फिक्र है आप लोगों की… गिरते हैं शहसवार ही मैदान-ए-जंग में ..वो तिफ़्ल क्या गिरेगा जो घुटनों के बल चले मंजिल मिल ही जायेगी भटकते ही सही, …गुमराह तो वो है जो घर से निकले ही नहीं…

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सिपाही की तरह मीडिया से जुड़े अनेक साथी जान को दांव में लगाकर कोरोना के खिलाफ लड़ रहे जंग
मीडिया से जुड़े साथियों के हौसलों के सामने कोरोना हुआ परास्त
वरिष्ठ पत्रकार अनिल रतेरिया ने मीडिया के संघर्षों की गाथा से अवगत कराया
रायगढ़ । पत्रकारिता व मीडिया से जुड़े साथी भी अपनी जान हथेली में लेकर कोरोना संकट से लड़ने में अहम भूमिका का निर्वहन कर रहे है l पूर्व प्रेस क्लब अध्यक्ष व वर्तमान में सरंक्षक टॉप न्यूज के एडिटर वरिष्ठ पत्रकार अनिल रतेरिया ने मीडिया के संघर्षों की गाथा से अवगत कराते हुए कहा कि कोरोना के साथ चल रही लड़ाई में हमने वरिष्ठ पत्रकार शशिकांत शर्मा जी को खोया दिया।

वही कोरोना खिलाफ जंग में वरिष्ठ भाजपा नेता पूर्व विद्यायक व जनकर्म के संस्थापक रोशन लाल अग्रवाल जी,  इलेक्ट्रॉनिक मीडिया से जुड़े आईबीसी से अविनाश पाठक,  स्वतंत्र पत्रकार व राजनैतिक समीक्षक गणेश अग्रवाल, दिनेश मिश्रा, दैनिक भास्कर के आनंद शर्मा, जनधारा के राजेश जैन व आईएनएस के अमित गुप्ता, हर्ष न्यूज के संदीप बेरीवाल, इलेक्ट्रॉनिक मीडिया से जुड़े भूपेंद्र सिंह, दैनिक भास्कर के सुमंत्र दास और  शंकर यादव समेत आधा दर्जन से अधिक कलम के योद्धा कोरोना पॉजिटिव भी हुए। और 14 दिनों तक होम आइसोलेशन में रहकर अपना उपचार कराये और ठीक होकर फिर से मैदान में उतर गये हैं। कुछ पत्रकार साथी अभी अपना उपचार करा रहे हैं।

मीडिया से जुड़े साथियों के हौसलों के सामने कोरोना परास्त हुआ l युद्ध के मैदान में एक सिपाही बिना किसी स्वार्थ के जंग लड़ता है गिरता है लेकिन फिर भी मैदाने जंग में लड़ने के लिए उठ खड़ा होता है l जंग के मैदान में सिपाही की तरह मीडिया से जुड़े अनेक साथी जान को दांव में लगाकर कोरोना के खिलाफ जंग लड़ रहे है l मीडिया से जुड़े साथी भले ही स्वय सफलता के आनंद का अनुभव न कर पाए लेकिन दुसरो की सफलता ही उनके लिए आनंद का एहसास है l मीडिया से जुड़े हर व्यक्ति के चेहरे पर  मुस्कान का एक नकाब है लेकिन इस मुस्कान के पीछे हर किसी की दर्द भरी कहानी है l मीडिया से जुड़े साथियों की सफलता समाज के लिए खुशियो का बिषय नही न ही समाज उनकी मेहनत लगन व उनके प्रयास से  कभी रूबरू होना चाहता है l सत्ताएं जाती है आती है अफसर आते है जाते है लेकिन कलम का स्थान अपने जगह में अडिग वट वृक्ष की भाँति होता है जो स्वयं धूप पानी सहकर नीचे खड़े होने वाले व्यक्तियों के लिए  छाया की आशा का सहारा बन जाता है l

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