मोदी सरकार के पिछले 6 वर्षो के कार्यकाल में किसानों के साथ निरंतर छल किया सीएम भूपेश बघेल

मंत्री रविन्द्र चौबे, मंत्री मोहम्मद अकबर, मंत्री डॉ. शिवकुमार डहरिया, कोषाध्यक्ष रामगोपाल अग्रवाल, प्रदेश उपाध्यक्ष गिरीश देवांगन और प्रदेश कांग्रेस संचार विभाग के अध्यक्ष शैलेश नितिन त्रिवेदी की उपस्थिति में

भारत में कोई भी संस्था या व्यक्ति या पद संविधान से ऊपर नहीं है। हम सब संविधान के बनाए और बताए हुए दायरे में रहकर अपना-अपना काम करते हैं।
चाहे वह संसद हो या राज्य विधान मंडल, कानून बनाने की शक्ति संविधान ने कुछ खास विषयों और सीमाओं के अंतर्गत प्रदान की है। अनुच्छेद 246 से लगी हुई सातवीं अनुसूची में तीन सूचियां दी गई हैं, जिन पर संसद और विधान मंडल कानून बना सकते हैं। संविधान द्वारा बनाई गई संघीय ढांचे की व्यवस्था में सूची एक अर्थात संघ सूची में दिए गए विषयों पर कुल 97 प्रविष्टियां हैं जिन पर केंद्र कानून बनाता है ।इसी तरह सूची दो में बताए गए कुल 66 विषयों पर राज्य विधान मंडल कानून बना सकते हैं। तीसरी अर्थात समवर्ती सूची में दिखाए गए 47 विषयों पर केंद्र और राज्य दोनों कानून बना सकते हैं, लेकिन विरोध की सीमा तक ऐसे मामलों में केंद्र का कानून लागू होगा। जहां तक कृषि संबंधी मामलों पर कानून बनाने का अधिकार है संघ सूची में एक भी विषय ऐसा नहीं है जिसके अंतर्गत एकमेव रूप से कृषि से संबंधित मामलों पर केंद्र को कोई कानून बनाने का अधिकार है।
राज्य सूची की प्रविष्टि 14, 18 ,30 ,46, 47, 48 में कृषि से संबंधित अनेक विषय ऐसे हैं जिन पर कानून बनाने का अधिकार राज्यों को ही है।
रही समवर्ती सूची की बात तो उसमें प्रविष्टि 6 कृषि भूमि से भिन्न संपत्ति का अंतरण ,अभिलेखों और दस्तावेजों का रजिस्ट्री कराने तथा प्रविष्टि 33 में खाद्य पदार्थ जिनके अंतर्गत खाद्य तिलहन और तिल पशुओं के चारे जिसके अंतर्गत खली और अन्य चारे हैं ,कच्ची कपास, कच्चा जूट का व्यापार वाणिज्य, प्रोसेसिंग, प्रदाय और वितरण इतना भर संसद द्वारा विनियमित किया जा सकता है।
अब आइए देखें कि अध्यादेश का स्थान लेने वाले और संसद द्वारा पारित विधेयकों में दिए गए प्रावधानों के अनुसार किन किन विषयों का स्पर्श होता है। पहली नजर में पाएंगे आप कि कृषि कर्म, उसका उत्पादन,कृषि उपज का प्रसंस्करण ,उसका विपणन सभी कुछ इस कानून द्वारा कवर किया जा रहा है।
ऐसे में विचार किया जाएगा कि जिन विषयों पर संसद को कानून बनाने की शक्ति ही नहीं है उन विषयों पर केंद्र कैसे तो अध्यादेश जारी कर सकता है? कैसे इन अध्यादेशों को प्रतिस्थापित करने वाले विधेयक संसद के सदनों द्वारा पारित किए जा सकते हैं और किस प्राधिकार के अंतर्गत राष्ट्रपति उन्हें अपनी मंजूरी देकर पूरे देश में लागू करा सकते हैं। सारा मामला अधिकारातीत कार्यवाही का है। अर्थात जिस विषय पर कानून बनाने का और उसे लागू करने का अधिकार संसद को नहीं है उस विषय पर भी प्रक्रिया नियमों को शिथिल करके कानून बनाना कहां तक तर्कसंगत और संविधान सम्मत है।
तीनों विधायकों के संबंध में संसद के प्राधिकार और वैधानिक सक्षमता का परीक्षण करा कर राजनीतिक और विधिक कार्यवाही की जा सकती है।

ऽ वर्तमान विपदा के काल में केन्द्र सरकार द्वारा जून 2020 में 3 अध्यादेश लाये गये जिसमें कथित रूप से किसानों को अपनी उपज को देश के किसी भी भाग में विक्रय की आजादी, कान्ट्रेक्ट फार्मिंग की अनुमति तथा अनाजों के निजी व्यापारियों के भंडारण की सीमा समाप्त करने जैसे बातें कही गयी है।
ऽ इसी दौरान संसद के दोनों सदनों में तीनों विधेयकों को बिना किसी बहस एवं बिना मतदान के ही पूर्णतः गैर लोकतांत्रिक ढंग से पारित करा लिया गया।
ऽ उक्त तीनों विधेयकों के दुष्परिणाम को देखते हुये देश भर के क्षुब्ध किसान आंदोलनरत है।
ऽ केन्द्र सरकार न तो कथित ‘‘किसान हितैषी विधेयक को संसद में लाने के पूर्व तथा न ही उसके बाद किसानों से चर्चा की गयी।
ऽ किसान इस कारण भयभीत है कि आने वाले समय में केन्द्र सरकार एमएसपी की व्यवस्था को ही समाप्त कर सकती है क्योंकि निजी क्षेत्र के व्यक्तियों को सामानांतर मंडी खोलने की अनुमति दी जा रही है।
ऽ किसानों को यह आशंका है कि ‘‘कांटेक्ट फार्मिंग’’ की आड़ में किसानों की भूमि कार्पोरेट घराने को दिये जाने की तैयारी की जा रही है।
ऽ केन्द्र सरकार द्वारा उक्त तीनों विधेयक शांता कुमार समिति की सिफारिशों (2015) के क्रियान्वयन हेतु लाये गये हैं।
ऽ शांता कुमार समिति द्वारा यह भी सिफारिश की गयी है कि धीरे-धीरे एफसीआई खाद्यान्न की खरीदी बंद करें, एमएसपी पर खाद्यान्न क्रय करने के बजाय किसानों को उनके खातों में नकद राशि ट्रांसफर की जाये।
ऽ खाद्य सुरक्षा का लाभ 67 प्रतिशत आबादी के स्थान पर मात्र 40 प्रतिशत लोगों को ही मिले तथा उपभोक्ताओं को भी नकद राशि दी जाये ताकि वे खुले बाजार से खाद्यान्न क्रय कर सकें।
ऽ आने वाले समय में गरीब, किसान एवं मजदूरों को असंख्य कठिनाईयों का सामना करना पड़ेगा क्योंकि केन्द्र सरकार कृषि उपज के उत्पादन, संग्रहण एवं विपणन की पूरी व्यवस्था निजी क्षेत्र के हवाले करना चाहती है।
ऽ प्रदेश/देश वासियों को इस आसन्न संकट से बचाने के लिये समय की मांग है कि एकजुट होकर केन्द्र सरकार के षड़यंत्र के विरूद्ध सशक्त आंदोलन आरंभ किया जाये, जिससे केन्द्र सरकार को विवश होकर उक्त अधिनियमों को वापस लेना पड़े।

