झूठ की नींव पर खडे चीन के दावे 

डा समन्वय नंद

कम्युनिस्ट चीन के सरकार नियंत्रित समाचार पत्र ‘ग्लोबल टाइम्स’ में पिछले दिनों एक समाचार प्रकाशित हुआ जिसमें गत जुन माह में गलवान घाटी में भारतीय सैनिकों के साथ संघर्ष में उसके पांच सैनिकों के मारे जाने की बात स्वीकार की गई है । इस समाचार में इन चीनी सैनिकों के बारे में विस्तृत ब्योरा दिया गया  है तथा यह बताया गया है कि इसमें से चार सैनिकों को मरणोपरांत चीनी सरकार द्वारा सम्मानित किया गया है ।

गलवान घाटी में हुए संघर्ष में भारत के 20 सैनिकों ने बलिदान दिया था । भारत व विश्व के अनेक सैन्य विशेषज्ञों ने इस संघर्ष में चीनी सेना को भारी नुकसान होने की बात कही थी । इसमें काफी अधिक  चीनी सेना के सैनिकों की मारे जाने की बात  विशेषज्ञ कर रहे थे ।

चीन इसमें किसी भी सैनिक के मारे जाने की बात अब तक स्वीकार कर  नहीं रहा था ।  वैसे देखा जाए तो चीन ने इसमें  अपने सैनिक मारे जाने की बात न स्वीकार कर रहा था और न ही इसका खंडन कर रहा  था । इसलिए इस पर भ्रम  की स्थिति थी ।

पहली बार ऐसा हुआ कि चीन ने सार्वजनिक रुप से इस बात को स्वीकार किया है कि उस संघर्ष में उसके सैनिक मारे गये हैं । यह बात स्वीकार करने में उसे 8 माह का समय लग गया।  चीन जो बोल रहा है कि उसके पांच लोग ही मारे गये यह सही या नहीं है । चीन के ट्रैक रिकार्ड को देखते हुए वह इस बारे में सही आंकडा विश्व के सामने देगा इसे यकीन करना कठिन है । इस संघर्ष पर नजर रखने वाले भारतीय व विश्व के अन्य सैन्य विशेषज्ञ इसमें चीन को भारी नुकसान होने की बात कह चुके हैं । लेकिन चीन सभी सच्चाइयों को मान लेगा ऐसा लगता नहीं है ।

काफी लोगों को लगता होगा कि चीन अपने सैनिकों के मारे जाने की बात को छुपाता कैसा है ।  भारत जैसे देश में लोगों को लिए एक आश्चर्य से भरा प्रश्न है ।  इस प्रश्न पर उत्तर खोजने से पहले हमें इस बात पर ध्यान देना होगा कि चीन कोई लोकतंत्र नहीं है और वह विशुद्ध रुप से कम्युनिस्ट देश है  । वहां की व्यवस्था लोकतांत्रिक नहीं बल्कि कम्युनिस्ट  हैं । अतः वहां पर समाचार पत्रों व संचार माध्यमों पर रोक है । चीनी सरकार यानी कम्युनिस्ट चीन की स्टेट नियंत्रित मीडिया वहां काम करती है । अर्थात वहां कोई आम आदमी या संस्था संचार माध्यम चला नहीं सकता चीनी सरकार ही  मीडिया चला सकती है । कौन सी सूचना जानी है और कौन सी सूचना नहीं जानी है यह सरकार ही निर्धारित करती है । वहां कोई विदेशी सोशल मीडिया के मंच भी नहीं है । समस्त प्रकार के सोशल मीडिया के प्लैटफार्म चीन में प्रतिबंधित है । चीन सरकार द्वारा तैयार सोशल मीडिया प्लैटफार्म ही वहां के नागरिक इस्तमाल करते हैं । इसमें कांटेंट को भी चीनी कम्युनिस्ट सरकार नियंत्रित करती है ।

