‘विलक्षण व्यक्तित्व: प्रो. जयनारायण पाण्डेय’ 20 जनवरी, पुण्यतिथि पर विशेष

0  हर्षवर्धन                                             सधारण मध्यम वर्गीय परिवार के जयनारायण पाण्डेय, मात्र 39 वर्ष का जीवन व्यतीत कर असाधारण कृतियाॅ, उपलब्धियाॅ दर्ज कर गये, शि़क्षाशास्त्री संस्कृताचार्य के पुत्र, मेधावी छात्र, अंचल में स्वाधीनता संग्राम की गतिविधियों को मुखरित करने वाले, डायनामाईड से जेल की दीवारो को भेदने की कोशिश करने वाले, मध्य प्रांत में रियासतों के विलीनीकरण आन्दोलन के केन्द्र बिन्दु, समाजवादी मुखपत्र जनमत के संपादक, सोशलिस्ट पार्टी के प्रांतीय महासचिव,साहित्यिक गतिविधियों के उच्चतम मापदण्ड स्वरूप स्थापित स्तंभ पाण्डेय जी, दुर्गा महाविद्यालय रायपुर के संस्थापक प्रथम कार्यकारी प्राचार्य, राजनीतिशास्त्र के विभागाध्यक्ष, महाविद्यालयीन शिक्षा को छत्तीसगढ में उच्च स्तरीय, सर्वागीण, सर्वहितकारी शिक्षा का स्वरूप देने वाले, पाण्डेय जी के विषय में पिछले 50 वर्षो से सतत लिखा जाता रहा है।

Jप्रो. जयनारायण पाण्डेय की विद्वता समाज में आदर्श स्वरूप बनकर स्थापित रहे, प्रोफेसर पाण्डेय का समुचित मूल्यांकन व विश्लेषण कर देश व समाज की युवा पीढी उनकी स्मृति को अक्षुण्ण बनाये रखे, इस आशय से प्रस्तुत है, पाण्डेय जी के जीवन दर्शन से ओत प्रोत क्रान्तिकारी साहित्य व रचनाकार के काव्य पुष्प से विलग हुई कुछ सूखी पंखुडियाॅ,

‘‘ आज दीपक जल रहे हैं ’’
आज शोषक वर्ग ही उन्मत्तराग अलापता है
पर प्रतारित पद दलित, पीड़ित मनुष्य कराहता हंै,
वैभवों के बीच पल जो नींद सुख की सो रहे हंै,
क्या पता उनको यहाॅं, हतभाग्य कितने रो रहे हंै,
तडपते, बेकल सिसकते हैं कि खून उगल रहे हैं,
फिर भी दीपक जल रहे हैं.।
कौन सा त्यौहार जिसमे दिल जलाये जा रहे हंै,
स्नेह के दुर्भाव में लोहू बहाए जा रहे हैं,
प्राण की नववर्तिका ले देह दीप जला रही है,
वह शमॅा जिस पर कि परवाने लुटाए ला रहे हैं,
इस तरह के दृश्य नित ही मूढ़ जग को ़क्षल रहे हैं,
फिर भी दीपक जल रहे हैं।

कविता वर्ष 1946 में लिखी गई थी, जब पाण्डेय जी की आयु मात्र 21 वर्ष की थी। कविताकार की क्रान्तिकारी, समाजवादी विचारधारा को इंगित करती कविता के बाद, जरा गौर फरमाए –

‘‘हिन्द का तारा चमकता जायेगा ’’ की ओर…… जो समाजवादी काॅमरेड पाण्डेय जी की कलम की धार को दर्शाती है।

है ज़मी वो ही जहाॅं पर,
भूख भी, इफ़लास भी है!
जुल्म की चक्की हमेशा चल रही,
पिसता जहाॅं इन्सान भी है!
बीस करोड़ किसान भी है!
देश मज़लूमो का है-

