Thursday, February 29

Israel Hamas War: इजरायल के साथ क्यों हैं पीएम मोदी?

पुराना दोस्त तो फलस्तीन था, फिर इजरायल के साथ क्यों हैं पीएम मोदी?

चरमपंथी संगठन हमास ने इजरायल पर हमला किया तो दुनिया के तमाम मुल्क इजरायल के साथ खड़े हो गए. भारत भी उनमें से एक है, जो इजरायल और वहां के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू के साथ कंधे से कंधा मिलाकर खड़ा है, लेकिन भारत की दोस्ती तो फलस्तीन से बेहद पुरानी है. भारत हमेशा से हर सुख-दुख में फलस्तीन के साथ खड़ा रहा है, तो फिर अचानक ऐसा क्या हुआ है कि प्रधानमंत्री मोदी के नेतृत्व में पूरा देश ही अब फलस्तीन नहीं बल्कि इजरायल के साथ खड़ा है. आखिर भारत के फलस्तीन से रिश्ते कैसे थे और क्यों अब भारत के लिए इजरायल ही उसका असली दोस्त है? समझें-

दूसरे विश्वयुद्ध के खात्मे के बाद जब संयुक्त राष्ट्र संघ बना तो उसने मध्य पूर्व एशिया की ज़मीन के एक बड़े टुकड़े को दो हिस्सों में बांट दिया. 1948 में एक देश बना इजरायल, जिसे दुनिया के इकलौते यहूदी मुल्क के तौर पर मान्यता दी गई. वहीं गैर यहूदियों या कहिए कि मुस्लिमों के लिए जो देश बना उसे फलस्तीन कहा गया. हालांकि जब यूनाइटेड नेशंस ने इजरायल और फलस्तीन दो देश बनाने के लिए प्रस्ताव दिया था, तब भारत ने एक मुल्क के तौर पर इजरायल का विरोध ही किया था, लेकिन जब इजरायल बन गया तो फिर बनने के दो साल बाद 17 सितंबर 1950 को भारत ने भी इजरायल को मान्यता दे ही दी. 1953 में इजरायल ने तब के बॉम्बे और अब की मुंबई में अपना काउंसलेट भी खोला, लेकिन भारत के रिश्ते इजरायल से ज्यादा फलस्तीन के साथ ही सहज रहे.

फलस्तीन को समर्थन करना विदेश नीति का हिस्सा

भारत के विदेश मंत्रालय की वेबसाइट पर मौजूद दस्तावेज के मुताबिक, भारत का फलस्तीन को समर्थन करना भारत की विदेश नीति का हिस्सा रहा है. साल 1974 में भारत पहला ऐसा गैर अरब मुल्क था, जिसने फलस्तीन के फलस्तीन लिब्रेशन ऑर्गनाइजेशन को मान्यता दी थी. ये वही संगठन है, जिसके मुखिया यासिर अराफात हुआ करते थे. वो कई बार भारत की यात्रा पर भी आए थे. 1988 में भारत उन कुछ चुनिंदा देशों में था, जिसने फलस्तीन को एक देश के रूप में मान्यता दी थी. 1996 में भारत ने गाजा में अपना रिप्रेजेंटेटिव ऑफिस भी खोला था, जिसे साल 2003 में रमल्लाह में शिफ्ट कर दिया गया. इसका अंतर ऐसे समझिए कि फलस्तीन दो हिस्सों में बंटा है गाजा पट्टी और वेस्ट बैंक. रमल्लाह वेस्ट बैंक में है.

यूएन में भारत ने की मदद

1998 में यूनाइटेड नेशंस जेनरल असेंबली के 53वें सेशन में भारत ने फलस्तीन के सेल्फ डिटरमिनेशन के अधिकार के पक्ष वाला ड्राफ्ट तैयार करने में मदद की थी. जब यूनाइटेड नेशंस जनरल असेंबली ने इजरायल के फलस्तीन को अलग करने के इरादे से बना रही दीवार के खिलाफ रिजॉल्यूशन पास किया तो भारत ने भी फलस्तीन के पक्ष में वोट किया. 2011 में भारत ने फलस्तीन को यूनेस्को का सदस्य बनाने के पक्ष में वोट किया था. 29 नवंबर, 2012 को जब यूनाइटेड नेशंस जनरल असेंबली ने फलस्तीन को यूएन में नॉन मेंबर ऑबजर्वर स्टेट का दर्जा देने का रिजॉल्यूशन पास किया, तो भारत ने इसके पक्ष में वोट दिया था.