शांता कुमार समिति
गठन- 20 अगस्त 2014 को भारतीय खाद्य निगम की प्रचलनात्मक कार्य कुशलता और वित्तीय प्रबंधन में सुधार हेतु रिपोर्ट प्रस्तुत करने के उद्देश्य से।
रिपोर्ट 21 जनवरी 2015 को भारतीय खाद्य निगम की भूमिका को नई शिक्षा देने तथा उसके पुनर्नवीनीकरण के बारे में उच्च स्तरीय कमिटी की रिपोर्ट प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को सौप दी।
समिति की प्रमुख अनुशंसाये निष्कर्ष निम्नानुसार है
1 देश के मात्र 6 प्रतिशत किसान ही न्यूनतम समर्थन मूल्य पर अपनी उपज शासकीय एजेसिंयो को विक्रय कर पाते है। अन्य किसानों को एमएसपी की जानकारी तक नही रहती। उत्तर-पश्चिमी राज्यों के बड़े किसान मात्र ही एमएसपी का लाभ उठा पाते है।
2 पी़. डी. एस. का 40 से 60 प्रतिशत अनाज हितग्राहियों को न मिलकर ब्लैक मार्केट में बिक जाता है।
3 एफसीआई के पास बफर स्टाक की तुलना मं दो गुना अनाज जमा हो चुका है। जिससे खुले बाजार में अनाज की उपलब्धता में कमी आती है। जिससे खाद्यानों का मूल्य बढ़ जाता है।
4 58 प्रतिशत बीपीएल परिवारो तक पीडीएस का खाद्यान्न नही पहुंच पाता।
5 सिर्फ 11 राज्यो द्वारा ही खाद्यान्न सुरक्षा अधिनियम 2013 के प्रावधानो का लागू किया गया।
6 उपरोक्त कारणो से एफसीआई की व्यवस्था असफल सिद्ध हुई है।
7 पंजाब, हरियाणा, आंधप्रदेश, छत्तीसगढ, मध्यप्रद्रेश, एवं उड़ीसा राज्यों को खाद्यान्न संग्रहण का पर्याप्त अनुभव हो चुका है। अत इन राज्यो में एफसीआई को खाद्यानों का संग्रहण नही करना चाहिये बल्कि इन राज्यो को ही खाद्यान्न संग्रहण का कार्य सौंपा जाना चाहिये।
8 एफसीआई को पूर्वी उत्तर प्रदेश, बिहार, पश्चिम बंगाल एवं आसाम जैसे राज्यो में खाद्यान्न का संग्रहण करना चाहिये जहां लघु एवं सीमान्त कृषकों का शोषण होता है।
9 खाद्यान्नों के संग्रहण में निजी क्षेत्र की भूमिका बढ़ायी जानी चाहिये। यदि एमएसपी से बाजार में कम दाम मिलता है तो किसानो को अंतर की राशि की भरपाई करना चाहिये।
10 एमएसपी के अतिरिक्त् बोनस दिये जाने पर प्रतिबंध होना चाहिये।
11 एफसीआई के पास खाद्यान्नों के बफर स्टाक की सीमा के अतिरिक्त अनाज तत्काल खुले बाजार में विक्रय किया जाना चाहिये।
12 किसानों को डीबीटी के माध्यम से 5000 से 10000 रूपये प्रति हेक्टेयर की दर से सब्सिडी दिया जाना चाहिये। जिससे किसान अपने विवेक एवं बाजार की स्थिति को देखकर सब्जी, दाल, खाद्यान्नों के अतिरिक्त अन्य उपज उगाये एवं आवश्यकतानुसार खाद क्रय करे।
13 उपभोक्ताओं को पीडीएस व्यवस्था के अंतर्गत खाद्यान्न वितरण के स्थान पर डीबीटी के माध्यम से नकद सब्सिडी दिया जाना चाहिये। अन्त्योदय परिवारों को 700 रूपये प्रतिमाह, प्राथमिकता परिवारो को 500 रूपये प्रतिमाह नकद दिये जाये। जिससे उपभोक्ता अपनी पसंद अनुसार खुले बाजार से क्रय कर सके। शेष उपभोक्ताओं को रियायती दर पर राशन दिये जाने की आवश्यकता नही है।
14 वर्तमान में देश की 67 प्रतिशत आबादी को खाद्यान्न सुरक्षा का लाभ मिल रहा है। जिसे कम कर 40 प्रतिशत तक सीमित किया जाना चाहिये।
15 2 एवं 3 रूपये प्रति किलो गेहूं एवं चावल के स्थान पर चावल पर गेहूं के एमएसपी के आधे तथा बाजार मूल्य के अंतर की राशि डीबीटी के माध्यम से दिया जाना चाहिये उदारण गेहूं का एमएसपी 14 रूपये प्रति किलो है तथा बाजार मूल्य 30 रूपये प्रति किलो है तो 14 रूपये का आधा अर्थात 7 रूपये छोड़कर शेष 23 रूपये प्रति किलों की दर से सब्सिडी दिया जाना चाहिये।
वर्तमान में जो 3 कृषि विधेयक लाये गये है उनके अवलोकन से यह प्रतीत होता है कि वास्तव में मोदी सरकार शांता कुमार समिति की सिफारिशों को बैक डोर से लागू करना चाहती है यह देश के किसानों के साथ बड़े षडयंत्र का आगाज है। शांता कुमार समिति की 3 सिफारिशों, कृषि उपजों पर बोनस पर प्रतिबंध, कृषि उपज खरीदने में निजी क्षेत्र की भागीदारी तथा स्टाक लिमिट की समाप्ति जिससे एफसीआई की भूमिका कम हो सके को वास्तव में 3 विधेयकों के माध्यम से ही लागू किया गया है।
निकट भविष्य में कृषि उपजों की शासकीय ऐजेन्सियों द्वारा एमएसपी पर खरीदी या तो समाप्त करने अथवा करने अथवा न्यूनतम रखने की भूमिका तैयार हो चुकी है। इसी तरह जब खाद्यान्नों की एमएसपी पर खरीदी न्यूनतम होगी अथवा बंद हो जायेगी। तो पी. डी. एस. व्यव्सथा के द्वारा उपभोक्तओं को खाद्यान्न वितरण के स्थान पर डी. बी. टीत्र के माध्यम से आधी अधूरी नकद राशि के भुगतान की भी तैयारी है।
शांता कुमार समिति की अनुशंसाये गलत तथ्यों पर आधारित है जान बूझकर यह भ्रम फैलाया जा रहा है। कि मात्र 6 प्रतिशत किसानों को एमएसपी का लाभ मिलता है। यह इसलिए कहा जाता है ताकि इसकी आड़ में एमएसपी पर खाद्यान्न संग्रहण बंद किया जा सके। छत्तीसगढ़ राज्य में गत वर्ष 85 से 90 प्रतिशत पंजीकृत धान उत्पादकों को एमएसपी का लाभ मिला है। पंजाब, हरियाणा जैसे राज्यों में भी लगभग सभी किसानों को एमएसपी का लाभ प्राप्त हो रहा है। देश की मुख्य फसले गेहू एवं धान चावल है किसी भी राज्य के गेहू एवं धान उत्पादक किसानों में 50 प्रतिशत से कम किसानों को एमएसपी का लाभ न मिलना संभव नही है यदि इतने किसानो को एमएसपी का लाभ मिल रहा है। तो भारत सरकार को राज्यो से चर्चा कर एमएसपी से लाभान्वित कृषकों की संख्या बढ़ाने की योजना तैयार करना चाहिये एमएसपी की व्यवस्था समाप्त करना कोई समाधान नही है।
वर्ष 2013 से लागू राष्ट्रीय खाद्यान्न सुरक्षा अधिनियम के प्रावधानों से देश के ग्रामीण क्षेत्रो की 75 प्रतिशत तथा शहरी क्षेत्रो की 50 प्रतिशत आबादी को लाभ हो रहा है। यह एक अत्यंत क्रांतिकारी अधिनियम है जिससे देश मे ंभुखमरी की समस्या समाप्त हो चुकी है। शांता कुमार समिति का यह निष्कर्ष अत्यंत आपत्ति जनक है कि पी. डी. एस. व्यवस्था के खाद्यान्न की बड़ी मात्रा में काला बाजारी हो रही है। अतः इसके स्थान पर उपभोक्ताओं को डीबीटी के माध्यम से नकद राशि दी जाये तथा एनएफएसए का कव्हरेज कम कर उसे 40 प्रतिशत तक सीमित किया जाये।
मोदी सरकार के पिछले 6 वर्षो के कार्यकाल में किसानों के साथ निरंतर छल किया गया हैं एमएसपी मे न्यूनतम वृद्धि स्वामीनाथन समिति की सिफारिशो की घोषणा करने के बाद लागू न करना, खाद्यान्नों पर बोनस दिये जाने पर प्रतिबंध तथा आय दुगुनी करने का भ्रम फैलाना आदि तथ्यों को देखा जाये तो यह स्पष्ट हो जाता हैं कि मोदी सरकार किसान विरोधी सरकार हैं किसानों के साथ-साथ देश की गरीब जनता को खाद्यान्न सुरक्षा से भी वंचित करने का षडयंत्र जारी है। विगत 6 वर्षो में जिस तरह कुछ चुनिन्दा औधोगिक घरानों को राजकीय संरक्षण में फलने- फूलने के अवसर दिये गये हैं उससे यह संदेह होना स्वाभाविक है कि कृषि एवं पीडीएस की पूरी व्यव्सथा को कार्पोरेट घरानो को सौपने की तैयारी आरंभ हो चुकी है। जिससे किसानों एवं गरीब परिवारों का भविष्य कष्ट मय होना निश्चित है।
यह अत्यंत आश्चर्य जनक है कि मोदी सरकार कह रही है कि 3 विधेयको से किसानों के जीवन में सकारात्मक परिवर्तन आयेंगे किंतु देश के आंदोलनरत किसानों से मोदी सरकार का कोई नुमाइन्दा जाकर चर्चा करने तथा उनका भ्रम दूर करने को तैयार नही है।
आज समय की आवश्यकता है कि पूरे देश के गरीब, किसान, मजदूरो, एवं माध्यम वर्ग को मोदी सरकार के षडयंत्रो से भली भांति अवगत कराया जाये। सभी राजनीतिक दलों का यह दायित्व है कि अपने कार्यकताओं को प्रशिक्षित कर मोदी सरकार के षडयंत्र को जन-जन तक पहुंचाया जाये तथा इतना व्यापक जन आंदोलन आरंभ किया जाये तथा सरकार पर इतना दबाव बनाया जाये कि मोदी सरकार अपने मन्सूबों में कामयाब न हो सके।