नंगे बदन, आॅंखे धॅंसी, टूटी कमर,
काश। जो उनको कहीं इसकी कभी
होती खबर !!
नालियों में जिसके बच्चे बिलबिलाते हैं,
जो हरदम मालिकों के जूठे टुकड़ों पर
झपटते है,
जिन्हे मजदूर कहते हैं !
जिनकी जिन्दगी में सुबह तो
होती नही।
शाम से ही मौत के दूतो का पहरा
रहता हैं,
कूकुरों चमगादड़ों- स्यारांे का दौरा
रहता है।
जहाॅं पर वह बेकफन सोता है
मुसकाता हुआ –
बेबसी में, मुफ़लिसी में, आॅसू
बरसाता हुआ।
ऐशो-इशरत का महल जिसने
खड़ा कर दिया-
औ‘ नीव को अपने लहू से, हड्डियांे
से भर दिया।
जिसने अपने लहलहाते खेत में
दौलत उगाई,
और कड़कती धूप में लोहू सुखाया –
है यही इन्सान काला।
पर जिसे बरबाद करने
शहरियों ने जाल डाला।
सूद में रूपये उसे देता रहा-
बेदख़ल उसकी ज़मीं करता रहा –
बेजबाॅं गिरता-सिसकता था मगर,
आॅंखो मे थी उसकी चमक।
और थैलीशाह गुर्गे घाव पर
उसके छिड़कते थे नमक !
आज खद्दरपोश हंै,
देते सदा उपदेश हैं !
अरे, उनका ही तो राज है।
जनपदों, पंचायतों और महफिलों में
उनकी ही तो साज है!
जिसने की अस्मतफरोशी-
लूट ली दौलत गरीबो की वही,
इन्साफ की कुर्सी पे बैठा है !
आज तो उसकी सदा है, गंूजता है आसमाॅँ
आज तो है उसपे ही कौमी शहादत
मेहरबां !
बदनसीबी का यही वह देश है-
जिसकी चर्चा महफिलों में पेश है।

0 के प्रश्रय में, वंजुल की स्निग्ध छाया में मंजूल वनकन्या जब उन्मुक्त हास्य बिखेरती तो पूरी वादी गूंज उठती, निश्छल अट्टाहास से। दोनो बहनें बंजा माझी की जुड़वा सन्ताने थी, जिनकी मॉ जन्म देकर चल बसी थी। बंजा ने पुरूषत्व की जगह ममत्व, पिता की जगह माता की प्राण प्रतिष्ठा की, पाल-पोसकर उन्हे बड़ा किया। माधवी लताओं के सुखद वितान ने अर्द्धनुकुलित नवमल्लिका की तरह दोनों को सहारा दिया; सौरभ, सौन्दर्य, संख्य दिया। एक थी सिंगार – हरसिंगार की कोमल पंखुड़ियों सी सुहानी, सलोनी, सजीली, वनफूलों का प्रसाधन किये नैसर्गिक आभा से ज्योतितः छिटकी चांदनी में चमकते स्फटित सी सुन्दर, सुडौल, निर्मल। दूसरी का नाम था बहार-मदमाती वासन्ती बहार की तरह जिसमें नीम, अनार, कचनार, गदरा उठते, जूही-केतकी-कनेर-कुन्दकली कहकहा उठती, रूप-रंग रेखा का निराला निखार, अपूर्व समन्वय भोर की किरण वृक्षों-पत्तों को झकझोर, चिड़ियों को गुदगुदाकर सारे पहाड़ की स्वप्निल तन्द्रा भंग कर देती। सांझ का झुटपुटा, झींगुर की कर्कश पुकार पर काली चादर का जादू बतलाने की व्यग्रता में डूबते दिनमणि का उपहास करता! रात होते ही दिशाएं शून्य पड़ती, प्राणी स्तब्ध होते, पक्षी सोते, पर पहाड़ जागता, जगमगा उठता, गूंजता, हर्षविभोर हो नाचने लगता! मनमोहक करमा नृत्य में युवक-युवतियों का मदमस्त दल हौले-हौले डोलता, क्रमबद्ध पादनिपेक्ष से नुपूरों की ध्वनि फैलती मॉदर बजते, नर्तक झूमते, पहाड़ी सुरापान में सुधबुध खो तन्मय होते! ताल लय का समवेत स्वर शिथिल शरीरों में स्पन्दन-सिरहन भरता! स्वर्णिम उल्लास उन्माद में वे सब कुछ भूल जाते! मध्यरात्रि के बाद ही जब वनदेवता की बोझिल पलकें झपकने लगती, खेतों में हलचल होती प्रेमियों का मिलन होता! दोनों बहनें आगे बढती बड़े बरगद के नीचे रूकती, जहाँ मल्ल और लोक जो पड़ोसी गांव कछपाल से आकर नृत्य में शरीक होते, निभृत एकान्त में इनसे मिलते। श्रम और संघर्ष से दूर संपृक्त निमिषों का आलोक उन्हें नई प्रेरणा देता। विषाद-वेदना के क्षण बदल जाते, आराधना-नीराजना में अनुपम, अनिर्वचनीय आह्लाद की यह धारा अबाध गति से प्रवाहमान थी।