पीएम मोदी का फलस्तीन दौरा

सितंबर, 2015 में यूनाइटेड नेशंस में फलस्तीन का झंडा लगाने के लिए भी भारत ने अपना समर्थन दिया था. खुद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी 10 फरवरी, 2018 को फलस्तीन गए थे. उस वक्त पीएम मोदी ने कहा था कि भारत को उम्मीद है कि जल्दी ही फलस्तीन शांति के जरिए एक आजाद मुल्क बन जाएगा. वैसे अक्टूबर, 2015 में राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी भी फलस्तीन का दौरा कर चुके थे. जनवरी 2016 में तत्कालीन विदेश मंत्री सुषमा स्वराज और नवंबर 2016 में तत्कालीन विदेश राज्य मंत्री एम जे अकबर भी फलस्तीन का दौरा कर चुके थे. सितंबर 2015 में न्यू यॉर्क में और दिसंबर 2015 में पेरिस में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी फलस्तीन के राष्ट्रपति महमूद अब्बास से मुलाकात कर चुके हैं. महमूद अब्बास भी साल 2005, 2008, 2010, 2012 और 2017 में भारत की यात्रा पर आ चुके हैं.

स्कूल बनाने में मदद

इतना ही नहीं, भारत ने फलस्तीन की हाल के दिनों में आर्थिक मदद भी की है. 2015 में भारत ने फलस्तीन में दो स्कूल बनवाने के पैसे दिए हैं. उनके नाम हैं जवाहर लाल नेहरू सेकेंडरी स्कूल फॉर बॉयज,जो अबू दीस में है. इसके अलावा अशरा अल शमालिया में जवाहर लाल नेहरू सेकेंडरी स्कूल फॉर गर्ल्स भी बना है. गाजा शहर में अल अज़हर यूनिवर्सिटी में जवाहर लाल नेहरू लाइब्रेरी और महात्मा गांधी लाइब्रेरी बनाने में भी मदद की है. भारत और फलस्तीन के बीच व्यापार भी होता है. भारत करीब 38 मिलियन डॉलर का सामान फलस्तीन को बेचता है और करीब 83000 डॉलर का सामान फलस्तीन से खरीदता है.  2013 से तो फलस्तीन ने वीजा देना भी शुरू कर दिया है.

वहीं भारत और इजरायल के संबंध कैसे रहे हैं, इसको समझने के लिए भी विदेश मंत्रालय के दस्तावेज ही काम आएंगे. तो विदेश मंत्रालय की वेबसाइट पर मौजूद दस्तावेज के मुताबिक भारत ने इजरायल को देश के रूप में मान्यता दी थी 17 सितंबर, 1950 को. लेकिन दोनों देशों के बीच व्यापारिक और राजनैतिक संबंधों की शुरुआत हुई 1992 में. हालांकि इससे पहले भी जब भारत ने पाकिस्तान के खिलाफ 1971 की जंग लड़ी थी, तो इजरायल ने हथियारों से भारत की मदद की थी. इजरायल की राजधानी तेल अबीब में भारत की एंबेसी है तो नई दिल्ली में इजरायल की. इसके अलावा मुंबई और बेंगलुरु में भी काउंसलेट हैं.

