सावन सोमवार पर विशेष ,जितना ही सादगी से आप शिव की भक्ति करेगे शिव उतना ही अधिक प्रसन्न होगे


ऐसे तो भगवान शिव की आराधना में कुछ भी नहीं लगना है जितना सादगी से आप शिव की भक्ति करेगे शिव उतना ही प्रसन्न होगे। मात्र बेल के पत्ते पर धतुरे के फल और फूल पर शिव प्रसन्न हो जाते हैं। उससे भी सरल शिव सिर्फ शिव लिंग पर एक लोटा जल चढ़ाने से प्रसन्न हो जाते है। किसी रोगी की सेवा से ही आप शिव अंश होने की कृपा प्राप्त कर सकते हैं। इसके अलावा अगर आप कोई नियम और विधि से पूजा कर संतुष्ट होना चाहते हैं तो इस तरह कर सकते है शिव उपसान पूजा
दय से प्रारंभ कर तीसरे पहर तक किया जाता है। शिव पूजा के बाद सोमवार व्रत की कथा सुननी आवश्यक है। व्रत करने वाले को दिन में एक बार भोजन करना चाहिए।

सावन सोमवार को ब्रह्म मुहूर्त में सोकर उठें।पूरे घर की सफाई कर स्नानादि से निवृत्त हो जाएं।
गंगा जल या पवित्र जल पूरे घर में छिड़कें। र में ही किसी पवित्र स्थान पर भगवान शिव की मूर्ति या चित्र स्थापित करें।

पूरी पूजन तैयारी के बाद निम्न मंत्र से संकल्प लें-
सावन सोमवार के व्रत में भगवान शिव और देवी पार्वती की पूजा की जाती है। प्राचीन शास्त्रों के अनुसार सोमवार के व्रत तीन तरह के होते हैं। सोमवार, सोलह सोमवार और सौम्य प्रदोष। इस व्रत को सावन माह में आरंभ करना शुभ माना जाता है।

‘मम क्षेमस्थैर्यविजयारोग्यैश्वर्याभिवृद्धयर्थं सोमव्रतं करिष्ये’

इसके पश्चात निम्न मंत्र से ध्यान करें-

‘ध्यायेन्नित्यंमहेशं रजतगिरिनिभं चारुचंद्रावतंसं रत्नाकल्पोज्ज्वलांग परशुमृगवराभीतिहस्तं प्रसन्नम्‌।
पद्मासीनं समंतात्स्तुतममरगणैर्व्याघ्रकृत्तिं वसानं विश्वाद्यं विश्ववंद्यं निखिलभयहरं पंचवक्त्रं त्रिनेत्रम्‌॥

नमः शिवाय’ से शिवजी का तथा ‘ॐ शिवायै’ नमः से पार्वतीजी का षोडशोपचार पूजन करें।

पूजन के पश्चात व्रत कथा सुनें।

आरती कर प्रसाद वितरण करें।
श्रावण के एक महीने के लिए धर्मनगरी हरिद्वार में भोलेनाथ का साम्राज्य हो जाएगा। दक्षेश्वर बनकर महारुद्र पूरे श्रावण मास अपनी ससुराल कनखल में विराजेंगे। पत्नी सती और अपने ससुर राजा दक्ष को दिया वचन निभाने के लिए आधी रात से शिव का आगमन कनखल में होगा। गुरु पूर्णिमा भोलेनाथ का स्वागत करेंगी। गुरु पूर्णिमा से श्रावण पूर्णिमा तक दक्षेश्वर मंदिर में शिव भक्त जल चढ़ाते रहेंगे।
सृष्टि की रचना ब्रह्मा ने की थी। कनखल के राजा दक्ष उन्हीं ब्रह्मा के पुत्र थे। आदि देव शिव ने दक्ष पुत्री सती से दक्ष की इच्छा के विपरीत विवाह किया था। ब्रह्मा पुत्र दक्ष नहीं चाहते थे कि भस्म रमाने वाले और श्मशान पर साधना करने वाले शिव से वे अपनी पुत्री का विवाह करें। सती की जिद के चलते दक्ष को पुत्री के आगे झुकना पड़ा और सती का विवाह शिव से करना पड़ा। यद्यपि अपने जामाता भूतभावन शिव के सामने दक्ष को झुकना पड़ा। सती शिव की अर्धांगिनी बन गई।
कालांतर में राजा दक्ष ने एक महायज्ञ का आयोजन कनखल के पास यज्ञजीतपुर बसाकर किया। इस यज्ञ में 84 लाख ऋषि-मुनियों और देवी-देवताओं को आमंत्रित किया गया। शिव से बैर रखने वाले दक्ष ने सती और शिव को निमंत्रण नहीं भेजा। शंकर के मना का करने के बावजूद कैलाश पर बैठी सती ने जब पिता के महायज्ञ का आयोजन देखा तो शिव की अनिच्छा से पति से जिद कर सती कनखल आ गई।
शिव का कोई स्थान न देखकर सती जब क्षुब्ध हुई तो दक्ष ने सती का भी अपमान किया। पति के अपमान से क्षुब्ध होकर सती ने दक्ष के यज्ञ कुंड में आत्मदाह कर लिया। जब शिव ने अपने गणों के माध्यम से दक्ष का यज्ञ भंग करा दिया। वीरभद्र ने शिव के आदेश पर दक्ष की गर्दन काट डाली। आगे चलकर देवताओं की प्रार्थना पर शिव ने दक्ष को जीवनदान दिया। दक्ष की प्रार्थना पर शिव ने पूरे श्रावण मास दक्षेश्वर बनकर कनखल में विराजने का वचन दक्ष को दिया। तब से हर श्रावण में भोलेनाथ अपना वचन निभाने के लिए कनखल आते हैं। गुरु पूर्णिमा की रात उनका आगमन हो जाएगा।

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