वरिष्ठ पत्रकार चन्द्र शेखर शर्मा की बात बेबाक बेटियों का ख्याल रखो भारत , कि आदमखोर व्यवस्था, आजाद घूम रही है।

         “ये क्या हाल बना रखा है , आखिर कुछ करते क्यों नही”  कभी टीवी पर आने वाला यह विज्ञापन आज बच्चियों के साथ होते अनाचार ,मौत और बेबस होती सरकारों , लाचार वर्दी से अनायास ही याद आ गया । देश के विभिन्न हिस्सों में बदहाल होती कानून व्यवस्था ,  बच्चियों पर होते अत्याचार, महिलाओं की लुटती आबरू ने सोचने पर विवश कर दिया कि आखिर इनकी पीड़ा के लिए क्या एक दिन महिला दिवस , बालिका दिवस मना, मोमबत्ती जला ,काला रिबन बांध, मौन जुलूस निकाल सोशल मीडिया में फ़ोटो अपलोड कर लाइक्स बटोरना भर रह गया है । लोगो का हुजूम और उनकी अंतरात्मा भी जाति और धर्म देख कर जस्टिस मांगने लगी है । हमारी बेटियां रोज उत्पीडित हो रही हैं ,पर हमारी संवेदनाओं को पाला मार गया है ।
एक स्त्री केवल बलात्कार होने तक ही एक स्त्री रहती है , वो कोई हिन्दू , मुस्लिम या दलित नही होती है । देश की विडम्बना और हमारा दुर्भाग्य है कि घटिया राजनीती और टीआरपी की बीमारी के चलते बुद्धू बक्से के बुद्धिजीवी और खद्दर में छिपे मतलब परस्त मिल कर उसे हिन्दू – मुसलमान या दलित बना देते हैं और फिर यहाँ चालू होता है जुबानी बलात्कार का लाईव सीन। जितनी पीड़ा स्त्री को बलात्कार से होती है ,उससे कई गुना ज्यादा पीड़ा समाज और मीडिया दे देता है । बलात्कारी तो एक बार बलात्कार कर छोड़ देता है, पर समाज की घूरती आँखे ,काले कोट के चुभते सवाल , खाकी की शक भरी निगाहे , मीडिया की बेमतलब की बहस , राजनीतिक दलों द्वारा खोजी जाने वाली जाति , धर्म विरुद्ध मृत देह का क्रियाकर्म फिर मौसमी कैंडल मार्च उसके मन और आत्मा का बार बार बलात्कार करते है ।
सूर्यास्त के बाद चिताएं नहीं जलतीं साहब चिता के लिए, घासलेट, मिट्टी का तेल या पेट्रोल और डीजल का प्रयोग वर्जित है निषिद्ध। आखिर हाथरस में आधी रात किस सच को छुपाने में भिड़े थे वर्दीधारी । अरे जब लाश गायब ही करना था तो किसी कसाई को दे देते जो उसकी बोटियां काट, किसी नेता या अफसर की बेटे बेटी की शादी के भोज में तंदूरकर, स्वादिष्ट व्यंजन बना परोस देता। नारी शरीर था, औरत का गोश्त… जैसे जीते जी मजा दे गया, पकने के बाद भी स्वादिष्ट ही होता, स्वाद दे जाता! नहीं क्या !
अपराध को लेकर अक्सर पुलिस की कार्यशैली पर भी सवालिया निशान उठते रहे है और ऐसे लापरवाह वर्दी धारियों की सजा भी बलात्कारियों के बराबर होनी चाहिए ना कि निलंबन या लाइन अटैच ।
दिल्ली के निर्भया कांड के बाद कानून बना भी पर उसकी धार तो राजनीति , जातिवात और क्षेत्रवाद ने भोथरी कर दी है । शर्मिंदगी तो नपुंसक होते सिस्टम , सत्ता व विपक्ष की राजनीति पर भी  आती है जो राजनीति के तवे पे अपनी रोटी सेंकने  लाभ हानि देख सक्रिय होते है । राजधानी या बड़े शहरों की तुलना में गांव गरीब की बेटी के साथ हुए अत्याचार मात्र एक कालम की या फटाफट खबरों की भीड़ की एक छोटी सी खबर मात्र बन कर रह जाती है ।
माई बाप जाति और धर्म की खींचतान से फुरसत मिल गई हो तो यू आधी रात को हिन्दू धर्म के विरुद्ध जा कर पेट्रोल डाल पीड़िता की देह जलाने की जगह कातिलों , अत्याचारियों की गाड़ी भी विकास की गाड़ी की तरह पलटा देते , हैदराबाद की तरह घटना स्थल पर सीन रीक्रिएट करने की जहमत ही उठा लेते ।
और अंत मे –
शायद उस दिन ताला टूटे , संविधान की पेटी का ,
जिस दिन जिस्म निचोड़ा जाएगा , किसी खद्दरधारी की बेटी का ।

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