1962 में भारत के साथ हुए युद्ध में भारत भले ही पराजित हो गया था लेकिन भारत के जाबांज सैनिकों ने चीनी सेना के अनेक  सैनिकों को मौत के घाट उतार दिया था । चीन ने इसमें उसके कितने सैनिक मारे गये इसका कभी सरकारी तौर पर खुलासा नहीं किया । चीन की वर्तमान पीढी इस बात से अंजान है कि  1962 में भारत के साथ चीन का युद्ध हुआ था और उसके देश के काफी सैनिक इसमें मारे गये थे । इसी से सूचनाओं  के प्रसारण पर चीन का कितना नियंत्रण है इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है ।

लेकिन हाल ही के दिनों में दुनिया खुल सी गई है और चीनी युवा पढने के लिए व अन्य कामों के लिए बाहर के देशों में आ रहे हैं । इस कारण बाहरी स्रोतों से उन्हें कुछ जानकारियां मिलने लगी है । शायद यही कारण है कि चीन को आठ माह बाद अपने सैनिकों की मारे जाने की बात ( भले ही कम संख्या  में हो) स्वीकार करनी पडी  है ।

उपरोक्त बातों से यह स्पष्ट है कि चीन द्वारा जब भी कोई दावा किया जाता है तो उसकी किसी अन्य  किसी इंडिपेंडेंट स्रोत से पुष्टि करना संभव नहीं है । इसलिए चीन द्वारा अपने देश में तेजी से विकास की बात हो या फिर उसकी  सैन्य शक्ति की बात हो या फिर  अन्य विषयों पर जो दावा किया जाता है उस पर प्रश्न चिह्न खडा होना स्वाभविक है ।

चीन अपने आप को एक विशाल सैन्य शक्ति संपन्न देश के रुप में दावा व प्रचारित करता रहता है ।  1962 में भारत को चीन से इस कारण पराजित होना पडा था क्योंकि भारत की किसी प्रकार की तैयारी नहीं थी । चीन जब भारत के खिलाफ युद्ध की तैयारी कर रहा था तब तत्कालीन भारत का नेतृत्व व कम्युनिस्ट बुद्धिजीवी  हिन्दी- चीनी भाई भाई नारे पर नाचने में व्यस्त थे । इसके बावजूद यानी बिना तैयारी के भी भारत के जाबांज सैनिको ने चीन की काफी नुकसान पहुंचाया था । इसके बाद चीन ने किसी प्रकार की लडाई नहीं लडी । विएतनाम में चीन को भारी नुकसान उठाना पडा ।

लेकिन इसके बावजूद भी चीन अपने आप को काफी शक्तिशाली सैन्य शक्ति के रुप में प्रचारित करता रहता है । भारत में व कुछ अन्य देशों में उसके कुछ समर्थक इस बात को बताने में लगे रहते थे हैं । चीन मनोवैज्ञानिक रुप से दूसरे देशों के लोगों को भयभीत रखना चाहता है ।

क्योंकि चीन के दावे झूठे व अविश्वसनीय होती हैं, इस कारण वह अपने प्रोपांगडा के लिए भारी धनराशि खर्च करता है । पिछले साल अमेरिका में चीन की इस रणनीति के बारे में बडा खुलासा हुआ था । युएस डिपार्टमेंट आफ जस्टिस में पिछले साल कुछ चौकाने वाले  दस्ताबेज  प्रदान किये गये थे  । उसमें इस बात का उल्लेख था   कि चीनी कम्युनिस्ट पार्टी के नियंत्रणाधीन चाइना डेली की ओर से 2016 नवंबर के बाद से ही विभिन्न अमेरिकी समाचार पत्रों को 19 मिलियन अमेरिकी डालर प्रदान किया गया है।  भारत में भी ऐसे अनेक एंकर व रणनीतिक विश्लेषक मिलते हैं जो दिन रात अखबारों में व टीवी शो में चीन की  प्रशंसा करते नहीं थकते और भारत को मनोवैज्ञानिक रुप से परास्त करने का प्रयास करते देखे जा सकते हैं ।

दुर्भाग्य की बात यह है कि भारतीय विश्वविद्यालयों व अन्य संस्थानों में जो शोध होता है उसमें चीन  द्वारा किये जाने वाले  अविश्वसनीय दावों को प्रामाणिक मान कर आगे का काम किया जाता है । आवश्यकता इस बात की है कि चीन के झूठे दावों के बजाय प्रामाणिक तथ्यों को शोध कार्य को आगे बढाया जाए ।

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