20 जनवरी पुण्यतिथि पर “मुश्किल है, प्रो जयनारायण पांडेय को भूलना ’’

 0 गिरीश पंकज  (वरिष्ठ पत्रकार,सहित्यकार)

इस महादेश में अनेक महापुरुष ऐसे भी हुए हैं,जिन पर समय-समय पर उतनी चर्चा नहीं होती, जितनी होनी चाहिए। ऐसे ही एक महान समाजवादी व्यक्तित्व का नाम है, प्रो. जयनारायण पांडेय, जिनके नाम से आज रायपुर एक बड़े उच्चतर माध्यमिक विद्यालय का नामकरण भी हो चुका है। यह वही विद्यालय है, जहां भारत के पूर्व उपराष्ट्रपति हिदायतुल्लाह ने भी अध्ययन किया था। आज से तीन दशक पहले तक मैं पांडेय जी के साहित्यिक, वैचारिक चिंतन और पत्रकारीय अवदान से परिचित नहीं था। लेकिन जब मैंने उनके इतिहास को देखा, तो अभिभूत हो गया।  राजनीति विज्ञान, हिंदी,अंग्रेजी, संस्कृत और समाजशास्त्र के गहन अध्येता प्रखर समाजवादी सोच वाले जयनारायण जी का जन्म 30 दिसंबर 1925 को रामापुर (इलाहाबाद) में हुआ, और 20 जनवरी 1965 को बनारस में निधन। मगर उनकी कर्मभूमि रायपुर रही। पिता संस्कृत के प्रकांड पंडित विश्वनाथ पांडेय रायपुर आकर यहॉं बस गए और नयापारा नामक मोहल्ले में संस्कृत विद्यालय संचालित करते थे। बनारस के ही शिक्षा शास्त्री पंडित रामनरेश मिश्र युवा जयनारायण के समाजवादी चिंतन से बड़े प्रभावित थे इसलिए उन्होंने अपनी पुत्री श्यामाकुमारी का विवाह जयनारायण पांडेय जी के साथ कर दिया। इस विवाह की सबसे बड़ी विशेषता यह रही कि पारंपरिक कर्मकांड से दूर यह विवाह वैदिक रीति से ही संपन्न हुआ। और यह सब जयनारायण जी के कहने पर हुआ।

“पन्द्रह वर्ष की उम्र में तिरंगा फहराया’’
जयनारायण पांडेय जब स्कूली शिक्षा ग्रहण कर रहे थे, तभी पराधीन देश में रहते हुए उनके मन में देशप्रेम हिलोरे मारने लगा था। तब उनकी उम्र मात्र पन्द्रह वर्ष थी। एक दिन उनसे रहा न गया, तो उन्होंने शाला की प्राचीर पर चढ़ कर देश का तिरंगा ध्वज ही लहरा दिया। सनसनी मच गई कि यह काम किसने किया। जब पता चला कि तिरंगा फहराने वाले छात्र का नाम जयनारायण है। एक बालक की इतनी हिम्मत कि वह शाला भवन की प्राचीर पर तिरंगा फहरा दे। शाला प्रबंधन ने उन्हें सजा देते हुए स्कूल से निकाल दिया और उनके ट्रांसफर सर्टिफिकेट पर लिखा गया ही टुक ए लीडिंग पार्ट इन अनडिजायरेबल पॉलीटिकल एक्टिविटीज। जयनारायण हर परीक्षा में प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण होते रहे। शाला के बेस्ट ऑलराउंडर मेधावी छात्र के रूप में भी पहचाने जाते थे। गणित और विज्ञान संकाय में तो उन्होंने विशेष योग्यता हासिल की थी। 1942 में भारत छोड़ो आंदोलन में भी वे पूरी तरह सक्रिय रहे। साम्राज्यवादी शक्ति के विरुद्ध लड़ाई लड़ने की भावना के कारण जयनारायण पाण्डेय ने मित्र गंगेले के साथ मिलकर रायपुर के केंद्रीय जेल की दीवार को डायनामाइट से उड़ाने की योजना भी बनाई, लेकिन बाद में वे पकड़े गए और 6 जून 1943 को उन्हें गिरफ्तार किया गया। उस समय उनकी उम्र मात्र 17 वर्ष की थी, इसलिए उन्हें लगभग छह महीने बाद जेल से रिहा कर दिया गया।