मोदी सरकार के किसान विरोधी कार्य
(1) लोकसभा चुनाव 2014 के पूर्व मोदी जी ने वादा किया था कि स्वामीनाथन समिति की अनुशंसाओं को लागू किया जायेगा। अर्थात् लागत का डेढ़ गुना समर्थन मूल्य दिया जायेगा। अनुशंसा-Input cost+Family labour+Rent of Land =लागत, इस फार्मूले को C-2 भी कहा जाता है।
वास्तव में मोदी सरकार द्वारा सिर्फ Input cost+Family labour के आधार पर एमएसपी निर्धारित किया जा रहा है। किसानों के साथ छलावा।
(2) वर्ष 2016 में घोषणा की गयी कि 2022 तक किसानों की आय दुगुनी हो जायेगी। अभी तक किसानों की आय प्रतिवर्ष 5 प्रतिशत की दर से भी नहीं बढ़ी है, जबकि प्रतिवर्ष लगभग 12 प्रतिशत की दर से आय बढ़ना चाहिये थी। सबसे दुर्भाग्यजनक यह है कि सरकार के पास पिछले 4 वर्षो में किसानों की आय में वृद्धि के कोई आंकड़े नहीं है। वर्ष 2022 तक आय दुगुनी होने का लक्ष्य असंभव।
(3) वर्ष 2014 में केन्द्र में सरकार आते ही किसानों को कृषि उपजों पर बोनस दिये जाने पर प्रतिबंध लगा दिया गया।
(4) यूपीए सरकार के कार्यकाल (2004-14) की तुलना में 2014-20 में कृषि उपज की एमएसपी में वृद्धि कम। (तालिका संलग्न)