‘‘सिंगार, अब तो हमसे बहुत कम मिलती हो, दूर क्यों होती जाती हो? बंजा बाबा तुमको बेच देगा, तो हमारी क्या हालत होगी।
‘‘हमारे गोतर के बाहर हो तुम लोकू! बड़े होने के कारण तुम अकड़ सकते हो, टेस बता सकते हो। सब कुछ कर सकते हो, लेकिन पहाड़ का दस्तूर तो जानते हो।
वनबेटी ने एक बार जिसका हाथ पकड़ा, जान देकर भी उसे निभाया। जंगल में सत्यवान-सावित्री की आत्मा घूमती फिरती है। तुम तो डरपोक हो, और साथ ही कामचोर भी। तुम्हारा क्या? कहीं दूसरी जगह चांवल मुर्गी सल्फी (सगाई का सामान) भेजने का इरादा किया होगा?
‘‘नहीं नहीं सिंगरी, क्यों गिराती-बनाती रहती हो ? जब तू आ जायेगी तो नया खेत, नई झोपड़ी, नई बहू और नई जिंदगी होगी।‘‘
‘‘चलो चलो, तुम हो अपने दादा के दबैल और पंचायत के गुलाम ठहरे।’’
‘‘ज्यादा शर्मिन्दा मत करो! बड़ादेव की कसम खाकर कहता हूँ कि अबकी मढ़ई-मेले से पहले पितम्बरी-चूड़ी लाउंगा और साथ में चांवल-मुर्गी सल्फी भी……!’’
‘‘तू तो निपट किसान है मल्लू! दिन भर खटता है, फुरसत पाने पर भी नहीं आता। केवड़ा बाड़ी के पास हम तेरी राह देखते रहते हैं।’’
‘‘मेरी वनरानी बहार! तुम तो अकेली ही खिली फूली रहती हो! दिन-रात खेती और शिकार में भरमाई हो हमारी खबर क्यों लोगी?’’
‘‘जानते तो हो! हम लोग, चट्टान की छाती रौंदकर, जंगल का कोना छानकर, जीने का सामान इकट्ठा करते हैं। मिहनत न करें तो सबके सब साफ हो जावें । लेकिन उस दिन तुमने उस उल्लू के पिल्ले नन्दू को क्यों साथ लगा लिया? कलमुंहा बड़ा बदमाश है। ‘‘बिरहा’’ क्या गाता है, गदहे की तरह रेंकता है।’’
‘‘अरे छोड़ो नन्दू की बात! हां, तो अब मढ़ई मेला नजदीक आ रहा है।’’
‘‘बड़ी-बड़ी बातें हॉकते हो, तुम्हारा क्या भरोसा ?’’
‘‘नहीं-नहीं, मुझको अच्छी तरह याद है । बड़ादेव की सौगन्ध अब हम लोग साथ-साथ रहेंगे, काम करेंगे।’’
– – – –
कबीले की पंचायत का विधान सुदृढ़ तथा प्रबल होता है। उसका अनुशासन कठोर, आदेश अनुल्लंघ्य और न्याय अमिट होता है। ‘‘लमसेना’’ की प्रथा एक ओर सम्भावित परिणय की परिचायिका है लेकिन दूसरी ओर अभिशाप भी है। इसके अनुसार विवाह से पर्व भावी पतियों को अपनी प्रेयसियों के घर जाकर शरीर-श्रम कर पड़ता है। कहीं कहीं ‘कन्यादान’ लेने के बजाय ‘कन्यादान’ देना पड़ता है। श्रम और सामर्थ्य पर बड़ा प्रतिबन्ध लगा जाता है। अपने सस्ते प्रेम का इतना मंहगा मूल्य चुकाने में असमर्थ, कई तो डर के मारे भाग जाते या फिर पिंड छुड़ाने के लिए आत्म-हत्या तक कर लेते है। पंचायत के नियमों में व्यक्तिक्रम होने अथवा कुल वंश की मर्यादा पर आंच आने से विनाश और नर-हत्या का दृश्य उपस्थित होता है। प्रतिष्ठा की प्रवंचना खून पीकर ही शान्त नही होती – खेत जलाये जाते, लूट पाट होती, गांव के गांव बरबाद होते, किये जाते। फिर पंचायत बैठती, सांप निकल जाने के बाद लकीरें पीटी जाती। टोना-टोटका, दैवीकोप, सामूहिक दण्ड, सब कुछ सोचा विचारा जाता। लकड़ी-पत्थर के देवता उनके आदि और आराध्य थे, सर्वस्व थे; शराब मुर्गी के बिना शान्त नहीं हो सकते थे; उनका प्रकोप असह्य था। बंजा ने लमनाई का नेवता कछपाल के मुखिया के यहाँ भिजवाया, लेकिन मुखिया ने उसे अस्वीकार कर दिया; शराब और चांवल वापिस आये। पहाड़ में बात तीर की तरह फैलती, तलवार की तरह काटती। चर्चा सब जगह होने लगी कि बंजा सरीखे धुरया के यहां राजगोड़ के लड़के कैसे ब्याह करेंगे? बंजा तिलमिला उठा। तिरस्कार-अवमानना ने घृणा-विद्वेष की सृष्टि की, लेकिन जहर उसने पचा लिया। लोकू और मल्लू मन मार कर राह गये,लेकिन उपाय सोचते रहे। मड़ई मेला बिलकुल सिर पर था।

