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क्या आप जेएनयू के गरीब बच्चों के साथ हैं
लेख-आलेख

क्या आप जेएनयू के गरीब बच्चों के साथ हैं

लेखक संजय पराते ◆ जेएनयू के छात्र केवल अपने लिए नहीं, हमारे-आपके बच्चों के भविष्य के लिए भी लड़ रहे हैं, जिसे संघ संचालित मोदी सरकार *नई शिक्षा नीति* के जरिये बर्बाद कर देना चाहती है। इस नीति का लब्बो-लुबाब यही है कि शिक्षा के क्षेत्र में सरकार अब कोई निवेश नहीं करेगी और पढ़ने-लिखने/पढ़ाने-लिखाने का पूरा खर्च बच्चों और उनके मां-बापों को ही उठाना पड़ेगा। शिक्षा के निजीकरण की जिन नीतियों पर यह सरकार चल रही है, यह उसका *क्रूरतम पूंजीवादी विस्तार* ही है, जिसके लागू हो जाने के बाद मध्यमवर्गीय कर्मचारियों के बच्चे भी उचित ढंग से शिक्षा प्राप्त करने से वंचित हो जाएंगे। ◆ मोदी सरकार एक ऐसी शिक्षा प्रणाली को लागू करना चाहती है, जो अपने चरित्र में ही एक बेहतर इंसान गढ़ने के शिक्षा के बुनियादी उद्देश्य के खिलाफ है। वे ऐसे रोबोट तैयार करना चाहते हैं, जो समग्र रूप से धनी वर्ग के मुनाफों को पैदा करने ...
बात बेबाक ब्रांडेड कपड़े वाले गरीबों को न्याय दो
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बात बेबाक ब्रांडेड कपड़े वाले गरीबों को न्याय दो

चंद्र शेखर शर्मा  की बात बेबाक " बेटा पापा को बोलना परीक्षा फीस जल्दी भर दे नही तो परीक्षा नही दे पाओगी , प्रिंसिपल का फरमान सुनना था कि कविता फफक फफक कर रोने लगी । सर मेरे पापा नही है माँ मजूरी करके मुझे पढ़ा रही है । पैसे नही होने के कारण 10 किलोमीटर बस की जगह सायकल चलाकर स्कूल आती हूँ , मैं फीस कहां से लाऊंगी । प्लीज सर मेरी फीस माफ कर दो ना । " ये कोई फिल्मी डायलॉग या कोरी कल्पना नही वरण हकीकत है जो दिल्ली के चैनलों को नही दिखेगा क्योंकि दिल्ली से दूर गांव की मासूम की पीड़ा है जो बुद्धुबख्से को टीआरपी नही दिलवा पाएगी । इन दिनों बुद्धुबख्से और बुद्धूजीवीयो में जे. एन. यू. में कमरे के किराए को 10 से 300 रुपये करने व समय की पाबंदी को लेकर बवाल व हाहाकार मचा हुआ है । आई फोन धारी , ब्रांडेड कपड़े पहने बच्चो की गरीबी का रोना रो कर वास्तविक गरीबो का मजाक उड़ाया जा रहा है । दिलवालों की दिल...