वास्तविक समस्या
. सरकार 23 कृषि उपजों के न्यूनतम समर्थन मूल्य की घोषणा करती है जबकि मात्र गेहूं एवं धान के एमएसपी पर क्रय करने की व्यवस्था। कुछ अन्य उपजों के क्रय की आधी अधूरी व्यवस्था है।
. शांता कुमार समिति की रिपोर्ट (2015) में यह बताया गया था कि ‘‘मात्र 6 प्रतिशत किसानों को एमएसपी का लाभ मिलता है।’’ स्पष्ट है कि देश के 94 प्रतिशत किसानों को एमएसपी से कम पर अपनी कृषि उपज को बेचने पर विवश होना पड़ता है। इस मूल समस्या का समाधान किये बिना किसानों का उद्धार होना संभव नहीं है।
. वर्तमान में मक्के का समर्थन मूल्य 1760 रूपये प्रति कि्ंवटल है जबकि देशभर में मक्का औसतन 1000/- प्रति क्विंटल पर बिक रहा है।
. मूंग का वर्तमान 7196 रूपये प्रति क्विंटल रूपये है जबकि देश भर में किसान 5000 से 5500 रूपये प्रति क्विंटल पर बेचने को विवश हैं।
. अन्य कृषि उपजों की हालत भी इससे बेहतर नहीं है।

3 नये विधेयक :-

– कृषक उपज व्यापार और वाणिज्य (संवर्धन और सरलीकरण) विधेयक 2020, (सरल शब्दों में एक राष्ट्र एक व्यापार या एपीएमसी संशोधन)

– कृषक (सशक्तिकरण व संरक्षण) कीमत आश्वासन और कृषि सेवा पर करार विधेयक 2020 (सरल शब्दों में कान्ट्रेक्ट फार्मिंग अनुज्ञेय)

– आवश्यक वस्तु (संशोधक) विधेयक 2020

(EC एक्ट 1955 में संशोधन, आपदा व युद्ध के अलावा खाद्यान्न के भंडारण की सीमा की समाप्ति)

उक्त तीनों विधेयक लोकसभा और राज्य सभा से पारित किये जा चुके है।

– उद्देश्य यह बताया गया है कि उसे बिचौलियों के शोषण से मुक्ति मिलेगी, ‘‘वन नेशन-वन मार्केट’’ से किसान को उसकी उपज का अधिकतम मूल्य प्राप्त होगा। किसान देश एवं दुनिया के बाजार से जुड़ जायेगा। कृषि उपज के भंडारण, विपणन व्यवस्था में निजी क्षेत्र का निवेश बढे़गा। किसानों का जीवन उन्नत होगा।

