चन्द्र शेखर शर्मा की बात बेबाक,सत्ता के गलियारे में सिर्फ अली बाबा बदलता है,40 चोर तो वही रहते है


विकास विकास की बाते और राग आलापते नेताओ की कोरी भाषण बाजी सुनते सुनाते कान पक गए पर विकास का पता ही नही चल रहा था कि अचानक न्यूज़ चैनल के एंकर चीखने चिल्लाने लगे विकास मारा गया । उनकी चीख पुकार सुनकर लगा न जाने आज फिर कौन सी सड़क धंस गई कौन सा पुल गिर गया या कौन सा भवन ढह गया । टीवी पर मची चीख पुकार को सुन विकास का हाल जानना चाहा तो पता चला विकास को तो उत्तरप्रदेश की बहादुर पुलिस ने मार गिराया है । अब बोलो जब सरकारी कर्मचारी ही विकास को मारने लग जाये तो वो दिखेगा कहाँ । वैसे सत्ता के गलियारे में बस अलीबाबा ही बदलता है चोर तो वही चालीस के चालीस ही रहते है । वैसे वयस्क होते हमारे छत्तीसगढ़ में तरक्की की बाढ़ आई हुई है और फिर कॅरोना आँटी ने भी आपदा में अवसर दे दिया है । जब विकास और तरक्की की बात हो तो मोदी और दाऊ की याद तो आनी ही है । दोनों के राज में आत्मनिर्भर बनते देश मे विकास इतना हो रहा कि हम पकौड़े तलने से लेकर गोबर बीनने तक मे रोजगार तलाशते आत्मनिर्भर बन रहे है । बात विकास की हो रही है और विकास विकास के खेल में मेरा छोटा-सा शहर इससे बच जाए, यह कैसे संभव है ? मेरे शहर में भी पिछले कुछ सालों से तरक्की (?) घुटने मोड़कर आ बैठी है। जहाँ पहले गिट्टी की फेयर वेदर सड़कें या कोलतार पुती सड़कें थीं, वहाँ अब सीमेंट की सड़कें हो गई हैं। सीसी रोड पर सीसी रोड बन रही है, एक ही नाली को बार बार तोड़ कर बनाया जा रहा है । सड़के और गलियों को चौड़ी कर शहर को सुंदर बनाने अफसर मजदूर से ज्यादा पसीना बहा रहे है । कॅरोना आँटी भी घूम रही है तो शहर वासियों को मुफ्त बांटने के लिए सेनेटाइजर भी खरीद कागज में बंट गए । मार्केट और गलियों में सड़को पर कब्जा जमाते व्यापारियों पर भी मुंह और औकात देख कार्यवाही की खाना पूर्ति करते फोकट में टाइम पास करते अफसर की बेचारगी ने एक पुरानी कहावत सच कर दी कि शासन प्रशासन का मुक्का पुष्ट और मजबूत पीठ पर उठता तो है पर मुक्के के नीचे आते तक वो पीठ ही बदल जाती है । खैर ये तो आदि अनादि काल से चली आ रही परंपरा है कि जिसकी लाठी उसकी भैंस हमे क्या । विकास की पागलपंथी में नेता , ठेकेदार और अफसर की तरक्की के लिए सड़क घटिया बनाओ जेब भरो फिर सड़क बनाओ एक सड़क अलग अलग नामो से बनाओ जेब गरम करो चलते बनो । कुछ भी हो अब विकास की झलक है तो है । इसी वजह से मेरे शहर और आसपास के गाँवों के लोग लोन या धान व गन्ने के बोनस से ली गई मोटरसाइकलों और चारपहिये वाहनों पर दनदनाते हुए शहर की सड़कों पर बेतहाशा दौड़ते हैं । हमारे देश का ट्रैफिक कानून बहुत सख्त है । इसीलिये हमारे कथित वर्दीधारी जनता के हित में 100 – 200 का रंगीन कागज देखते ही पूरा कानून ही बदल देते है ? जिससे कुछ वर्दी धारियों की ऊपरी कमाई भी हो ही जाती है ? अब ये विकास नहीं तो क्या है भाई रे । एक 101 टका ईमानदार अफसर ने कहा भाई साहब विकास और भ्रष्टाचार का चोली दामन का साथ है , काजल की कोठरी से आप बेदाग नही निकल सकते मान भी जाओ । साहब कुछ भी बोले पर हमें तो पकोड़े से गोबर तक का सफर ही विकास की राह दिख रहा ।
और अंत मे :-
ख़ुदा महफ़ूज़ रक्खे मुल्क को गन्दी सियासत से ,
कि शराबी देवरों के बीच में भौजाई रहती है ।

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