Wednesday, September 23

हुए तुम  दोस्त जिसके, दुश्मन उसका आसमां क्यों हो

      बादल सरोज

70 और 80 के दशक में एक अमरीकी खुफिया प्लान बड़ी चर्चा का विषय बना था। संसद में भी उसे लेकर बहुत शोर – जाहिर है वामपंथियों और कुछ सोशलिस्ट सांसदों द्वारा – किया गया था। इस खुफिया दस्तावेज का नाम था “प्रोजेक्ट ब्रह्मपुत्र” और इसे अमरीकी विदेश विभाग के साथ मिलकर पेंटागन में बैठे नीति-निर्माताओं ने तैयार किया था। अंतर्राष्ट्रीय कूटनीति में यह एक तरफ उस समय रूस और समाजवादी खेमे के खिलाफ अमरीका द्वारा सारे कस बल लगाकर छेड़े गए शीत-युद्ध और दूसरी तरफ गुटनिरपेक्ष आंदोलन की जोरदार धमक का दौर था। अमरीका कुछ ही साल पहले नन्हे से वियतनाम से बुरी तरह पिट कर लौटा था। मगर जैसे भी हो वैसे पूरी दुनिया पर काबिज होने की उसकी हवस और हर तरह का वर्चस्व हासिल करने की साजिशें खत्म नहीं हुयी थी। हेनरी किसिंजर तब अमरीकी विदेश नीति की धुरी थे, दुनिया भर में युद्ध, अशांति, बिखराव उनका प्रिय शगल था। सीआईए के जरिये एशिया, अफ्रीका और लातीनी अमरीका के नवस्वाधीन देशो में तख्तापलट और प्रगतिशील तथा खुद्दार नेताओं की हत्याएं करवाना उनकी मुख्य कार्यनीति थी। आज भी है। ये वे ही किसिंजर हैं, जिन्होंने अपनी आत्मकथा में भारत और उसके तब के नेताओं को पर्याप्त गरियाया और कोसा है। ये वे ही हैं, जिन्होंने करीब डेढ़ दशक तक दुनिया भर में उत्पात मचाया था, हर अंतर्राष्ट्रीय क़ानून की धज्जियां उड़ाकर हिंसा बरपा की थी। ये वे ही हेनरी किसिंजर हैं, जिनके साथ पिछले साल 23 अक्टूबर को दिल्ली में शिष्य-भाव के साथ खिंचाई अपनी फोटो ट्वीट करते हुए नरेंद्र मोदी भारी गदगद थे और उन्हें “अंतर्राष्ट्रीय राजनीति और कूटनीति का अग्रदूत” – बप्पा महाराज – बता रहे थे। प्रोजेक्ट ब्रह्मपुत्र नाम के इस कुटिल दस्तावेज के सूत्रधार यही किसिंजर थे।

इस खुफिया योजना में उन देशों की शिनाख्त की गयी थी जिनके आगामी 50 वर्षों में इतना विकसित होने की “आशंका” थी कि वे अमरीका को चुनौती देने लायक हो सकते हैं। पेन्टागन, सीआईए और व्हाइट हाउस के चुनिंदा “विशेषज्ञों” की इस खल-मंडली ने ऐसे दो देश शिनाख्त किये थे ; चीन और भारत। गौरतलब है कि उस समय ये दोनों ही देश अपने-अपने तरह की मुश्किलों से जूझ रहे थे। चीन माओ युग की आर्थिक नीतियों और आत्म-अलगाव बढ़ाने वाली विदेश नीति से मुक्त होने और नया मार्ग चुनने की ऊहापोह में था और भारत औद्योगिक ठहराव, रोजगार और कृषि के संकट के नए चक्र और उसके नतीजे में आये राजनीतिक झंझावात से जूझ रहा था। इसके बाद भी इन दोनों देशों को अमरीका के विरुध्द संभावित चुनौती मानने की दो प्रमुख वजहें बताई गयीं थी ; एक इनकी विशाल जनसंख्या, दूसरी इनकी विराट भौगोलिकता। ठीक इन्ही दो देशों को निशाना बनाने और उन्हें खत्म कर देने की रणनीति का नाम प्रोजेक्ट ब्रह्मपुत्र था। सीआईए सहित अमरीकी संस्थाओं को सुझाया गया था कि वे इन देशों के राजनीतिक भूगोल को बदलने के लिए नीतियां बनाएं। भारत के बारे में ठोस सुझाव था कि इसमें धर्म और नस्ल की जितनी भी विविधताएं है, उनके बीच की खाई चौड़ी की जाए। जनता के विभिन्न हिस्सों में टकराव को शह दी जाये, हिन्दू-मुस्लिम समुदायों के बीच तनाव को हवा दी जाए। देश भर में अलग-अलग तरह की पृथकतावादी शक्तियों और आन्दोलनों की हर तरह की मदद की जाए। इसे और सूक्ष्म रूप देते हुए सीमावर्ती राज्यों को ख़ास निशाना बनाने पर विशेष जोर दिया गया था। कश्मीर में अलगाववादियों को प्रश्रय देना, उत्तर-पूर्व के सातों प्रदेशों का यूएसए – यूनाइटेड स्टेट्स ऑफ़ असम – बनाना, गोरखालैंड को शह देना, पंजाब में खालिस्तानी आंदोलन को हर तरह की मदद देना आदि-इत्यादि इसमें साफ़ तौर पर वर्णित थे।