कमियां/आलोचनायें :-
. वर्तमान प्रावधानों के अनुसार भी किसान को अपनी उपज देश के किसी भी भाग में बेचने पर कोई प्रतिबन्ध नहीं है। यह भ्रम फैलाया जा रहा है कि नये कानून बनने के बाद किसानों को देश में कहीं भी उत्पादन बेचने की आजादी होगी।
. अभी भी E-NAM के माध्यम से किसानों के पास अपनी उपज देश की किसी भी मंडी में बेचने का अवसर है। नया कुछ नहीं है।
. देश के 86 प्रतिशत लघु एवं सीमांत कृषकों की श्रेणी में है। उन्हें एमएसपी की भी जानकारी नहीं होती। उनमें जागरूकता की कमी है, उनके पास साधनों की भी कमी है, परंपरागत ढंग से खेती करते है, उनसे यह अपेक्षा करना व्यर्थ है कि देश के अन्य भागों में अपनी उपज का विक्रय कर सकेंगे।
. मंडी व्यवस्था ने देश में कृषि विपणन की अधो-संरचना को मजबूत करने में महत्वपूर्ण योगदान दिया है। इससे लाखों हम्मालों, तौलेयों, आढ़तियों का जीवन यापन हो रहा है। नये कानून से इन सब पर गंभीर संकट आना तय है। मंडियों की आय समाप्त होने की पूर्ण संभावना है।
. यह अनुभव सिद्ध है तथा अर्थशास्त्र के मांग एवं आपूर्ति के सिद्धान्त पर आधरित है कि जब नयी फसल आती है तो बाजार में आपूर्ति अत्यधिक बढ़ जाती है, उस स्थिति में खुले बाजार में उस कृषि उपज का मूल्य निश्चित रूप से कम होगा। व्यापारी, निर्यातक, कार्पोरेट घराने किसानों से मनचाहे दामों पर कृषि उपज खरीदेंगे तथा भंडारण (Stocking) कर लेंगे, क्योंकि अब Stock रखने की सीमा भी समाप्त की जा रही है। जब बाजार में उस उपज का दाम बढ़ेगा तब उसे अधिक दर पर बेचकर व्यापारी भारी मुनाफा कमायेंगे।
. छत्तीसगढ़ राज्य में वर्तमान में लगभग 2000 केन्द्रों के माध्यम से धान के न्यूनतम समर्थन मूल्य पर संग्रहण की व्यवस्था है, जिस पर मंडी टैक्स भी भारत सरकार द्वारा दिया जाता है। इस बात की पूरी संभावना है कि भारत सरकार द्वारा संग्रहण केन्द्रों के माध्यम से धान खरीदी पर मंडी टैक्स का भुगतान न किया जाये क्योंकि संग्रहण केन्द्र ‘मंडी‘ के रूप में अधिसूचित नहीं है।
. बिहार में वर्ष 2006 से ही APMC Act को समाप्त किया जा चुका है। जिसके दुष्परिणाम सामने आ चुके हैं। बिहार के किसानों को संभवतः देश में उनकी उपज का सबसे कम मूल्य प्राप्त होता है। गत वर्ष बिहार से किसानों द्वारा उगाये गये गेहूं का 1 प्रतिशत से भी कम एमएसपी पर खरीदा गया।
. इन विधेयकों की सबसे अधिक आलोचना इस कारण से की जा रही है कि जून 2020 में इन विधेयकों को अध्यादेश के माध्यम से लाया गया। ऐसा समय जब पूरे देश की अर्थव्यवस्था चरमरा रही थी तथा कोरोना का प्रकोप पूरे देश पर था, इन्हें लाने का कारण समझ से परे था। देश के किसान जून से ही आन्दोलन रत हैं किन्तु सरकार ने कभी भी किसानों अथवा उनके प्रतिनिधियों से चर्चा कर उनकी आशंकाओं को दूर करने का कोई प्रयास नहीं किया गया। हद तो तब हुई जब राज्य सभा में बिना चर्चा के एवं बिना मत-विभाजन के ही दो विधेयकों को ध्वनि मत से पास कर दिया गया जबकि सदस्यों द्वारा मत-विभाजन की मांग की जाती रही। इस घटना से इन आशंकाआें को बल मिलना स्वाभाविक है कि सरकार एमएसपी एवं एफसीआई व्यवस्था को समाप्त कर कार्पोरेट घरानों को कृषि अर्थव्यवस्था को सौंपना चाहती है, ताकि किसान कार्पोरेट घरानों के हिसाब से कृषि उपज का उत्पादन करें तथा उन्हें कार्पोरेट घरानों द्वारा निर्धारित मूल्य पर बेचने को विवश हों। जिससे फिर से जमींदारी प्रथा की वापसी से इनकार नहीं किया जा सकता। अनपढ़ एवं जागरूकता के अभाव वाला किसान कार्पोरेट घरानों के साथ होने वाले विधिक अनुबन्ध को समझ नहीं सकेगा तथा अपने हितों की रक्षा के लिये अदालतों के चक्कर लगाने को विवश होगा।
. प्रस्तावित अधिनियमों में निजी निवेशकों को समानान्तर (Parallel) मंडियां खोलने का अधिकार दिया जा रहा है। चूँकि निजी मंडियों में कृषि उपज क्रय करने पर कोई टैक्स नहीं लगेगा अतः इस बात की संभावना है कि निजी मंडियों में मंडी तुलना में कुछ अधिक राशि किसानों को दी जा सकती है, जिससे धीरे-धीरे existing मंडियों में किसान जाना छोड़ दें। जिससे वर्तमान मंडी व्यवस्था समाप्त होने की पूर्ण संभावना है।
. कांट्र्र्रेक्ट फामिंग के अनुबन्ध में व्यापारी/कार्पोरेट घराने किसानों से उसकी उपज का मनचाहे दामों पर अनुबंध करेंगे। विधेयक में इस बात का प्रावधान नहीं है कि एमएसपी से कम दर पर फसल बेचने का अनुबंध नहीं किया जायेगा। इसके अतिरिक्त बाढ़, सूखे, अतिवृष्टि अथवा कीट प्रकोप की दशा में किसानों की क्षति की भरपाई का कोई प्रावधान नहीं है।
. वर्ष 2003 के Model APMC Act में भी कांट्रेक्ट फार्मिंग को अनुमति दी गयी थी। 14 राज्यों में Contract Farming Rules अधिसूचित किये गये थे। किन्तु अभी तक इससे किसानों की स्थिति में कोई सकारात्मक परिवर्तन नहीं देखा गया है। ( Contract Farming लागू करने वाले राज्य तमिलनाडु, गुजरात, महाराष्ट्र, कर्नाटक इत्यादि)।
. पंजाब में वर्ष 2013 में Contract Farming Act बनाया गया था किन्तु विभिन्न आशंकाओं को देखते हुए इसे आज तक लागू नहीं किया जा सका हैं।
. सिंचित क्षेत्रों में उद्यानिकी फसलों एवं नकदी की फसलों हेतु Contract Farming कुछ हद तक उपयोगी हो सकती है लेकिन पंजाब, हरियाणा, छत्तीसगढ़ जैसे राज्य जो मुख्यतः गेहूं/चावल जैसे खद्यानों का उत्पादन करते हैं उनके लिये यह व्यवस्था कतई उपयुक्त नहीं है। उनके लिये एमएसपी एवं मंडियों की वर्तमान व्यवस्था ही अधिक उपयुक्त है।
. प्रस्ताविक विधेयकों में निजी निवेशकों को भंडारण, कोल्ड चेन बनाना तथा उसी परिसर में किसानों से उनकी उपज क्रय का प्रावधान रखा गया हैं किसानों को उनकी उपज का 3 दिनों में भुगतान का भी प्रावधान रखा गया है। एक बार जब किसान अपनी उपज लेकर निवेशक के पास जायेगा तो उसे निवेशक द्वारा बताये गये मूल्य पर उपज बेचने की मजबूरी होगी। निवेशक उसकी फसल में गुणवत्ता की कमी बताकर उसकी उपज लेने में आना कानी कर सकता है। उसी तरह 3 दिनों में फसल के भुगतान न किये जाने पर भी किसान निजी निवेशक के विरूद्ध कोई कार्यवाही कर सके इसमें संदेह ही है।
. केन्द्र सरकार की इस आधार पर भी आलोचना हो रही है कि कृषि संविधान में राज्य सूची (State Subject) के रूप में उल्लेखित है। अतः ऐसे में राज्यों की सहमति अथवा उनसे व्यापक विचार-विमर्श के बिना इस तरह के कानून बनाना असंवैधानिक है तथा संघीय ढांचे के विपरित है। इस तरह संविधान बदलने का प्रयास हो रहा है।
. प्रधानमंत्री जी कह रहे हैं कि कांग्रेस ने लोकसभा चुनाव 2019 के घोषणा पत्र में APMC Act समाप्त करने का वादा किया था। अतः वर्तमान विधेयक का विरोध करते समय सावधानी बरतना आवश्यक है कि कांग्रेस अन्य तरह से APMC Act समाप्त करती, जिससे किसानों के हित सुरक्षित रहते।
. मध्यप्रदेश में पूर्व मुख्यमंत्री कमलनाथ से ITC के साथ Contract Farming Act अर्न्तगत ही कृषि उपजों को विक्रय का अनुबन्ध किया था। इस संबंध में भी कांग्रेस की स्थिति स्पष्ट होना चाहिये।