स्कूली शिक्षा पूर्ण करने के बाद उच्च शिक्षा प्राप्त करने जयनारायण जी नागपुर चले गए। वहां से उन्होंने बीए,एम ए, एल एल बी किया। वहाँ के मॉरिस कॉलेज में पढ़ते हुए उन्होंने श्जनमतश् जैसे वैचारिक अखबार का संपादन किया और समय-समय पर अपनी धारदार लेखनी के माध्यम से व्यवस्था का प्रखर विरोध करते रहे। श्जनमतश् सोशलिस्ट पार्टी का महत्वपूर्ण अखबार था। पांडेयजी अखबार में अलग-अलग नामों से समसामयिक मुद्दों पर लिखा करते थे। उनकी भाषा, उनके तेवर को देखकर लोग उन्हें श्समाजवादी कामरेडश् भी कहने लगे थे। देश की आजादी के बाद आजाद भारत में भी महंगाई चोरबाजारी, भ्रष्टाचार और पूंजीवाद का एक नया दौर शुरू हो गया था। तब उन्होंने जनमत में जो लेख लिखा था, उसे पढ़ कर के सरकार विचलित हो गई थी। लेख का शीर्षक ही था, नया जंग है शुरू हुआ मजदूरों का, मजलूमो काष्। इसी तरह के तेवर वाले लेख जनमत में छपते रहे, जिस कारण वे कुछ लोगों की आंखों की किरकिरी भी बन गए।
प्रो पांडेय राजनीति शास्त्र के प्रोफेसर थे। उनके लेखन चिंतन के कारण उन्हें परेशान करने के लिए इधर से उधर तबादले भी होते रहे। महाकौशल विद्यालय जबलपुर से संस्कृत कॉलेज रायपुर, फिर उसके बाद जगदलपुर, फिर उन्हें भेज दिया नीमच। कहाँ नीमच और कहाँ से अंबिकापुर। इस तरह उनका स्थानांतरण होता रहा। लेकिन प्रोफेसर पांडेय मनोयोग से अपना दायित्व निर्वहन करते रहे और समय-समय पर लेखन कार्य में भी संलग्न रहे। ( यहां एक महत्वपूर्ण बात का उल्लेख करना चाहता हूं कि रायपुर के संस्कृत कॉलेज में जब प्रो पांडेय अध्यापन कर रहे थे, तभी ओशो के नाम से बाद में मशहूर हुए आचार्य रजनीश भी वहां अध्यापन के लिए आए तब प्रोफेसर पांडेय और आचार्य रजनीश के बीच समय-समय पर होने वाली बौद्धिक बहसें चर्चा में रहती थीं, और यह उल्लेखनीय तथ्य है कि प्रोफेसर पांडेय रजनीश पर भारी पड़ते थे । ) लगातार स्थानांतरण के चक्कर में अंततः प्रो पांडेय बीमार पड़ गए । उच्च रक्तचाप के शिकार हो गए। बनारस में उपचार के दौरान उनका दुखद निधन हो गया। उनके निधन से लोगों को गहरा आघात पहुँचा। यही कारण था कि विभिन्न अखबारों में सरकार की आलोचना वाले समाचार छपे । एक अँग्रेजी अखबार का शीर्षक ही यही था, मर्डर ऑफ ए फाइन मैन। इसी शीर्षक से प्रोफेसर जय जयनारायण पांडेय के समग्र कृतित्व व्यक्तित्व को समझा जा सकता है। उनके निधन के बाद जब महासमुंद में समाजवादियों का सम्मेलन हुआ, जिसमें डॉ राममनोहर लोहिया का आगमन हुआ था। तब सम्मेलन के प्रवेश द्वार का नाम प्रोफेसर जयनारायण पांडेय द्वार रखा गया था।

 

