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2 अक्टूबर गांधी जयंती, बादल सरोज का विशेष आलेख  “गाँधी का देशकाल”
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2 अक्टूबर गांधी जयंती, बादल सरोज का विशेष आलेख “गाँधी का देशकाल”

  *एक* किसी भी व्यक्ति या विचार का मूल्यांकन करने का सही तरीका उसे उसके देश-काल में - टाइम एंड स्पेस में - बांधकर समझना है। गांधी को समझना है, तो उन्हें भी उस समय की परिस्थितियों के साथ जोड़कर देखना होगा। गांधी की एक मुश्किल यह है कि उन्हें समग्रता में ही समझा जा सकता है। टुकड़ों में देखने का एक झंझट उनके एकांगी हो जाने का है। ऐसा करने से हरेक अपनी पसंद या नापसंद के गांधी को तो ढूंढ सकता है - मगर गांधी को नहीं समझ सकता। सामाजिक विकास की प्रत्येक अवस्था एक युगांतरकारी उथलपुथल का नतीजा होती है। ऐसी हर उथलपुथल और संक्रमणकारी प्रक्रिया/इतिहास के चरणों को बदलने के संघर्ष अपने-अपने नायकों को जन्म देते हैं और प्रकारांतर में वे नायक उस युग के प्रतिनिधि - आइकॉन - बन जाते हैं। भारतीय ऐतिहासिक अवस्था के ऐसे दो निर्णायक प्रस्थान/परिवर्तन बिंदु हैं। एक वह समय है, जब खेती परिपक्व और समृद्ध ...