आज इस बात की आवश्यकता है कि देश भर के किसानों को सरकार की असली मन्शा की जानकारी दी जाये एवं सरकार पर इतना दबाव बनाया जाये कि सरकार इन विधेयकों/कानूनों को वापस लेने पर बाध्य हो जाये।

श्रम कानूनों के पारित विधेयक

श्रम 7 वी अुनुसूची की समवर्ती अनुसुची के अंतर्गत आता है जिसमें केन्द्र व राज्य दोनो के साथ कानून की समवर्ती शक्ति शामिल है इसलिए इममें 100 राज्य कानून एवं 44 विषम केन्द्रीय कानून श्रम के विभिन्न पहलुओं जैसे-सामाजिक सुरक्षा, व्यावसायिक सुरक्षा, औद्योगिक संबंध और मजूदरी को नियत्रित करने है। हालांकि मौजुदा कानूनों की जटिल और पुरातन होने के कारण आलोचना की गई थी और सुधारों की आवष्यकता था किन्तु भारत सरकार द्वारा दोनो सदनों में पास कराये गए विधेयक बिना राज्यों एवं प्रभावितों के साथ विस्तृत विचार विमर्ष किए जल्दबाजी में पास कराये गए है यहां तक 2019 मे प्रस्तावित बिल विधेयक में दिए गए सुझाव को भी दोनो सदनों मे पारित विधेयक में शामिल नही किया गया।

01 300 तक श्रमिकों वाले कारखानों/संस्थान श्रमिकों की सेवा समाप्ति की छूट-

 औद्योगिक विवाद अधिनियम 1947 में 100 से अधिक श्रमिक नियुक्त करने वाले किसी भी कारखाने/संस्थान को श्रमिकों की छटनी के पूर्व शासन की अनुमति आवश्यक होती थी। जिसे बढाकर 300 तक श्रमिक नियोजित करने पर श्रमिकों की छटनी के लिए षासन से अनुमति समाप्त कर दी गई है।
 छत्तीसगढ के परिप्रेक्ष्य में देखा जावे तो 70 प्रतिषत से ज्यादा कारखाने/संस्थान 300 से कम श्रमिक वाले है अतः इन संस्थानों में कार्यरत् श्रमिकों के रोजगार की अनिष्चितता बनी रहेगी।
02 औैद्योगिक नियोजन (स्थायी आदेष) अधिनियम 1946 के तहत् भारत सरकार के मामले में 100 से अधिक कर्मचारी वाले एवं छत्तीसगढ में 30 से अधिक कर्मचारी नियुक्त करने वाले नियोक्ताओं को कर्मचारियों के रोजगार की शर्तो को औपचारिक रूप से परिभाषित करने की आवश्यकता होती है किन्तु 2020 के विधेयक में इस सीमा को 300 कर्मचारियों तक बढ़ा दिया गया है इससे 300 से कम कर्मचारी वाले संस्थानों के –
 कर्मचारियों में परिवीक्षा, पदोन्नति या स्थानांतरण पर राज्य सरकार के नियमों का पालन करने की आवश्यकता नहीं होगी एवं मनमाने ढंग से कर्मचारियों को कदाचरण के नाम पर नोटिस, जांच एवं दंडों से दंडित किया जावेगा।
 इस संशोधन से श्रमिकों की बर्खास्तगी एवं दंड आदि से बचने के लिए श्रमिक संघांं के गठन अथवा श्रमिक संघो में शामिल होने अथवा मांगों के लिए हडताल में भाग लेने जैसे मामलों मे कार्यवाही की जाकर उन्हें प्राकतिक न्याय प्रक्रिया से वंचित किया जा रहा है।
 इस छूट से छत्तीसगढ राज्य की तीन चौथाई कारखानों में मजदूरों की मनमानी बर्खास्तगी, सजा, पदोन्नति और स्थानांतरण में भेदभाव से बचने के लिए श्रमिकों को प्राप्त अधिकार समाप्त होने से श्रमिकों का शोषण बढेगा।
 इससे श्रमिकों को रखने एवं हटाने पर नियोक्ता की मनमानी होगी।
 2019 के विधेयक बिल में 100 से कम श्रमिकों वाले संस्थानों मे भी स्थायी आदेष संबंधी प्रावधान अधिसूचना के माध्यम से केन्द्र सरकार लागू कर सकती थी प्रावधानित किया गया था जो कि छत्तीसगढ में पूर्व से ही 100 के स्थान पर 30 कर दिया गया था।
किन्तु केन्द्र सरकार ने 2019 के विधेयक बिल के प्रस्ताव को अनदेखा करते हुए 300 से अधिक श्रमिक वाले संस्थान पर स्थाई आदेश प्रभावशीलन में प्रावधान अधिनियम में ही कर दिया गया है।
 औद्योगिक नियोजन स्थाई आदेश अधिनियम में पूर्व यह प्रावधान था कि एक बार किसी संस्थान में उक्त अधिनियम के प्रावधान लागू होने के पश्चात् श्रमिकों की संख्या 100 से कम हो जाने पर भी अधिनियम के प्रावधान यथावत प्रभावशील रहेगें इसी प्रावधान को प्रस्तावित विधेयक बिल 2019 में भी यथावत रखने परामर्श दिए गए थे।
किन्तु 2020 के पास विधेयक में उक्त प्रावधान हटा दिया गया है। जिससे यदि किसी संस्थान में उक्त प्रावधान प्रभावशील होने के पश्चात् यदि कर्मचारी की संख्या 300 से कम हो जाती है तो उक्त संस्थान से स्थाई आदेश के प्रावधान समाप्त हो जावेगें।
03 किसी भी संस्थान को किसी भी या सभी प्रावधान से छूट देने का अधिकार-
1 पारित औद्योगिक संबंध विधेयक में श्रमिकों के कार्य की दशा, श्रमिक संघ, छंटनी ले ऑफ, विवाद का निराकरण एवं औद्योगिक न्यायालय (अभिकरण) की स्थापना आदि का प्रावधान है।
2 औद्योगिक स्वास्थ्य एवं सुरक्षा कार्यदषाओं विधेयक में श्रमिकों की छुटी एवं कार्य के अधिकतम घंटे, स्वास्थ्य एवं सुरक्षा के लिए आवश्यक मापदंड जिससे पर्याप्त प्रकाश, हवा एवं कल्याण संबंधी प्रावधान है इस विधेयक में 13 श्रम अधिनियम भी शामिल किए गए जिससे कारखाना अधिनियम भी शामिल है।
उपरोक्त पारित विधेयकों में राज्य शासन को यह अधिकार दिया गया है कि नये कारखाने के स्थापना रोजगार कर वृद्धि एवं आर्थिक गतिविधियों के विस्तार के लिए उक्त विधेयकों के प्रावधान से संस्थानों को छूट दी जाये का प्रावधान से जबकि कारखाना अधिनियम में सीमित अवधि सिर्फ 03 माह के लिए अतिआवश्यक होने पर छूट का प्रावधान है।
3 इससे कोई राज्य संस्थानों को छूट दे सकेगा जिससे श्रमिकों के हित संरक्षण स्वास्थ्य एवं सुरक्षा पर विपरीत प्रभाव पडे़गा।

