आदिवासियों के हक व अधिकारों के लिए एकजुट होकर संघर्ष करने का वक्ता आ गया है: मंत्री लखमा

  • राष्ट्री य शोध-संगोष्ठी, के समापन के मौके पर शोधार्थियों ने किया शोध पत्रों का वाचन ,
    रायपुर, 29 दिसंबर 2019। राष्ट्री य शोध-संगोष्ठीक आदिवासी अस्मिता : कल, आज और कल , विषय पर आयोजित समारोह के तीसरे दिन प्रदेश के आबकारी मंत्री कवासी लखमा ने आदिवासियों के विस्थािपन को रोकने को लेकर चिंता जाहिर किया गया। आदिवासी जहां रहते हैं वहां से विस्था पन की मार झेल रहे हैं। क्योंरकि सोना, हीरा, लोहा, सीसा, कोयला व सीसा जैसे खनिज संपदा हैं। हालत ये है कि आदिवासी अपनी जमीन का पट्टा नहीं ले पा रहे हैं। माननीय सुप्रीम कोर्ट के एक फैसले से 10 लाख 80 हजार आदिवासियों को जंगल से बेदखल करने का आदेश से आदिवासी व्याटथित है़। मंत्री श्री लखमा ने कहा कि इस आदेश से छत्तीोसगढ में 2 लाख 80 हजार आदिवासियों भी प्रभावित हो रहे हैं। इस आदेश के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में छत्तीेसगढ़ सरकार ने स्टेा लिया है।
    अबुझमाड़ के आदिवासियों के पास जमीन का पटृा नहीं है। जबकि बस्त र में अबुझमाड़ में निवासरत मूल निवासी माडिया आदिवासी है। आदिवासी प्रकृति पर आधारित हर मौके फसल बोने से लेकर काटने और शादी जैसे रश्मों को उत्स व के रुप में मनाते हैं। जबकि गोंड़ , कोया और भतरा आदिवासी पड़ोसी राज्यों से आए हुए हैं। बस्तकर में होने से हम प्रमाण पत्र दिखाने में सक्षम नहीं है। जबकि दूरस्थस अंचलों में रहने वाले आदिवासियों के पास आधार कार्ड भी नहीं है और मतदाता सूची में नाम तक नहीं हैं। मंत्री श्री लखमा ने कहा कि देशभर में एनआरसी लागू किया जा रहा है। इसका सबसे ज्यामदा शिकार आदिवासियों को बनाया जाएगा। क्योंेकि वे मंत्री होने के बावजूद भी आज उनके पास जन्मश प्रमाण पत्र नहीं दिखा सकते हैं। जबकि हमारे पूर्वज इसी जंगल में रहते आएं हैं। देश के अलग-अलग राज्योंय में एनआरसी के विरोध में लोग प्रदर्शन करते हुए सड़कों पर उतर आएं है। जब बस्त र के लोगों को जानकारी होगी तब आदिवासी भी सड़कों पर नजर आएंगे। इस समस्यात के खिलाफ हमें एकजुट होकर माननीय राष्ट्ररपति एवं राज्यसपाल को ज्ञापन सौंपकर समस्या ओं पर चर्चा करना चाहिए। इस तरह की शोध संगोष्ठीष का आयोजन बस्त‍र और सरगुजा संभाग में भी आयोजित किए जाएं। कार्यक्रम में विधानसभा उपाध्यधक्ष मनोज मंडावी भी उपस्थित रहें।
    मासिक पत्रिका ‘गोडवाना स्वदेश’ के तत्वधान में 27 से 29 दिसंबर तक आयोजित तीन दिवसीय राष्ट्रीय शोध-संगोष्ठी गढ़बों नवा छत्तीसगढ़ के थीम पर आधारित “आदिवासी अस्मिता: कल, आज और कल” विषय पर देश भर के विश्वविद्यालयों से आये प्रोफेसर, शोधार्थी एवं बुद्धजीवीगण अपने शोध-आलेख एवं आदिवासी समस्याओं के चिंतन पर मंथन करने शामिल हुये हैं। आज संगोष्ठी का तीसरा और समापन का दिन रहा है ।