इजरायल से हथियार खरीदता रहा है भारत

रूस के बाद इजरायल की दूसरा ऐसा देश है, जिससे भारत अपने हथियार खरीदता है. 1997 में इजरायल के राष्ट्रपति एजर विजमैन पहली बार भारत आए थे. तब उन्होंने भारत के राष्ट्रपति शंकर दयाल शर्मा, उपराष्ट्रपति केआर नारायणन और प्रधानमंत्री एचडी देवगौड़ा से मुलाकात की थी. साल 2000 में गृहमंत्री लाल कृष्ण आडवाणी इजरायल गए थे और ऐसा करने वाले वो पहले भारतीय मंत्री थे. फिर उसी साल विदेश मंत्री जसवंत सिंह भी इजरायल गए थे. 2003 में इजरायल के प्रधानमंत्री एरियल शेरोन भारत आए थे और ऐसा करने वाले वो पहले इजरायली प्रधानमंत्री थे. 2008 में जब मुंबई पर आतंकी हमला हुआ था, तब भी इजरायल ने अपनी टीम भेजने और आतंकवाद के खिलाफ चल रही लड़ाई में साथ देने की बात की थी. वो लगातार आतंक के खिलाफ भारत के साथ खड़े रहने की बात करता रहा है.

पीएम मोदी का इजरायल दौरा

नवंबर 2014 में तब के भारत के गृह मंत्री राजनाथ सिंह ने इजरायल का दौरा किया था. इस दौरान वो फलस्तीन भी गए थे. 2015 में जनवरी और फरवरी में इजरायल के कृषि मंत्री और रक्षा मंत्री ने भारत का भी दौरा किया था. इसके बाद अक्टूबर 2015 में भारत के राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी इजरायल की यात्रा पर गए थे. इस दौरान उन्होंने भी फलस्तीन का दौरा किया था. 2017 में पीएम मोदी भी इजरायल की यात्रा पर गए थे. ऐसा करने वाले वो पहले भारतीय प्रधानमंत्री थे. हालांकि इस दौरान उन्होंने फलस्तीन की यात्रा नहीं की थी. जनवरी 2018 में इजरायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू भारत की यात्रा पर आए थे. इस दौरान उनके साथ 130 डेलिगेट्स थे और ये अब तक का सबसे बड़ा डेलिगेशन था. तब पीएम मोदी खुद प्रोटोकॉल तोड़कर उन्हें रिसीव करने के लिए एयरपोर्ट पहुंचे थे.

तो कुल मिलाकर भारत की स्थिति इजरायल और फलस्तीन के पक्ष में हमेशा से तटस्थता वाली रही है. ना काहू से दोस्ती ना काहू से बैर वाली रही है. लेकिन पिछले दिनों जब फलस्तीन की गाजा पट्टी पर कब्जा जमाए बैठे चरमपंथी संगठन हमास ने इजरायल पर हमला किया तो प्रधानमंत्री मोदी ने सीधी लाइन ली. उन्होंने इजरायल के खिलाफ खड़ा होना मंजूर किया. खुद ट्वीट कर बताया कि इजरायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने उन्हें फोन करके सारी जानकारी दी है. लेकिन थोड़ा गंभीरता से इस मुद्दे को देखिए तो अभी साफ-साफ दिखेगा कि भले ही प्रधानमंत्री मोदी ने इजरायल का समर्थन करने की बात कही है, लेकिन उन्होंने फलस्तीन का विरोध नहीं किया है.

हमास का विरोध

प्रधानमंत्री ने फलस्तीन नहीं बल्कि फलस्तीन के चरमपंथी संगठन हमास और उसके हमले का विरोध किया है. और हमास भले ही क्लेम करे कि वही फलस्तीन का नेतृत्वकर्ता है, लेकिन हकीकत ये है कि दुनिया के 193 देशों में से जिन 138 देशों ने फलस्तीन को मान्यता दी है, उनके लिए फलस्तीन का मतलब हमास नहीं बल्कि फलस्तीन लिब्रेशन ऑर्गनाइजेशन और उसकी पार्टी फताह है, जिसे बनाने वाले यासिर अराफात थे. तो अभी भारत इजरायल के साथ तो खड़ा है, लेकिन इस वजह से, क्योंकि फलस्तीन के एक चरमपंथी संगठन हमास ने इजरायल पर हमला किया है. इस तरह के हमलों के खिलाफ भारत की जो ज़ीरो टॉलरेंस वाली नीति है, पीएम मोदी के नेतृत्व में भारत उसी दिशा में आगे बढ़ रहा है.

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