04 श्रमिक संघो के अधिकार एव विस्तार पर विपरीतः-

 पारित औद्योगिक संबंध विधेयक में ऐसे श्रमिक संगठन जिसके साथ संस्थान के 51 प्रतिशत श्रमिक शामिल हो उसे प्रतिनिधि संघ की मान्यता मिलेगी और वही संघ श्रमिकों की समस्याओं एवं मांग के संबंध में चर्चा कर सकेगा। इससे छोटे श्रमिक संघों का अस्तित्व समाप्त हो जावेगा।
 विधेयक में यह भी प्रावधानित किया गया है कि यदि किसी संस्थान में प्रतिनिधि, संघ न हो तो कम से कम 20 प्रतिशत श्रमिकों वाला संघ ही श्रमिकों की पक्ष नियोजक के समक्ष रख सकेगा।

05 प्रजातांत्रिक रूप से प्रबंधन का विरोध किए जाने वाले हडताल पर रोकः-

 औद्योगिक विवाद अधिनियम 1947 के अनुसार कोई भी श्रमिक संघ अपनी मांगो के संबध में नियोजक को 14 दिन का नोटिस देगा यदि 14 दिन तक नियोजक कार्यवाही करने मे असफल होता है तो श्रमिक हडताल पर जा सकते थे। किन्तु वर्तमान औद्योगिक संबध विधेयक जिसमें औद्योगिक विवाद अधिनियम स्थाई आदेश अधिनियम एवं व्यावसायिक संघ अधिनियम भी शामिल है किन्तु पूर्व में उल्लेखित 300 से कम कर्मचारी नियोजित करने वाले संस्थानों को स्थायी आदेश अधिनियम से छूट एवं सेवा छटनी के लिए शासन से अनुमति की आवश्यकता न होने के कारण यदि कर्मचारी श्रमिक अपने परीवीक्षाधीन, पदोन्नति, स्थानांतरण मापदंड आदि के संबंध में मांग करते समय श्रमिक संघ नियोजक के दबाव में रहेगा एवं सामूहिक सौदेबाजी की क्षमता कम होगी क्योकि नियोजक द्वारा उनके विरूद्ध कभी भी कोई भी कार्यवाही की जा सकती है।

06 सामाजिक सुरक्षा निधि के संबंध में अस्पष्ट प्रावधान-

पारित समाजिक सुरक्षा विधेयक के अनुसार सामाजिक सुरक्षा निधि में राशि (A) केन्द्र सरकार से, (B) केन्द्र एवं राज्य शासन से (C) केन्द्र सरकार राज्य शासन एवं नियोजकों एवं हितग्राहियों के अभिदाय से (D) अन्य माध्यम से जिसमें सी0एस0आर (CSR) फंड भी हो सकता है किन्तु विधेयक में फंडिग के संबंध में स्पष्टता नही है न ही सामाजिक सुरक्षा के लिए रोडमेप है।

07 ठेका श्रमिकों से संबधित कानुनों में परिवर्तन का प्रभावः-
 पारित औद्योगिक स्वास्थ्य सुरक्षा एवं कार्यदशाये संबधी विधेयक में 50 से अधिक ठेका श्रमिक नियोजित करने वाले संस्थानों/ठेकेदार पर प्रभावशील होगा जबकि पूर्व में 20 या 20 से अधिक ठेका श्रमिक नियोजित करने वाले संस्थानों/ठेकेदार पर अधिनियम प्रभावशील होता था।
 इससे छत्तीसगढ राज्य में लगभग 80 प्रतिशत ठेका श्रमिक जो कि कारखानों/संस्थानों में कार्यरत् है उन्हे अधिनियम के अंतर्गत प्राप्त मूलभूत सुविधाओं/अधिकार जैसे- मजदूरी , नियुक्त पत्र, कार्य के घंटे आदि सुविधाओं की व्यवस्था सुनिष्चित करने में कठिनाईयां होगी।
 पारित औद्योगिक संबंध विधेयक में ठेका श्रमिकों के बारे में कोई भी प्रावधान नही किया गया है बल्कि श्रमिकों का नया वर्ग “शार्ट टर्म“ लेबर फिक्सड टर्म इम्प्लायमेंट बना दिया गया नियत कालीन नियोजन (फिक्सड टर्म इम्प्लायमेंट) के प्रावधान से संस्थानों/कारखानों में कर्मचारियों को नियमित रखे जाने की प्रवृत्ति समाप्त हो जावेगी एवं हायर एवं फायर की प्रवृत्ति बढेंगी जिससे श्रमिकों का भविष्य हमेशा अनिश्चित रहेगा।
 पारित विधेयक में प्रावधान किया गया है कि ठेका श्रमिक संस्थान/कारखाने के कोर एक्टिविटी को छोड़कर अन्य कार्यो जैसे- केटीन, सुरक्षा, साफ-सफाई मे रखे जा सकेंगें परन्तु कोर एक्टिविटी को स्पष्टतः परिभाषित नही किया गया है जिसके कारण कोर एक्टिविटी प्रवृत्ति बढें़गी जिसके उनका शोषण होगा।

