Thursday, February 2

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सर्दी में गर्मी का अहसास (व्यंग्य : राजेन्द्र शर्मा)
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सर्दी में गर्मी का अहसास (व्यंग्य : राजेन्द्र शर्मा)

कोई हमें बताएगा कि मोदी जी के विरोधियों को सर्दी में ही उनका विरोध करने की क्यों सूझती हैॽ एनआरसी के विरोध के नाम पर शाहीनबाग किया‚ सर्दियों में। किसान बार्डरों पर आकर जम गए‚ तो सर्दियों में। बल्कि किसान तो एक सर्दी में आए‚ तो अगली सर्दी भी आधी काटकर ही उठे। और अब बीबीसी की डॉक्यूमेंट्री रोकने–दिखाने का झंझट हो रहा है‚ तो वह भी सर्दियों में। क्या मोदी जी ने तेल–वेल की कीमतें वाकई इतनी बढ़ी दी हैं कि विरोधियों को सर्दी में गर्मी के एहसास के लिए‚ हर सर्दी जिंदाबाद–मुर्दाबाद करना पड़ रहा है! लगता है कि मोदी जी के विरोध से वाकई गर्मी का एहसास तो होता है‚ तभी तो पट्ठे राहुल गांधी ने तो आधी बाजू के टी–शर्ट में ही इस बार की सर्दी निकाल दी है। खैर! सर्दी से प्राण रक्षा के लिए हो तब भी‚ विरोधियों का सिर्फ विरोध के लिए मोदी जी का विरोध करना तो सही नहीं है। आखिर‚ विरोध का भी कुछ तो सिद्धांत होना चा...
वरिष्ठ पत्रकार जवाहर नागदेव की बेबाक कलम चुनावी साल में मंत्रीजी को आईडिया आया धांसू गणतंत्र दिवस पर अफसर के छलका दिये आंसू
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वरिष्ठ पत्रकार जवाहर नागदेव की बेबाक कलम चुनावी साल में मंत्रीजी को आईडिया आया धांसू गणतंत्र दिवस पर अफसर के छलका दिये आंसू

{बजट बजाएगा .... - एक फरवरी को बजट पेश किया जाएगा। बजट पेश करने से पहले शुभ ‘हलवा सेरेमनी’ का आयोजन किया जाता है। हलवा बनाया जाता है और मिलबांटकर खाया जाता है। तो हलवा बन गया और बंट गया। वित्तमंत्री निर्मला सीतारमन बजट पेश करेंगी। यूं तोे ये हर कोई समझ रहा है कि बजट में काफी सहूलियतें दी जाएंगी। सहूलियत देंगे तभी तो वोट लेंगे न। वैसे भी सरकार की नीयत सदा से जनता के लिये हितकारी रही है। बहरहाल... एक-दो दिन में पता चल जाएगा कि बजट बजाएगा सुख की शहनाई या जनता की पीठ पर ढोल.. }चुनावी साल है भाई। जैसे कत्ल की रात होती है वैसे ही कत्ल का साल है। दांव पर लगाया सारा जीवन इसी पल के लिये। अब चूके तो सब चूके। हर कोई अपने-अपने स्तर पर दांव खेल रहा है। जोर लगा रहा है।  गांधीजी ने आजादी के लिये नारा दिया था ‘करो या मरो’। बस वही स्थिति है। कांग्रेस को लगता है कि बस इस साल और मेहनत कर लें और इतनी मेहनत...
वरिष्ठ पत्रकार जवाहर नागदेव की बेबाक कलम  विज्ञापनों के झूठ की दुनिया किताबों में सहज है समस्या को हल करना लेकिन कठिन है इस पर अमल करना  
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वरिष्ठ पत्रकार जवाहर नागदेव की बेबाक कलम विज्ञापनों के झूठ की दुनिया किताबों में सहज है समस्या को हल करना लेकिन कठिन है इस पर अमल करना  

