Wednesday, September 23

Tag: मेरा शबाब भी लौटा दो मेरी महर के साथ ।”

चंद्र शेखर शर्मा वरिष्ठ पत्रकार की बात बेबाक “तलाक़ दे तो रहे हो इताब-ओ-क़हर के साथ , मेरा शबाब भी लौटा दो मेरी महर के साथ ।” ,
कवर्धा, खास खबर, छत्तीसगढ़ प्रदेश

चंद्र शेखर शर्मा वरिष्ठ पत्रकार की बात बेबाक “तलाक़ दे तो रहे हो इताब-ओ-क़हर के साथ , मेरा शबाब भी लौटा दो मेरी महर के साथ ।” ,

महिला समानता दिवस की हार्दिक बधाई, शुभकामनाएं..... अमूनन महिला उत्पीड़न बलात्कार, छेड़छाड़, दहेज हत्या की खबरों से भरे रहने वाले नामी गिरामी अखबारों , न्यूज़ चैनलों में महिला समानता दिवस पर महिलाओं की शान में कसीदे गढ़े व उनकी हिम्मत औऱ कामो की सराहना करते नारीशक्ति का एक दिवसीय गुणगान होता है । गुजरे बालिका दिवस व अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस के बाद आज मुझे फिर "बेटी है तो कल है" "बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ" "नारी तू नारायणी " के नारों व जुमलों व महिला समानता के अधिकारों की बातो के बीच "काम नहीं कर सकते तो चूड़ीयाँ पहन लो" का जुमला भी याद आ रहा । क्या 21वी सदी की ओर दौड़ते भागते आधुनिक समाज मे  महिलाओ की कलाईयों का श्रृंगार , सुहाग के प्रतिक की निशानी इतनी कमजोर और कामचोर है कि कुछ नहीं करने या अकर्मण्यता का प्रतीक बनी हुई है ?  चूड़ीयाँ भेंट करना या पहनने का जुमला बना हुआ है । कामचोर नेताओ अधिकारियो को च...
बात बेबाक चन्द्र शेखर शर्मा की”तलाक़ दे तो रहे हो इताब-ओ-क़हर के साथ , मेरा शबाब भी लौटा दो मेरी महर के साथ ।”
लेख-आलेख

बात बेबाक चन्द्र शेखर शर्मा की”तलाक़ दे तो रहे हो इताब-ओ-क़हर के साथ , मेरा शबाब भी लौटा दो मेरी महर के साथ ।”

"तलाक़ दे तो रहे हो इताब-ओ-क़हर के साथ , मेरा शबाब भी लौटा दो मेरी महर के साथ ।" हमेशा की तरह साल में एक बार याद करने की परंपरा के साथ अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस की हार्दिक बधाई, शुभकामनाएं..... अमूनन महिला उत्पीड़न बलात्कार, छेड़छाड़, दहेज हत्या की खबरों से भरे रहने वाले नामी गिरामी अखबारों , न्यूज़ चैनलों में 8 मार्च अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस पर महिलाओं की शान में कसीदे गढ़े व उनकी हिम्मत औऱ कामो की सराहना करते नारीशक्ति का एकदिवसीय गुणगान किया जाएगा । गुजरे बालिका दिवस के बाद आज मुझे फिर "बेटी है तो कल है" "बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ" "नारी तू नारायणी " के नारों व जुमलों के बीच "काम नहीं कर सकते तो चूड़ीयाँ पहन लो" का जुमला भी याद आ रहा । क्या 21वी सदी की ओर दौड़ते भागते आधुनिक समाज मे महिलाओ की कलाईयों का श्रृंगार , सुहाग के प्रतिक की निशानी इतनी कमजोर और कामचोर है कि कुछ नहीं करने या अकर्मण्यता क...