08 महिला श्रमिक विरोधी प्रावधानः-

 पारित औद्योगिक स्वास्थ्य सुरक्षा एवं कार्यदशा विधेयक में खतरनाक एवं स्वास्थ्य में प्रतिकूल प्रभाव डालने वाले कार्यो/नियोजनों में भी महिला श्रमिक को नियोजित करने की अनुमति शासन द्वारा दी जा सकती है।
यदि नियोजक द्वारा स्वास्थ्य एवं सुरक्षा की सुविधा उपलब्ध कराई जाती है। तो जबकि पूर्व में महिलाओं का खतरनाक एवं हेजाडर्स प्रकृति के कार्यो में नियोजन प्रतिबंधित था।

09 उपादान के प्रावधानः-

 2019 के प्रस्तावित समाजिक सुरक्षा बिल में कर्मचारी/श्रमिकों के 01 वर्ष की कार्य अवधि के पश्चात् गेच्युटी की पात्रता के प्रावधान प्रस्तावित किए गए थे परन्तु पारित समाजिक सुरक्षा विधेयक 2020 में ग्रेच्युटी की पात्रता 05 वर्ष की सेवा अवधि रखी गई है मात्र पत्रकार/गैर पत्रकार कर्मचारी को 03 वर्ष की सेवा पश्चात् ग्रेच्युटी की पात्रता होगी।

10 पारित विधेयकों में जुर्माने की राशि एवं सुलह के प्रावधानः-
 2019 के प्र्रस्तुत प्रस्तावित विधेयकों में ऐसे अपराध जिसमें कारावास का प्रावधान को छोड़कर शेष अपराधों में निर्धारित जुर्माने की राषि का 50 प्रतिशत तक सुलह (समझौता) शुल्क का अधिकार विभागीय अधिकारी को दिया गया था। जबकि पारित विधेयकों में 01 वर्ष कारवास या जुर्माना के दंड प्रावधान की स्थिति में भी सुलह के प्रावधान कर दिए गए है जिससे कि नियोजकों में कारवास के दंड के प्रावधान का भय समाप्त होने से श्रमिकों का शोषण बढे़गा।

11 उपसंहारः-

 भारत सरकार द्वारा पारित तीनों श्रम सुधार विधेयक क्रमशः औद्योगिक संबंध विधेयक, समाजिक सुरक्षा विधेयक एवं औद्योगिक सुरक्षा स्वास्थ्य एवं कार्यदशाओं नियमन विधेयक में कुल 411 धाराये अनुसूचियां और लगभग 350 पृष्ट है पारित करने के पूर्व राज्य सरकारों स्टेडिंग कमेटी के द्वारा सुझाये दिये गये बिन्दुओं का अनदेखा कर आनन फानन में पारित किया गया है। जिससे श्रमिकों को पूर्व में श्रम कानूनों में प्राप्त अधिकार एवं संरक्षण में कमी आएगी तथा श्रमिकों के हायर एंड फायर की प्रवृत्ति बढे़गी तथा श्रमिकों का शोषण बढेगा।

भाजपा एवं डॉ. रमन सिंह से चंद सवाल
1. केन्द्र द्वारा किसानों को बोनस दिये जान पर प्रतिबंध लगाये जाने का समर्थन करते है अथवा विरोध?
2. 2016 से 2022 की 6 वर्षो की अवधि में किसानों की आय दुगनी करने का लक्ष्य रखा गया था। 2016-2020 तक की 4 वर्षो की अवधि में किसानो की आमदनी मात्र 15 से 20 प्रतिशत तक बढ़ी है। क्या प्रधानमंत्री जी से यह अनुरोध करेंगे कि वे आगामी 2 वर्षो में किसानो की आय दुगनी करने हेतु तत्काल आपतिक कदम उठाये ?
3. यूपीए के शासनकाल में 6 वर्षो 2004-2010 के बीच खाद्यान्नों की एमएसपी मोदी के कार्यकाल के 6 वर्षो 2014-2020 की तुलना में अधिक बढ़ी थी। क्या प्रधानमंत्री से यह अपील करेगे कि किसानो के हित का देखते हुये आगामी वर्ष में खाद्यान्नों की एमएसपी में इतनी वृद्धि करेंगे कि कम से कम यूपीए कार्यकाल से वृद्धि अधिक हो सके?
4. स्वमीनाथन समिति द्वारा लागत (Input Cost+Family Labour+Rent on Lease) के डेढ़ गुना एमएसपी निर्धारित करने के बदले Input Cost+Family Labour के आधार पर एमएसपी निर्धारित की जा रही है। क्या प्रधानमंत्री से यह अनुरोध करेगे कि अपने वादे के अनुसार स्वमीनाथन समिति की सिफारिशों को सही मायने में लागू करेंगे।
5. शान्ताकुमार समिति की अनुशंसा 2015 मे उन्होने यह निष्कर्ष निकाला था कि केवल 6 प्रतिशत किसानो को एमएसपी का लाभ मिलता है तथा पीडीएस अंतर्गत 67 प्रतिशत आबादी के स्थान पर केवल 40 प्रतिशत लोगो का रियायती दर पर खाद्यान्न दिया जाना चाहिये। शांताराम समिति दर पर खाद्यान्न वितरण के स्थान पर नकद राशि डीबीटी के माध्यम से दी जाये। क्या आप उक्त अनुशंसाओं का समर्थन करेगें अथवा विरोध?
6. शांताकुमार समिति की अनुशंसा है कि किसानो की उपज क्रय में निजी क्षेत्र की भूमिका बढ़ाया जाना चाहिये तथा शासन द्वारा केवल क्षतिपूर्ति की राशि किसानों को दिया जाना चाहिये। आप लोग इससे सहमत है अथवा नही?
7. किसानों से एमएसपी पर खाद्यान्न क्रय करने के स्थान पर प्रति हेक्टेयर 5000 रूपये से 10000 नकद सब्सिडी दिये जाने की भी अनुशंसा शांताकुमार समिति द्वारा की गयी है। आप लोग इस तर्क से सहमत है अथवा इसके विरोध में?

 

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