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हर व्रत का समय काल अलग अलग होता है स्वामी राजेश्वरा नंद महाराज सुरेश्वरमहादेवपीठ
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हर व्रत का समय काल अलग अलग होता है स्वामी राजेश्वरा नंद महाराज सुरेश्वरमहादेवपीठ

आईये आपको शास्त्रों में दिये गये प्रमाणों के आधार पर स्वामी राजेश्वरानंद सुरेश्वर महादेव पीठ संस्थापक इस व्रत से अवगत कराता हूँ। कि 9 जून बुधवार को ही क्यो मनाना सही है। जिस समय का जो व्रत होता है उस तिथि की व्याप्ति देखी जाती है न् कि सूर्य की उदय तिथि। हर व्रत का समय काल अलग अलग होता है। उदाहरण-- १. व्रत पूर्णिमा प्रायः हर बार #चतुर्दशी तिथि में ही आता है लेकिन चंद्रोदय के समय पूर्णिमा रहती है। यह चांद्रव्रत है। चंद्रोदय के समय पूर्णिमा होनी चाहिए। सूर्योदय से इस व्रत का कोई मतलब नहीं। २. गणेश चतुर्थी व्रत-- यह व्रत प्रायः हर बार तृतीया तिथि में ही आता है। लेकिन चंद्रोदय के समय चतुर्थी ही रहती है। सूर्योदय से इस व्रत का कोई मतलब नहीं है। ३. प्रदोष व्रत प्रायः हर बार द्वादशी तिथि में ही आता है लेकिन प्रदोष(सांयकाल) में त्रयोदशी ही रहती है। सूर्योदय से इस व्रत का कोई मतलब नहीं...