मध्यभारत के लोहिया..
समाजवाद को समर्पित प्रोफेसर पांडेय जब रायपुर में थे, तब उनका नयापारा स्थित निवास समाजवादी चबूतरे के रूप में मशहूर था, जहां अनेक समाजवादी आते और समय-समय पर गोष्ठी किया किया करते। देश की आजादी के बाद जब रियासतों के विलीनीकरण का दौर चला, तो प्रोफेसर पांडेय ने भी इस अभियान में अपनी महती भूमिका निभाई। रायगढ़, सक्ती, छुईखदान, कवर्धा, छुरा, बस्तर तथा खैरागढ़ की रियासतों के विलीनीकरण में प्रोफेसर पांडेय ने जो महत्वपूर्ण भूमिका अदा की, जिसे डॉक्टर राममनोहर लोहिया ने भी पसंद किया। प्रोफेसर पांडेय सोशलिस्ट दल के प्रांतीय महासचिव थे। उनके समय मध्यप्रदेश में समाजवादी आंदोलन काफी सक्रिय रहा । यही कारण है कि उन्हें मध्यभारत का लोहिया कहकर भी उनके प्रिय जन संबोधित किया करते थे । कुछ लोग उन्हें श्मुक्तिसंग्राम के डायनामाइट के रूप में भी संबोधित किया करते थे। समाजवादी होने के कारण ही मध्यप्रदेश के तत्कालीन कांग्रेस सरकार में बैठे कुछ लोग उन से चिढते थे, इसीलिए उन्हें परेशान करने की नीयत से उनके तबादले होते रहे । आखिरकार प्रोफेसर पांडेय रक्तचाप से पीड़ित हुए और अंततः 20 जनवरी 1965 को समाजवाद का यह दैदीप्यमान सितारा अस्त हो गया। बीस वर्ष की उम्र में उन्होंने अंत नामक एक महत्वपूर्ण कविता लिखी थी। उसे देखिए, तो उनके व्यक्तित्व को और आसानी से समझा जा सकता है। वे लिखते हैं,

सब देख रहे कौतूहल से यह राग राशि कैसे आई
अपने दामन में छिपा छिपा कितनी स्नेहांजलि लाई
सहसा झंझा के झोंकों से दारुण दोपहरी में तप कर
सह सकी न विषमय विषाद रह गई मौन कुछ तड़प सिहर।

कोमल कलिका नतमस्तक हो गिर पड़ी
जिसे देख कांप उठी धरती माई।

प्रोफेसर जयनारायण पांडेय मात्र 39 वर्ष की आयु में इस असार-संसार से चले गए। छात्र जीवन से ही लेखन में रुचि होने के कारण उन्होंने कुछ कहानियां भी लिखी। कुछ कविताएं भी लिखी। उनकी लिखी एक चर्चित पुस्तक प्रमुख राजनीतिक विचारकों के चिंतनधारा तो मध्यप्रदेश शासन के उच्च शिक्षा विभाग के पाठ्यक्रम में शामिल हुई और उत्तरप्रदेश साहित्य अकादमी द्वारा पुरस्कृत भी हुई। इस पुस्तक में विश्व के कुछ मशहूर राजनीतिक/सामाजिक चिंतक के बारे में विस्तार के साथ लिखे गए उनके लेख संग्रहित हैं। उन्होंने बस्तर के अबूझड़ियांे के सामाजिक संबंध और उनकी समस्याओं को लेकर शोध कार्य शुरू किया था । लेकिन वह पूर्ण नहीं हो सका। आज भी उनका लिखा हुआ बहुत कुछ अप्रकाशित ही है । जिसमें उनकी कुछ कहानियां और कविताएं भी शामिल है। उनके परिवार के प्रयासों से कुछ चीजें जरूर प्रकाशित हुई। लेकिन कुछ साहित्य अभी भी प्रकाशन के इंतजार में है। यह सन्तोष की बात रही कि प्रो पांडेय के सम्मान में रायपुर के एक बड़े विद्यालय का नामकरण हुआ । जहां उनका निवास स्थान था, उस सड़क का नामकरण प्रो जयनारायण पांडेय मार्ग किया गया। इसी मकान में आज भी उनका परिवार रहता है। उनके व्यक्तित्व को रेखांकित वाली एक पुस्तिका भी पिछली भाजपा सरकार के समय प्रकाशित हुई। जिस विद्यालय का नाम प्रोफेसर जयनारायण पांडेय रखा गया है, उस विद्यालय परिसर में अगर उनकी एक मूर्ति भी स्थापित हो तो यह छात्रों के लिए और प्रेरणास्पद बात होगी। डॉ. राममनोहर लोहिया के चिंतन मनन को जीवन में आत्मसात करके उनकी वैचारिक परंपरा को आगे बढ़ाने वाले व्यक्तित्व को शत-शत नमन।

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