एक रात दोनों आये, बरगद के नीचे मिले, लड़कियों को साथ लेकर भाग गये। ठौर-ठिकाना कहीं था नहीं, पहाड़ों की कतार पार करते यहां वहां आश्रयहीन भटकते रहे। घूम फिर कर नाले के पार मढ़िया में पहुंचे और वहीं आसन जमाया। बहार को साथ लेकर मल्ल सामान खरीदने मढई बाजार चला गया। वहाँ टिकली, बेंदी, झुमके, चूड़ी, खिनवां आदि सामान खरीदा गया। पूरी पिटारी बहार के हाथ में रखाकर झरने के किनारे उसे बैठने का आदेश दिया। लेकिन मल्लू न जाने फिर कहा अदृश्य हो गया। यहां मड़िया के काष्ठदेव को साक्षी बनाकर लोकू और सिंगार ने फूल चढ़ाये। जंगल के रंग-बिरंगे गन्धहीन, निर्विकार फूलों से सजी अलबेली सिंगार, साजन के घर प्रतीक्षा में थी। लोकू, भोजन की तलाश में बाहर गया। रूप भार से दबी. थकी, सजी, सिंगार सोई रही कटिय में ही। प्रतिहिंसा से प्रताड़ित, जातीय अपमान से क्षार, बंजा तीर – कमठा लेकर गांव के दस-पांच लोगों के साथ लड़की ढूंढ़ने निकल पड़ा था। प्यास ने नाले की ओर खींचा, संयोग ने लड़की दिखा दी। अकेली लेटी हुई सिंगार को बंजा ने खुद अपने हाथों से काटा, नाले में फेंका और अपने दल सहित घर लौट गया। असहाय, त्रस्त, उजड़ी हुई, अकेली बहार सुहाग की झोली लिये झरने के पास ही रह गई थी।