    इस कार्यक्रम के आयोजन में छत्तीसगढ़ शासन के ‘संस्कृति विभाग’ एवं ‘आदिमजाति विकास विभाग’ का विशेष सहयोग रहा। गढ़बों नवा छत्तीसगढ़ के नवसृजन के लिए प्रतिबद्ध प्रदेश के यशस्वी मुख्यमंत्री माननीय भूपेश बघेल जी और संस्कृति एवं खाद्य मंत्री माननीय अमरजीत भगत जी के मार्गदर्शन में “आदिवासी अस्मिता: कल, आज और कल” पर आधारित राष्ट्रीय स्तर पर पहली बार रायपुर में शोध-संगोष्ठी का आयोजन किया गया है। इस संगोष्ठी में देश के प्रख्यात केंद्रीय विश्वविद्यालय जामिया मिलिया इस्लामिया, दिल्ली विश्वविद्यालय, जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय दिल्ली(JNU), इंद्रिरा गांधी राष्ट्रीय आदिवासी विश्वविद्यालय अमरकंटक, टाटा इन्स्टीट्यूड ऑफ सोसल साइंस मुंबई, महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय विश्वविद्यालय, शांति निकेतन विश्वविद्यालय कोलकाता, गुजरात विश्वविद्यालय, केंद्रीय विश्वविद्यालय ओडिशा, गुरुघासीदास विश्वविद्यालय बिलासपुर, पं. रविशंकर विश्वविद्यालय, बस्तर विश्वविद्यालय जगदलपुर एवं मानवविज्ञान सर्वेक्षण संस्थान जगदलपुर के विषय विशेषज्ञ, प्रोफेसर एवं सैकड़ों शोधार्थियों ने अपना शोध-पत्र एवं आलेख वाचन किया। प्रतिभागियों को प्रमाण पत्र का वितरण किया गया।
    रविवार को संगोष्ठीअ के तृतीय दिवस में प्रथम सत्र : आदिवासी आराध्य, धर्म,संस्कृति, उत्सव एवं लोक परंपरा पर वक्ताशओं ने अपना विचार रखा। वक्ताभ युवा आदिवासी चिंतक एवं लेखक जगदलपुर, ट्राइबल वेलफेयर डॉ. हरीश मरकाम ने आदिवासी अस्मिता के कई रुपों की चर्चा की। उन्होंरने आज के संदर्भ में कहा कि धर्म, सत्ताआ और व्यारपार इन दिनों का मूल्यां कन करना जरुरी हैं। उन्होंंने कहा कि दुनिया में दो प्रकार की व्यावस्थार कायम है जो कि एक लिखित व दूसरी मौखिक व्य वस्था है। आदिवासियों की पूरी व्यिवस्थास मौखिक है। वे लिखित व्य वसथा को अधूरी और झुठी व्यनवस्थाथ माते हैं। डॉ मरकाम ने कहा कि दुनिया को बदलने के लिए बुद्विमता की नहीं बल्कि सहजता की जरुरत है। तभी आदिवासी समाज बचा रहेगा। बस्तर के आदिवासी सामाजिक कार्यकर्ता माखनलाल शौरी ने कहा कि आदिवासी समुदाय को समझने के लिए उनके रहन-सहन बोली परम्पारा और संस्कृीति को समझना पड़ता है। वे हजारों वर्षों से प्रकृति की गोद नदी, पहाड़ और जंगलों से जुड़े हुए हैं। शास. गुंडाधुर महाविद्यालय कोंडागांव के प्राचार्या डॉ. किरण नुरेटी ने आदिवासियों के जीवन पर आधारित ध्याशन पद्वतियों, मनोवैज्ञानिक चिकित्साप, प्राकृतिक चिकित्सा पर प्रकाश डाला। उन्होंयने कहा कि प्रकृति शक्ति ही सर्वशक्ति मान है। इसलिए प्रकृति का बचाव करना जरुरी है। झारखंड के मानव वैज्ञानिक डॉ. शब्बी र हुसैन ने छत्तीृसगढ़ के आदिवासियों की कुपोषण समस्या पर चिंता व्यवक्तञ किया । यहां 52 प्रतिशत से अधिक आदिवासी बच्चेे कुपोषण के और ज्या‍दातर महिलाएं एनिमिया के शिकार हैं।

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