सार्वभौमिक टीकाकरण की विदाई

 


(आलेख : संजय पराते)

प्रधानमंत्री मोदी के हालिया संदेश से अब यह स्पष्ट हो गया है कि आजादी के बाद से अब तक किसी भी महामारी से लड़ने के लिए मुफ्त सार्वभौमिक टीकाकरण की सुपरीक्षित नीति को अब अलविदा कह दिया गया है। अब टीकाकरण के दायरे में वही लोग आएंगे, जिनकी अंटी में पैसे होंगे। कोरोना के खिलाफ जंग में अब टीकाकरण कितने वर्षों में पूरा होगा, यह देश मे टीकों के निर्माण और उसकी जन उपलब्धता से ज्यादा इस पर निर्भर होगा कि आप में इन टीकों को खरीदने की ताकत है या नहीं। मानव जाति के अस्तित्व पर प्रश्नचिन्ह बने कोरोना जैसी महाआपदा में भी ऐसी कॉर्पोरेटपरस्ती वही दिखा सकता है, जिसके खून में व्यापार हो।

कोरोना की यह दूसरी लहर पहले से भी ज्यादा सांघातिक और जानलेवा है। पहली लहर में हमारे देश में पहले 10 लाख लोगों को संक्रमित होने में जहां 8.5 माह लगे थे, दूसरी लहर में केवल 3 माह ही लगे हैं।विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार पिछले एक सप्ताह में ही दुनिया भर में 52 लाख से ज्यादा नए कोरोना संक्रमित बढ़ गए है। हमारे देश मे यह लहर इतनी आक्रामक है कि केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय के ही अनुसार देश में दैनिक संक्रमण की दर 16.69% तथा साप्ताहिक संक्रमण की दर 13.54% पर पहुंच चुकी है और आज अमेरिका के बाद संक्रमितों की संख्या के मामले में दुनिया मे हम दूसरे नंबर पर है। इस नई लहर में बच्चे भी अछूते नहीं है और हर चार में से एक संक्रमित बिना लक्षणों वाला है। आधे से ज्यादा मरीजों को — लगभग 55% संक्रमितों को — ऑक्सीजन सपोर्ट की जरूरत पड़ रही है। अस्पताल ठसाठस है, श्मशान घाटों में जगह नहीं है। जो किसी तरह अस्पताल में हैं, उनके लिए न डॉक्टर हैं, न संतोषजनक उपचार। मरीजों की स्थिति से परिजन तक अनजान हैं।

कोरोना से बचाव की कोई कारगर दवा अभी तक खोजी नहीं जा सकी है और आम जनता के लिए टीका ही सबसे बड़ा सहारा है, जिसके बारे में कहा जा रहा है कि वह शरीर की प्रतिरक्षा प्रणाली को मजबूत करने का काम करती है और कोरोना का संक्रमण जानलेवा स्तर तक घातक नहीं हो पाता। इसलिए कोरोना से लड़ने के लिए टीकाकरण पर सबसे ज्यादा जोर पूरी दुनिया मे दिया जा रहा है। इसलिए कोरोना से लड़ने के लिए जरूरी है कि देश के सभी व्यक्तियों को जल्दी-से-जल्दी टीकों की दोनों डोज़ लगे। जितना अधिक टीकाकरण होगा, भारतीय समाज की कोरोना से लड़ने की ताकत भी उसी अनुपात से बढ़ेगी। इसे ‘झुंड प्रतिरोधकता’ (mass resistance) कहा जाता है।

मोदी सरकार ने अंततः 18 वर्ष या अधिक के आयु समूह के सभी लोगों को टीका लगाने की अनुमति दे दी है। भारत मे लगभग दो-तिहाई आबादी या 90 करोड़ लोग इस आयु समूह के अंतर्गत आते हैं। सार्वभौमिक टीकाकरण के लिए 180 करोड़ डोज़ वैक्सीन की जरूरत पड़ेगी, जो कि इन इंसानी जिंदगियों को बचाने के लिए मानवीय दृष्टिकोण से भी जरूरी है। इस बिंदु पर टीकों के निर्माण और उसकी जन उपलब्धता का सवाल प्रमुख सवाल बनकर सामने आता है।

देश में पिछले तीन महीनों में केवल 10 करोड़ डोज़ ही लोगों को दिए गए हैं और राष्ट्रीय स्तर पर यह औसत 5.5% ही है। इस रफ्तार से देश की वयस्क आबादी के संपूर्ण टीकाकरण में 4.5 से 5 साल लगेंगे। यह भी तब संभव होगा, जब टीकों की लगातार उपलब्धता बनी रहे। लेकिन मोदी सरकार की नीतियों से यह संभव नहीं है, क्योंकि स्वदेशी टीके इतनी मात्रा में उपलब्ध नहीं होंगे, मुफ्त टीकाकरण बंद होने जा रहा है और आम जनता को आयातित महंगे टीकों पर निर्भर रहना पड़ेगा।

