , राष्ट्रीय सिख संगत, विवेकानंद केंद्र, अखिल भारतीय राष्ट्रीय शैक्षणिक परिषद, अखिल भारतीय
पूर्व सैनिक सेवा परिषद , सहकार भर्ती, ग्राहक पंचायत , सामाजिक समरसता मंच , हिंदू जागरण मंच, अखिल
भारतीय साहित्य परिषद, पर्यावरण समिति , दधीचि देहदान समिति तक संघ की प्रेरणा से चल रहे हैं।
संघ को कोई भी दूर से नहीं समझ सकता। जैसे आंख होते हुए भी लोग कान से राजनीति करते हैं और धोखा खा
जाते हैं, वैसे ही संघ को देखकर ही संघ को समझा जा सकता है। संघ के बारे में सुनकर आश्चर्य ही प्रकट कर सकते हैं।
राष्ट्रपिता बापू, बिनोवा भावे, सरदार वल्ल्भ भाई पटेल, लोकनायक जय प्रकाश सहित अगर अभी की बात करें तो भारत
रत्न प्राप्त डॉ. प्रणव मुख़र्जी ने भी संघ को जब करीब से देखा-समझा तो उनका मन बदला।

संघ की मान्यता है , यहां पद नहीं दायित्व होता है। कोई भी कार्यकर्ता अपरिहार्य नहीं। यही नहीं, मत अनेक हो
सकते हैं पर निर्णय एक। निर्णय के पूर्व विस्तृत चर्चा, निर्णय के बाद सिर्फ उसके संपादन में लगना।
आज तो कोरोना है। आपातकाल में तो हजारों स्वयंसेवक भारत के जेलों में अकारण ठूंस दिए गए थे। अनेक
यातनाएं और अत्याचार स्वयंसेवकों और उनके परिजनों पर किये गए। बावजूद इसके स्वर्गीय दीनानाथ मिश्र ने 'गुप्त क्रांति'
नामक आपातकाल के दौरान भारत के लोकतंत्र की दूसरी लड़ाई में संघ की जो भूमिका थी उसको दर्शाता है। इससे साफ़ हो
जाता है कि संघ को मात्र स्वयंसेवक ही नहीं बल्कि उसका पूरा परिवार ही कार्य में जुटा रहता है। साथ ही परिवार को पता
होता है कि उनका बेटा संघ का माध्यम बनकर राष्ट्रीय कार्य में जुटा हुआ है।
संघ कार्य की नींव में आपसी विश्वसनीयता,आत्मीयता,मानवता और भारतीयता के साथ सबसे बड़ी बात है कि
स्वयंसेवक जैसे देश की पीड़ा को अपनी पीड़ा मानता है वैसे ही स्वयंसेवक पर आई पीड़ा को भी अपने परिवार की पीड़ा
मानता है और उसे दूर करने में तन-मन-धन से लग जाता है। संघ का कार्य अपेक्षा के बीज पर खड़ा नहीं हुआ है।
स्वयंसेवक के रूप में देखें तो अटल बिहारी वाजपेयी पहले स्वयंसेवक थे जो देश के प्रधानमंत्री बने और लालकृष्ण
आडवाणी उपप्रधानमंत्री बने। आज तो देश की जनता ने स्थिति ही बदल दी है। देश में संघ के स्वयंसेवक के नाते भारत के
राष्ट्रपति, उपराष्ट्रपति पूर्व में प्रचारक रहे। पूर्व में प्रचारक रहे नरेंद्र मोदी स्वयं प्रधानमंत्री हैं। साथ ही,ओम बिरला
लोकसभा अध्यक्ष हैं। इतना ही नहीं, देश के केंद्रीय मंत्रिमंडल कई सदस्य, अनेक राज्यों के मुख्यमंत्री और राज्यपाल संघ
से संबंधित हैं। संघ को निश्चय ही यह सब अच्छा लगता होगा , पर वह अपने को आज भी समाज आधारित संगठन ही
मानता है।
संघ जड़ नहीं है बल्कि प्रवाहमान संगठन है। संघ के जितने भी अनुषांगिक संगठन हैं उनमें सभी संगठन आज
भारत में नंबर एक का संगठन है। संघ का कार्य वैश्विक स्तर पर भी है। विश्व के अनेक राष्ट्रों में शाखा लगती है। राष्ट्रीय
सेविका समिति देश की आधी आबादी का प्रतिनिधित्व करते हुए सबसे बड़ी महिला संस्था है।
संघ का कार्य स्वयंसेवक अपने को मिटाकर करता है। यह ऐसा सांस्कृतिक संगठन है जो संघ के स्वयंसेवकों की
'गुरुदक्षिणा' से चलता है। संघ में प्रचारक नाम की एक अद्भुत व्यवस्था है। देशभर में संघ के हज़ारों प्रचारक अपना स्वयं
का जीवन राष्ट्र को यानी मां भारती को समर्पित कर कार्य करते हैं। संघ के कार्य का सबसे मजबूत नैतिक आधार प्रचारक ही
होता है। सरल, सामान्य, नैतिकता, प्रामाणिकता एवं संवेदनशीलता से जुड़कर मानवता भाव से वह सहज ही संघ का
कार्य करता है। संघ कार्य के विस्तार में प्रचारको की सबसे बड़ी भूमिका रहती है। वे अपने बारे मे नहीं बल्कि रात-दिन
भारतमाता को वैभवशाली बनानें मे जुटे रहते हैं।
आज भी लॉकडाउन में संघ का कार्य पूरी तरह चल रहा है। स्वयंसेवक अपने-अपने संघ कार्यालय में, परिवार में
शाखा लगाते हुए राष्ट्र वंदना और संघ की प्रार्थना कर रहे हैं। संघ के स्वयंसेवकों ने लॉकडाउन में बिना प्रचार किये जो सेवा
कार्य भारत के प्रत्येक प्रांत और जिलो में किया है वह सराहनीय है। केरल, तमिलनाडू, आंध्रप्रदेश, तेलंगाना और कर्नाटक
में जिस तरह संघ के स्वयंसेवकों ने भोजन, खाद्यान और वहां रह रहे अन्य प्रांतों के निवासियों की सेवा की है, उसे देखकर
वहां की सरकारें भी हतप्रभ थी। *मानव सेवा* संघ के कार्य का मुख्य आधार है। इस लॉकडाउन में पूरेभारतवर्ष में यह
सभी ने अपनी आखों से देखा है। लोगों को भोजन कराना, ठहराना, खाद्य सामग्री समाज से एकत्रित करके उन्हें उपलब्ध