इसके बाद जो हुआ वह ताजा इतिहास है – इस हुए के पीछे कौन था, यह जानकारी अब पूरी तरह से आम हो चुकी है। पाकिस्तान में आतंकी अड्डों में ट्रेनिंग, अफगानिस्तान में तालिबान की ताजपोशी और इस प्रकार के हत्यारे गिरोहों के जरिये तत्ववाद का विस्तार , खालिस्तानी आतंकियों को अमरीका और कनाडा में प्रशिक्षित कर उन्हें असला मुहैया कराने के पीछे अमरीकी लिप्तता अब खुद उनके द्वारा सार्वजनिक की जा चुकी जानकारियों का हिस्सा है, जो एडवर्ड स्नोडेन और जूलियन असांजे के द्वारा अमरीकी गोपनीय दस्तावेजों में सेंध लगाने के पहले ही सामने आ चुकी थी। इसके अलावा साहित्य, संस्कृति और समाज, सूचना तथा वैचारिक प्रसार के अपने माध्यमों के जरिये लाखों करोड़ों डॉलर खर्च किये गए ; अस्मितावाद को उसके विकृततम रूप में पाल पोस कर बड़ा किया गया। बहुत ही योजनाबद्ध तरीके से समाज के वर्चस्वकारी समुदायों, मध्यमवर्ग की कंडीशनिंग की गयी। बचा-खुचा काम नवउदारीकरण-वैश्वीकरण और निजीकरण के नाम पर करवाया गया।

अमरीका की सारी कोशिशों के बावजूद उसकी ब्रह्मपुत्र कुटिल योजना लागू न हो पाई, तो उसकी चार बड़ी वजहें थीं ; पांच हजार साल की साझी विरासत से अर्जित स्वभाव, उपनिवेशवादी गुलामी के विरुध्द भारतीय जनता के जबरदस्त संघर्ष की शानदार परम्परा की ताज़ी स्मृतियाँ, भारत की पूंजी और साम्राज्यवादी पूंजी के बीच के स्वाभाविक अंतर्विरोध और राजनीतिक और सामाजिक दोनों तरह के वामपंथ की भारतीय जनता के बीच प्रभावी उपस्थिति तथा उसके द्वारा चलाया जाने वाला साम्राज्यवाद विरोधी अभियान। मगर आमतौर से नब्बे के दशक और खासतौर से 2014 के बाद इन तीनो में बदलाव आया। 2014 के बाद तो केंद्र की सत्ता में एक ऐसा विचार समूह सत्ता में आकर बैठ गया जिसका ब्रिटिश से लेकर अमरीकी साम्राज्यवाद तक से घनिष्ठ मातहती का रिश्ता रहा। दोनों तरह की पूंजी की सेवा उसकी विचारधारा के केंद्र में रही। साम्प्रदायिक और हिंसक उन्माद उसकी कार्यनीति रही है।