उधर कबीले की पंचायत ने मल्लू लोक को भात का दण्ड दिया । गांव भर के लोग आये, भात खाया, शराब पी, नाचे और प्रायश्चित कर लिया । मड़ई मेले की ओर झुंड बनाकर गांव के गांव उमड़ पड़े। नये कपड़ों में सिर पर मोर के पंख सजायें, मोती-गोरी-कौड़ी पहने आदिवासी घूम-घूम कर मेले में रस लेते रहे। अचार-चिरोंजी देकर बहुतों ने नमक खरीदा। लेन देन के बाद शाम को रेला लौट पड़ा। एक झाड़ के नीचे बैठकर, लोकू और मल्लू अपनी तम्बू से ढ़ाल-ढालकर शराब पीने लगे। ढलती शाम की छाया में काल की लम्बी बांहे बढ़ती आ रही थी। क्षण भर में पास की झाड़ी से सनसनाते हुए दो तीर आये । विषबुझे तीर थे। चीत्कार के साथ लोकू और मल्लू ढेर हो गये। कायरता की कुरूपता से प्रणय-व्यापार करने वालों की लीला समाप्त हो गयी। बदला लेकर बहार भागती हुयी नाले के पार पहुंची। सेमर के ऊंचे पेड़ पर चढ़कर फुनगी तक पहुंच गयी और वहां से चट्टानी नाले में कूद पड़ी। एक पल शेरनी की भीषण दहाड़ की तरह पत्थर चिरने वाली चीख उठी, और उसी वक्त शान्त हो गयी। थोड़ी ही दूर पर जहां सिंगार की लाश के टुकड़े गिद्ध-सियारो से नोचे जाने पर विचार थे, वहीं दूसरी बहिन की हड्डियां भी चूर-चूर होकर फैल गई। बहार की लाश एक दिन तक बची रही, क्योंकि वनराज उन अवशेषों की रक्षा करता रहा; पलाश के पत्तों से उस ढंक दिया ।

दूसरी सुबह रोषावेशित घटाएं कड़क उठी। जोरों का अन्धड़-तूफान था। झाड़ चरमराये, टूटे भयानक धारा-सम्पात में बड़े बड़े पत्थर लुढ़कने लगे, बहने लगे। नाले में प्रलयकारी पूर था; हड्डियां बह गयी। झोपर जानवर, फसल सब कुछ चैपट करने के बाद तफान रूका। लेकिन मडिया के काष्ठदेव न जाने कहाँ बह गये आज भी नाला घरघराता है, शेर पार आता है, पानी-पीकर विश्राम करता है, बिना किसी को छेड़े, मौन विषाद लिये चुपचाप चला जाता है। रात गाढ़ी होती गयी लेकिन धुंधली रेखायें किसी याद में उभरने लगी-

  1. ‘‘बड़े ही कोहे-सहरा है, मगर दामन पसारे है।
    उन्हें भी प्यास लगती है, जो दरिया के किनारे है।’’

अब न तो बरगद की छाँह है, न बिरहा, न बहार, न साज, न सिंगार, कुछ भी नहीं-कुछ भी नहीं!! केवल घने झुरमुट है, बॉस, बबूल, बेर के; सॉपों की बॉबियाँ भी बहुत है! जंगल मुहकमे की ओर से ऊंचे टीले पर, लकड़ी के पटिये पर ऊपर काले अक्षरों में लिखा है- ‘‘सावधान, खतरा! नाला सिंगार-बहार !!’’

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