वन मंत्री मो अकबर ने अपने विधान सभा के आदिवासी ग्रामीण की मध्यप्रदेश पुलिस द्वारा गोली मारकर हत्या के मामले में राज्यपाल की मदद से न्याय दिलवाकर दम लिया

रायपुर। छत्तीसगढ़ सरकार के कैबिनेट मंत्री मोहम्मद अकबर अकबर ने अपने विधानसभा क्षेत्र कवर्धा के आदिवासियों पर मध्य प्रदेश पुलिस द्वारा गोली चला कर प्राणघातक हमला करने और एक ग्रामीण की मौत को सूचना मिलते ही गंभीरता से लिया था विधिवत इसकी जांच करवा कर मध्य प्रदेश सरकार को अवगत कराया था लेकिन सरकार ने इस पर कोई ठोस कदम नहीं उठाया तब मोहम्मद अकबर ने छत्तीसगढ़ के राज्यपाल को पूरी घटना से अवगत कराया वन मंत्री मोहम्मद अकबर की सक्रियता और राज्यपाल सुश्री अनुसईया उईके के हस्तक्षेप ने कवर्धा के आदिवासी झामसिंह व उसके परिजनों को इंसाफ दिलाया है। इस आदिवासी की एमपी पुलिस की गोली से माैत के 11 दिन बाद आखिरकर एमपी पुलिस को न केवल हत्या का अपराध दर्ज करना पड़ा है बल्कि पीडि़त परिवार को 1 लाख रुपए व परिवार के एक सदस्य को नाैकरी देने की घोषणा की है।

मंत्री  अकबर के निर्वाचन क्षेत्र कवर्धा के बोड़ला विकासखंड़ के एक गांव में रहने वाले झामसिंह की एमपी पुलिस की गोली से माैत हो गई थी।

मंत्री  अकबर ने इस व्यक्ति को इंसाफ दिलाने की पहल करते हुए एमपी के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह,गृह मंत्री नरोत्तम मिश्रा को पत्र लिखकर जांच की मांग और दोषियों पर कड़ी कार्यवाही की मांग की थी। यही नहीं एमपी के सीएम को पत्र लिखने के बाद 24 घंटे के भीतर दूसरी बार पत्र लिखकर कार्रवाई के लिए संज्ञान लेने का आग्रह किया था। इसके अगले दिन श्री अकबर ने छत्तीसगढ़ की राज्यपाल सुश्री अनुसईया उईके से फोन पर बात कर उन्हें मामले से अवगत करवाते हुए हस्तक्षेप का आग्रह किया था।

मंत्री  अकबर के आग्रह पर राज्यपाल सुश्री उईके ने एमपी के सीएम को पत्र लिखकर तुरंत कार्यवाही की बात कही थी। इसके अगले दिन यानी बुधवार को एमपी पुलिस ने झामसिंह मामले में एक बड़ी कार्रवाई को अंजाम दिया है। जब ये मामला सामने आय़ा था,तभी से कबीरधाम जिले के आदिवासी समुदाय ही नहीं बल्कि पूरे प्रदेश के जनजातीय समूह में एमपी पुलिस के खिलाफ कड़ा आक्रोश व्याप्त था। झाम सिंह के परिवार को इंसाफ दिलाने के लिए अपनी प्रतिबद्धता श्री अकबर ने दिखाई। नतीजतन एक आदिवासी की फर्जी मुठभेड़ के संगीन मामले में एमपी पुलिस को कार्यवाही करनी पड़ी।

यह मामला मानवाधिकार हनन के आरोप से भी जुड़ा था, लिहाजा मानवाधिकारवादी संगठनों की नजर भी मामले पर थी। खास बात ये है कि यह मामला दो राज्यों के बीच टकराव का रूप भी लेता जा रहा था। छत्तीसगढ़ में पूर्ववर्ती भाजपा सरकार के 15 साल के कार्यकाल में आदिवासी की नृशंस हत्याओं व फर्जी मुठभेड़ के अनेक मामलों के बीच अकेला या प्रकरण है जिसमें एमपी की भाजपा सरकार को बैकफुट पर आना पड़ा है। इस मामले का अपेक्षानुसार निपटारा होने से कबीरधाम जिले के आदिवासी समुदाय ही नहीं बल्कि छत्तीसगढ़ के समूचे आदिवासी समुदाय ने राहत की सांस ली है। माना जा रहा है कि आदिवासी हितों की रक्षा के लिए प्रतिबद्ध छत्तीसगढ़ की कांग्रेस सरकार भविष्य में भी इन शोषित, उपेक्षित आदिवासियों के हक की लड़ाई में हमेशा अग्रणी रहेगी।

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