{इसमें क्या खास बात है.... महासमुंद, कांकेर में अधिकारियों ने अपने रिश्तेदारों को करोड़ों के ठेके दे दिये’ ये खबर छपी। लोग हंस दिये। ये भी कोई खबर है ? अधिकारी, अधिकारी बनते ही क्यों हैं ? कमाई के लिये, मिल-बांटकर खाने के लिये। अब पैसे देकर पोस्टिंग ली है तो पैसे उगाहेंगे नहीं क्या ? कमाई तो करंेगे न, काली ही सही। अब तो जनता इसे बड़े आराम से लेती है, सहज रूप से। यहां तक कि अब चुनाव में कोई पार्टी भ्रष्टाचार को मुद्दा ही नहीं बनाती, बेईमानी की बात ही नहीं करती। जनता भी जीवन भर बेईमान रहे अधिकारियों को रिटायरमेन्ट के बाद नेता भी चुन लेती है... } दुर्ग के एक बड़े व्यापारी ने एक तेल की एजेंसी ली और पेपर में विज्ञापन दिया कि इसे लगाते ही दर्द गायब हो जाता है। यदि राहत न मिले तो खुली शीशी वापस। अपने धुरंधर ने भी रायपुर के एजेन्ट से एक शीशी खरीद ली। घर आकर मां को लगाई लेकिन दो -तीन बार लगाने से भी ...
वरिष्ठ पत्रकार चंद्र शेखर शर्मा की बात बेबाक,, चमत्कार को नमस्कार है –
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वरिष्ठ पत्रकार चंद्र शेखर शर्मा की बात बेबाक,, चमत्कार को नमस्कार है –

आज कल बागेश्वर वाले बाबा चहुओर चर्चित हो चले है , जितना बाबा अपने कामो से चर्चित नही हो पाए थे उससे ज्यादा विरोधियों की उँगलीबाजी से चर्चित हो चले है , अनपढ़ गंवार से लेकर शंकराचार्य , सोशल मीडिया से राष्ट्रीय चैनलों , चमचे से नेता तक कि जुबान में बागेश्वर के धीरेंद्र शास्त्री की पर्ची और चमत्कार के ढोंग ओर आरोप प्रत्यारोप के साथ साथ ढोंग ,चमत्कार और अंध श्रद्धा पर बहस के बीच राष्ट्रवाद और हिंदुत्व के हिलोरें मारते जोश ने नई बहस छेड़ दी है । हर धर्म मे समय के साथ साथ कोई न कोई अच्छाई आई है तो कोई न कोई कमी भी आई है । एक दूसरे के धर्म और संस्कृति को बेहतर बताने की होड़ ने धर्मांतरण जैसे मुद्दे को हवा दी है । हांलाकि लगभग सभी धर्मों में मूल लगभग समान है सिर्फ नाम जगह और रीति में अंतर हों सकते है । धर्मांतरण के विरोधियों पर हमले कोई नई बात नही है । इससे बागेश्वर के धीरेंद्र शास्त्री कैसे बच सकते...
रौद्र और कोमल की जुगलबंदी की जुगत के पीछे क्या है? (आलेख : बादल सरोज)
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रौद्र और कोमल की जुगलबंदी की जुगत के पीछे क्या है? (आलेख : बादल सरोज)

संगीत, भारतीय शास्त्रीय संगीत में स्वर और रागों का एक ख़ास विधान है। स्वर की नियमित आवाज को उसकी निर्धारित तीव्रता से नीचा उतारने पर वह कोमल हो जाता है, थोड़ा ऊंचा उठाने पर वह तीव्र हो जाता है। एक साथ एक ही समय इन दोनों तरह के स्वरों की जुगलबंदी संगीत में बहुत कठिन मानी जाती है। यह श्रोता को रसास्वादन कराने की बजाय उसे भ्रम और मुगालते में डाल देती है। संघ परिवार इन दिनों इसी तरह की बेमेल जुगलबंदी में लगा हुआ है। अभी हाल में भाजपा की राष्ट्रीय कार्यकारिणी बैठक में प्रधानमंत्री मोदी कोमल स्वर में राग गाते नजर आये। उन्होंने फिल्मो पर बयानबाजी करने वाले अपनी ही पार्टी के नेताओं और खासतौर से मध्यप्रदेश के उस गृहमंत्री को फटकारा, जो चौबीस घंटा सातों दिन मुम्बईया फिल्मों के प्रोमो और अभिनेत्रियों के परिधानों को ही निहारता बैठा रहता है। मोदी जी ने कहा, “एक नेता हैं, जो फिल्मों पर बयान देते रहते ...
हल निकलेगा ; जितना गहरा खोदोगे, जल निकलेगा!! (आलेख : बादल सरोज)
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हल निकलेगा ; जितना गहरा खोदोगे, जल निकलेगा!! (आलेख : बादल सरोज)