*नतीजा क्या निकला?*
फरवरी के पहले सप्ताह में जब मोगाम्बो भारत में आया, तो सचमुच में खुश हुआ होगा। अपने देश के धूर्तों की इस योजना को व्यवहार में आते हुए देख उसकी बांछें खिल उठी होंगी। डोनाल्ड ट्रम्प नाम के इस मोगाम्बो के भारत दौरे के वक़्त दिल्ली जल रही थी। दो महीने से ज्यादा से असम और उत्तर-पूर्व ठप्प पड़े हुए थे। कश्मीर, जिसे ट्रम्प के अमरीका ने कभी भारत का अभिन्न और अविभाज्य हिस्सा नहीं माना, वह केंद्र सरकार की कैद में था। नागरिकता क़ानून और एनआरसी को लेकर पूरा देश उबला हुआ था और 130 करोड़ लोगों को आपस में एक दूसरे से डरे-डरे एक उन्मादी, साम्प्रदायिक और विभाजित समाज में बदला जा चुका था। उसे अफ़सोस भी हुआ होगा कि इस काम को करने के लिए अमरीकी खजाने से फालतू में ही लाखों करोड़ रुपये खर्च कर मारे, जबकि इसे करने वाले खुद यहीं थे ; उसके अपने ऐसे “ख़ास दोस्त” जिनके देश को सख्त नापसंद करने बावजूद वह उन्हें बहुत पसंद करता था।

यह एक तरह से भेड़ियों द्वारा सबसे बड़े वाले भेड़िये को दिया जा रहा गार्ड ऑफ़ ऑनर था – जिसकी सलामी में तोपों के धमाकों की बजाय लाशों के अम्बार गिने जा रहे थे। इसी दिल्ली के थे मिर्ज़ा ग़ालिब और लगता है इसी तरह की दोस्तियों के लिए लिख गए थे कि :
” ये फित्ना आदमी की खाना-विरानी को क्या कम है
हुए तुम दोस्त जिसके, दुश्मन उसका आसमाँ क्यूँ हो।”

मगर दिल्ली को हिंसक हमलों और कत्लोगारत में डुबो देने के नापाक मंसूबे साधने वाले भूल रहे हैं कि यही दिल्ली थी, जहां 1857 में देश भर से हजारों हिन्दुस्तानी हिन्दू-मुस्लिम, नौजवान सैनिक और किसान, महिलायें आये थे और कभी जिसका सूरज नहीं डूबता था, उन अंग्रेजों के राज को तब कुछ महीनों के लिए और बाद में हमेशा के लिए ऐसा डुबो दिया था कि फिर कभी और कहीं उगने के लायक ही नहीं बचा।

ठीक ट्रम्प के दिल्ली में होने वाले दिन से मोदी-शाह के प्रत्यक्ष संरक्षण और भाजपा-संघ की खुल्लमखुल्ला भागीदारी वाली जो निर्लज्ज और बर्बर, वीभत्स और पाशविक हिंसा हुयी है, उसने उस पूरी दुनिया, जिसे वे अपना बाहुबल और निरंकुशता दिखाना चाहते थे, को भी स्तंभित किया है। मगर ठीक इसी हिंसा और उन्मादी माहौल के बीच दिल्ली की बस्तियों में रहने वाले आम हिन्दुस्तानियों ने जिस एकता और मेलमिलाप का परिचय दिया है, खुद की जान पर खेलकर भी अपने पड़ोसियों को बचाने का उदाहरण प्रस्तुत किया है, वह आश्वस्ति देता है। यह असली हिन्दुस्तान है। देuश भर के अमनपसंद नागरिकों और जनता के जागरूक संगठनों ने इन प्रायोजित हमलों के अँधेरे को चीरने के लिए अपनी आवाज मशाल बनाकर उठाई है। ठीक यही जगार है, जो विघटन और बिखराव, हिंसा और उत्पात के ठेकेदारों को सबसे ज्यादा डराती है, क्योंकि भेड़िये मशाल नहीं जला सकते।

*(लेखक अखिल भारतीय किसान सभा के संयुक्त सचिव हैं।)पाप

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