‘अवर वर्ल्ड इन डेटा’ के अनुसार 30 मार्च की स्थिति में अमेरिका में वांछित लक्ष्य का 41.5%, ब्रिटेन में 50.8%, यूरोप के देशों में 25% टीकों की खुराकें दी जा चुकी थी। टीकाकरण के मामले में ये धनी देश एशिया के देशों से काफी आगे हैं। चीन में वहां के नागरिकों को वांछित लक्ष्य का 8% डोज़ दिया जा चुका था, जबकि भारत में केवल 4.6 प्रतिशत। भारत केवल अफ्रीका से ही आगे हैं, जहां अभी तक 1% डोज़ भी वहां के लोगों को नहीं दिए जा सके हैं। बहरहाल, अफ्रीकी संसाधनों की पूंजीवादी लूट के चलते वहां के समाज के पिछड़ेपन और अति-दरिद्रीकरण के बारे में सभी जानते हैं।

आईए, अब देखें कि देश और दुनिया में इन टीकों के उत्पादन की क्या स्थिति है? फाइजर और एस्ट्राजेनेका नामक कंपनियां जिन टीकों का उत्पादन कर रही हैं, वह पूरी दुनिया के उत्पादित टीकों का आधे से ज्यादा हिस्सा है। लेकिन इन टीकों के एक बहुत ही छोटे-से हिस्से को छोड़कर अमेरिका और यूरोप के देशों ने सभी डोज़ हथिया लिए हैं। बाकी दुनिया को मिलने वाले टीकों का एकमात्र स्रोत भारत और चीन ही रहा है, जिन्होंने अपने यहां उत्पादित कुल टीकों का लगभग आधा पूरी दुनिया में बांटा है। इन दोनों देशों ने सम्मिलित रूप से लगभग 23 करोड़ डोज़ पूरी दुनिया को दिया है।

सीरम इंस्टिट्यूट ऑफ इंडिया दुनिया का सबसे बड़ा टीका उत्पादक है, जिसके पास हर माह 10 से 20 करोड़ कोविशील्ड बनाने की क्षमता है। लेकिन वह केवल 6 करोड़ टीकों का ही निर्माण कर पा रहा है। इसका कारण भी स्पष्ट है कि अमेरिका ने इन टीकों के निर्माण में काम आने वाले सेल कल्चर मीडियम, ट्यूबिंग असेम्बलियों, विशेषीकृत रसायनों व अन्य कच्चे मालों के निर्यात पर पाबंदियां लगा रखी हैं और वह इसे बौद्धिक संपदा अधिकार के तहत जायज ठहरा रहा है। अमेरिका का मकसद साफ है : न हम वैक्सीन देंगे, न वैक्सीन बनाने देंगे। ये अमीर देश अपनी जरूरतों को पूरी करने के बाद भारत की जनता को बढ़ी-चढ़ी दरों पर अपनी वेक्सीनें उपलब्ध कराएंगे। प्रारंभिक आंकलन के अनुसार, फाइजर के एक डोज़ की कीमत 1400 रुपये और मॉडर्ना की 2800 रुपये होगी, जबकि कोविशील्ड और कोवैक्सीन हमारी सरकार को 150-200 रुपये में मिल रही है। अपनी वैक्सीनों को बेचने के लिए ये देश चीन व रूस की वैक्सीनों के खिलाफ अफवाह भी फैला रहे हैं।

यही पर सवाल खड़ा होता है मोदी सरकार के रूख पर, जिसने घोषणा की है कि भारत में उत्पादित वैक्सीनों के आधे हिस्से को निर्यात करने या खुले बाजार में सरकार से नियंत्रण मुक्त दरों पर बेचने की इजाजत दी जाएगी। सस्ती वैक्सीनें निर्यात होंगी, महंगी आयातित वैक्सीनों के लिए हमारे देश का बाजार खोला जाएगा। दरअसल अमेरिका और विश्व व्यापार संगठन चाहता भी यही है।

यदि मुफ्त सार्वभौमिक टीकाकरण जा अभियान चलाया जाता है, तो इसकी लागत केवल 35000 करोड़ रुपये आएगी और हमारा स्वास्थ्य बजट इसे वहन करने में सक्षम है। यह टीकाकरण अभियान कोरोना लहर के भविष्य में शिकार होने वाले लाखों लोगों की जिंदगियों को बचा सकता है। लेकिन जब महामारी को दवा बाजार में मुनाफा कमाने का जरिया बना लिया जाता है, तो इंसानी जिंदगियों पर डॉलर की कीमत हावी हो जाती है। मुफ्त सार्वभौमिक टीकाकरण की नीति को अलविदा कहकर मोदी सरकार ने अपना कॉर्पोरेटपरस्त चेहरा और बेनकाब कर दिया है।

*(लेखक छत्तीसगढ़ किसान सभा के अध्यक्ष हैं। संपर्क : (मो) 094242-31650)*

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