हाल के दिनों में भारतीय राजनीति का सबसे उल्लेखनीय पहलू उस नैरेटिव - आख्यान - का ध्वस्त होना है, जिसे बड़ी चतुराई और तरतीब से गढ़कर आम बना दिया गया था। यह आख्यान "विपक्ष कहीं दिखता ही नहीं है" से शुरू हुआ था और "विपक्ष कहाँ है" से होता हुआ, अब तो युग-युगों तक "मोदी के सिवा कोई हैईये नहीं" तक जा पहुंचा था। इस आख्यान को गढ़ने के अनेक तरीके अपनाये गए। मीडिया पर प्रभुत्व कायम करके विपक्ष की गतिविधियों की अनदेखी और चुनाव परिणामो सहित बड़े-बड़े घटनाविकासों की चुनिंदा प्रस्तुति इसका एक तरीका था -- विपक्ष, खासकर मुख्य विपक्षी पार्टी कांग्रेस के नेताओं के साथ साम-दाम-दंड-भेद की आजमाइश दूसरा तरीका था। ऐसा नहीं कि इन सबका असर नहीं हुआ। हुआ, मगर उतना ही हुआ, जितना आभासीय घटाटोप का होता है ; अंततः उन्हें खत्म कर वास्तविक रोशनी सामने आ ही जाती है। 2024 अभी दूर है, मगर विपक्ष "कोई उम्मीद बर नहीं आती, कोई सूरत ...
वरिष्ठ पत्रकार जवाहर नागदेव की बेबाक कलम  26 जनवरी: गणतंत्र दिवस पर विशेष  अंधेरे में रखे गये जिन्होंने सतत् जेलों का स्वाद चखा मजे मारे जिन्होंने मखमल के नीचे कदम नहीं रखा
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वरिष्ठ पत्रकार जवाहर नागदेव की बेबाक कलम 26 जनवरी: गणतंत्र दिवस पर विशेष अंधेरे में रखे गये जिन्होंने सतत् जेलों का स्वाद चखा मजे मारे जिन्होंने मखमल के नीचे कदम नहीं रखा

0वरिष्ठ पत्रकार जवाहर नागदेव की बेबाक कलम 026 जनवरी: गणतंत्र दिवस पर विशेष 0अंधेरे में रखे गये जिन्होंने सतत् जेलों का स्वाद चखा मजे मारे जिन्होंने मखमल के नीचे कदम नहीं रखा नेताजी सुभाष चन्द्र बोस की जयंती 23 जनवरी को पड़ती है। नेताजी ने जो देश के लिये किया वो भुलाया नहीं जा सकता। सबसे दिलचस्प बात ये है कि वे ही भारत के पहले प्रधानमंत्री थे। दरअसल वे अखण्ड भारत के पहले प्रधानमंत्री थे। 21 अप्रैल 1943 क 21 अप्रैल 1943 को उन्होंने पद की शपथ ली थी। आज कल्पना करना भी कठिन है कि उस दौर में उन्होंने आजाद हिन्द फौज को खड़ा किया था। इस फौज का अपना पूरा तंत्र था। नेताजी की अपनी पूरी सरकार  थी। अपनी करेंसी थी। अफसोस इस बात का है कि किसी षड्यंत्र के तहत् पूर्व सरकारों ने उन्हें भुलाने की मुहिम चलाई। 2014 में मोदी सरकार आनेे के बाद देश के सामने उनकी काबिलियत को प्रदर्शित किया गया। उनसे संबंधित ...
भारी होती परेड, हल्का पड़ता गणतंत्र (आलेख : राजेंद्र शर्मा)
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भारी होती परेड, हल्का पड़ता गणतंत्र (आलेख : राजेंद्र शर्मा)