कराना। जनसेवा के ये कार्य संघ के सभी अनुषांगिक संगठन कर रहे हैं। संघ स्वयं प्रचार-प्रसिद्धि से दूर रहता है। क्योंकि
वह इन सेवाकार्यो को अपना राष्ट्रधर्म मानता है। अनेक स्थानों पर संगोष्ठियां, संघ विचारकों का बौद्धिक, ऑडियो-वीडियो
कॉन्फ़्रेंसिंग से विषयों पर चर्चाएं पूरे भारतवर्ष में चल रहा है। सभी अनुषांगिक संगठनों ने अपने-अपने क्षेत्रों में कार्य प्रारंभ
किया हुआ है। संघ नूतनता को आमंत्रित भी करता है और पुरातनता को सम्मान भी देता है।
संघ कभी नहीं कहता कि हम ही भारत को वैभवशाली बनाएंगे, संघ कहता है कि हम भी भारत को वैभवशाली
बनाने में प्रमुख भूमिका बनाएंगे। संघ को समझना है तो उसे अपनी आखों से देखना होगा न कि कानों से सुनकर। संघ
भारत की सांस्कृतिक प्रकृति है। आज नहीं तो कल इस प्रकृति की गोद में सभी को आना ही होगा।
संघ लम्बे समय से धारा 370 , श्रीराम जन्मभूमि आंदोलन , सामान नागरिक संहिता जैसे मुद्दे पर जन-
जागरण कार्य करता रहा है। आज देश में राष्ट्रीय विचारों की सरकार है। संघ के ये संकल्प बिना किसी व्यवधान के साकार
हो रहे हैं।
संघ की गतिविधियों का आधार है शाखा। देश के सुदूर स्थानों पर भी शाखाएं लगती हैं। लाखों स्थान पर
शाखाओं के माध्यम से व्यक्ति निर्माण साकार होता है। यही कारण है कि देश में जहां कहीं भी आपदाएं आती हैं तो संघ के
स्वयंसेवक सबसे पहले पहुंचकर राहत कार्य में जुट जाते हैं।
संघ भारत की सांस्कृतिक एवं सनातनी आत्मा है। संघ वंदे मातरम है। संघ आध्यात्मिक एवं सांस्कृतिक अनुष्ठान
है। इस पुनीत कार्य रूपी यज्ञ में जो अपनी आहुति देता है, वह धन्य होता है। संघ न किसी का विकल्प है और न संघ का
कोई विकल्प है। संघ तो भारत माता को वैभवशाली बनाने का एक अनवरत चलने वाला लाखों स्वयंसेवकों काअटूट
संकल्प है।

 

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