केंद्र सरकार की नीतियां किसानों के साथ आम जनता को लूटने का मार्गः बिस्सा

 

किसान बर्बाद हो जायेगा और पूरा राष्ट्र लुटने को मजबूर रहेगा

वरिष्ठ कांग्रेस नेता राजेश बिस्सा कहा कि केंद्र सरकार ने जिस तरह अपनी कैबिनेट में जनविरोधी निर्णय लिए हैं उस पर व्यापक चिंतन, मनन और विरोध होना चाहिए वरना आने वाले समय में इन निर्णयों का दंश किसानों के साथ-साथ आम जनमानस को भी झेलने पड़ेगा।

केंद्र सरकार ने निर्णय लिया है कि –

1. राष्ट्र एक बाजार नीति के तहत किसान अपनी फसल को देश में कहीं भी बेच सकेगा।

2. आवश्यक वस्तु अधिनियम 1955 को संशोधित कर दिया गया है। अब उपज का भंडारण अनिश्चित मात्रा में किया जा सकेगा।

3. सहकारी बैंकिंग के क्षेत्र में मल्टीनेशनल कंपनियां भी आ सकेंगी।

4. कंपनियां कांटेक्ट फॉर्मिंग कर सकेंगी।

बिस्सा कहा कि एक राष्ट्र एक बाजार नीति की घोषणा करके मोदी सरकार ने एक बार फिर किसानों को मल्टीनेशनल कंपनियों का गुलाम बनाने की दिशा में कदम उठा लिया है सुनने में तो बहुत अच्छा लगता है कि जहां ज्यादा पैसा मिलेगा वहां किसान अपनी उपज को बेच सकेगा लेकिन सामान्य दृष्टि डालें तो जो किसान अपनी फसल को बमुश्किल मंडी या सहकारी समितियों तक ला कर समर्थन मूल्य पर बेच पाता है क्या अपनी उपज को अन्य शहरों या प्रदेशों मैं ले जाकर बेच पाएगा?

बिस्सा ने कहा की बात यहीं पर आकर नहीं थमती आने वाले समय में इसका सीधा दुष्प्रभाव यह पड़ेगा कि सरकार न्यूनतम मूल्य पर खरीदी व्यवस्थआ ध्वस्त हो जायेगी और किसानों को मल्टीनेशनल कंपनियों का मोहताज बना देगी।

बिस्सा ने कहा की किसान शोषण का शिकार ना हो जाए इसलिए न्यूनतम मूल्य निर्धारित किए गए थे। जिसको वह अपनी समीप की मंडी में बेच सकता था। आने वाले समय में यह प्रक्रिया समाप्त हो जाएगी किसान वापस मल्टीनेशनल कंपनियो का गुलाम बनकर रह जाएगा।

आवश्यक वस्तु अधिनियम 1955 में संशोधन करके अनाज भंडारण की लिमिट को खत्म कर दिया गया है। इससे अनाज के भंडारण के ऊपर निजी कंपनियों का आधिपत्य हो जाएगा जिसका अंतिम दुष्परिणाम मुनाफाखोरी के रूप में हमारे सामने आएगा

केंद्र सरकार ने निर्णय लिया है कि कंपनियां कॉन्ट्रैक्ट फार्मिंग कर सकेंगी अर्थात किसानों की जमीन पर बड़े-बड़े मल्टीनेशनल आकर खेती किसानी करेंगे धीरे-धीरे यह जमीने कब उनकी हो जाएंगी पता भी नहीं चल पाएगा और जो किसान आज मालिक है वह श्रमिक बने रहने की स्थिति में भी नहीं रहेगा। इस बात के कई उदाहरण हमारे सामने हैं

केंद्र सरकार के निर्णय के बाद बैंकिंग सहकारिता के क्षेत्र में भी बड़ी बड़ी मल्टीनेशनल कंपनी आएंगी और ना जाने कब चिटफंड कंपनियों की तरह लोगों को लूट कर चली जाएगी पता भी नहीं चलेगा।

नेहरू जी ने आवश्यक वस्तु अधिनियम लाया था, लाल बहादुर शास्त्री ने मूल्य निर्धारण के लिए अगुवाई की, इंदिरा जी ने बैंकों का राष्ट्रीयकरण कर उसे आम जनता तक पहुंचाया, सरदार बल्लभ भाई पटेल ने जो सहकारिता का आंदोलन शुरू किया था उस पर अब केंद्र सरकार की दुर्भाग्यजनक गिद्ध दृष्टि पड़ चुकी है और वह वापस राष्ट्र को गुलामी की दिशा में धकेलने के लिए अग्रसर हो रही है।

बिस्सा ने सभी से अपील की है कि इसे व्यापक स्वहित में जरूर सोचें चिंतन मनन करें और शासन को अपने निर्णय को वापस लेने के लिए मजबूर करें वर्ना अभी तो ताली और थाली पीटी है सिर्फ माथा पीटना ही उपाय रह जायेगा।

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