भारतीय गणतंत्र अपने तिहत्तर साल पूरे करने के बाद आज वास्तव में किस दशा में है, इसकी तस्वीर पूरी करने के लिए, बस इमरजेंसी की याद दिलाया जाना ही बाकी रहता था। और उसकी भी याद चौहत्तरवें गणतंत्र दिवस की ऐन पूर्व-संध्या में बीबीसी की डॉक्यूमेंटरी को भारत के लोगों तक पहुंचने से रोकने के लिए, मोदी सरकार द्वारा उठाए गए अन्यायी कदमों ने पूरी कर दी है। 2002 के आरंभ में, गोधरा ट्रेन आगजनी के बाद, जिसमें 59 लोगों की एक बोगी में जलकर मौत हो गई थी, नरेंद्र मोदी के मुख्यमंत्रित्व में गुजरात के बड़े हिस्से में, मुस्लिम अल्पसंख्यकों का जिस तरह का सुनियोजित तथा शासन-समर्थित नरसंहार हुआ था, उस पर बीबीसी द्वारा बनाई गई, दो-खंड की डॉक्यूमेेंटरी, 'इंडिया: दि मोदी क्वेश्चन' के अब तक प्रसारित पहले ही खंड को, भारतवासियों तक पहुंचने से रोकने के लिए मोदी सरकार ने, एक लोकसभा सदस्य का चर्चित जुमला उधार लें तो, 'युद...
भारत माता बनी डैमोक्रेसी की मम्मी! (व्यंग्य : राजेंद्र शर्मा)
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भारत माता बनी डैमोक्रेसी की मम्मी! (व्यंग्य : राजेंद्र शर्मा)

अब तो मोदी जी के विरोधियों को भी मानना पड़ेगा कि उन्होंने भारत को विश्व गुरु बना दिया है। धर्म-वर्म के मामले में ही नहीं, डैमोक्रेसी के मामले में भी। नहीं-नहीं, बात सिर्फ इंडिया के डैमोक्रेसी की मम्मी होने की ही नहीं है। बेशक, डैमोक्रेसी की मम्मी वाली बात भी गलत नहीं है। अब तो नये भारत की नयी भारतीय अनुसंधान परिषद ने बाकायदा खोजकर भी छाप दिया है कि दुनिया भर में डैमोक्रेसी की मम्मी है, तो भारत है। भला अब किस में हिम्मत है कि भारत को डैमोक्रेसी की मम्मी मानने से इंकार कर दे। देश में तो किसी को करने नहीं देंगे। और बाहर वाला कोई कर भी देगा, तो उसे अव्वल तो पीआइबी ही फेक घोषित कर देगी और इससे भी काम नहीं चला, तो डैमोक्रेसी की मम्मी अपनी सरकार से उसे सभी प्लेटफार्मों पर ब्लाक करा देगी, उसको देखने, शेयर करने वगैरह पर रोक लगाने के साथ -- बीबीसी की ‘‘मोदी प्रश्न’’ वाली डॉक्यूमेंटरी की तरह। फिर भी ...
भाजपा में इस्तीफे नहीं होते, सिर्फ कांड होते हैं (आलेख : बादल सरोज)
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भाजपा में इस्तीफे नहीं होते, सिर्फ कांड होते हैं (आलेख : बादल सरोज)

सब कुछ हुआ, मगर ब्रजभूषण शरण सिंह का इस्तीफा नहीं हुआ। कुश्ती के मुकाबलों में देश और दुनिया में अपने खेल कौशल की धाक बनाने वाले, कई विश्वपदक लाने वाले भारत के महिला, पुरुष पहलवान तीन दिन तक दिल्ली में जंतर मंतर पर बैठे रहे। इस धरने के जरिये नामवर महिला पहलवानो ने कुश्ती फेडरेशन के बुढ़ाये अध्यक्ष ब्रजभूषण शरण सिंह की कुंठित वासना और यौन उत्पीड़न की घटनाओं को उजागर किया। पूरा देश शर्मसार भी हुआ, क्षुब्ध और आक्रोशित भी हुआ। भाजपा सांसद बृजभूषण शरण सिंह के आचरण के बारे में जिस तरह के आरोप इन पहलवान युवतियों ने लगाए, वे विचलित करने वाले थे। इनसे भारतीय कुश्ती फेडरेशन की डर्टी पिकचर पूरे देश के सामने आयी। शनिवार को खेल मंत्री अनुराग ठाकुर के साथ कथित रूप से 7 घंटे तक हुयी चर्चा के बाद धरना उठ गया है, या उठवा दिया गया है। एक कमेटी सरकार ने बनाई है - एक कमेटी इंडियन ओलिंपिक एसोसिएशन ने बनाई है।...