बस्तर राजा के राजगुरू परिवार ने खुदवाया था रायपुर के रामकुंड ,रामसागर पारा के आम बगीचा में तालाब

राम सागर का  तालाब तो बसाहट ओर आधुनिकता में पट गया अब रामकुंड और आमापारा में दो आमा तालाब बच गए हैं। जिसमें से एक आमा तालाब के चारो कोने में नाथ संप्रदाय के चार मंदिर है। जिसमें मच्छेन्द्र नाथ और उनके शिष्य गुरू गोरख नाथ सहित भूत नाथ और एक किनारे में औघड़ नाथ की प्राचीन मूर्ति स्थापित है। चारो दिशा में शिव लिगं और भगवान गणेश की मूर्ति स्थापित है। तालाब से लगा लक्ष्मी नारायण मठ है जो दो सौ साल पहले साधु संतो की तपोभूमि थी।  लक्ष्मी नारायण मठ  के महंत महाराज वेद प्रकाश ने बताया कि मठ का प्रभाव रायपुर शहर सहित आसपास के गांव में था। साधु संत तालाब के किनारे आम के बगीचे में योगा साधना तप जप  किया करते थे। जिनकी आसपास समाधियां भी स्थापित है। जिसका कुछ हिस्सा समता कालोनी में आता है। बहारहाल रायपुर में आम बगीचा और आमा तालाब अब लुप्त हो चुके हैं। दो आमा तालाब और उनके किनारे स्थित प्राचीन मंदिर अपना महत्व बताती है।

 

राजधानी में ही आदिवासियों के बस्तर का अहसास कर सकते हैं। देश-दुनिया में अपनी कला और संस्कृति के लिए पहचाने जाने वाले बस्तर की छवि रायपुर में भी है। यहां के चौक-चौराहों, सड़कों के आसपास की बाउंड्री पर बस्तर की भित्तिकला, चित्रकला से लेकर मंदिरों में मूर्तिकला भी बस्तरिया हैं। यहां तक कि छात्र-छात्राओं का अनुसंधान भी वनवासियों पर चल रहा है। राजधानी के पं. रविशंकर शुक्ला विश्वविद्यालय की मानव विज्ञान अध्ययनशाला में पिछले 10 सालों से बस्तर के आदिवासियों पर शोध किया जा रहा है।
एक नवंबर, 2000 को मध्यप्रदेश से छत्तीसगढ़ जब अलग हुआ, तब से अब तक राज्य में सांस्कृतिक विरासत, नैसर्गिक संपदा और जनजातियों की बहुलता वाले बस्तर की पहचान विदेशों तक पहुंची है।
विवि में हो रहे अध्ययन के मुताबिक प्रदेश में सर्वाधिक गोंड़ जनजातियां हैं। उनकी संख्या तीस लाख से ज्यादा है। इसके बाद कंवर, उरांव, हलवा और भतरा हैं, जिनकी जनसंख्या तीन से पांच लाख तक है। इस तरह जनजातियों के बीच काफी अंतर है। सबसे दिलचस्प बात यह है कि शेष जनजातियां ऐसी हैं, जिनकी संख्या एक लाख से भी कम है। पंडित रविशंकर शुक्ल विवि के मानव विज्ञान विभाग सेवानिवृत्त प्रोफेसर डॉ. मिताश्री मित्रा बताती हैंं कि आदिवासियों की ओर से किए जा रहे कई देशज उपचार के तरीके और जड़ी-बूटियों को उन्होंने खोजा है।

वक्त और स्वार्थ की मार से शायद ही कोई इस दुनिया में बचा हो। कुछ यही हाल बस्तवाड़ा का है, जो कभी छत्तीसगढ़ी की आन-बान और शान में अंगूठी में नगीने की तरह जगमगाने वाले और बस्तर के राजघरानों के वजूद को खुद में समेटे बस्तरवाड़ा अपनों की जंग में हारकर चुका है। अब सिर्फ इतिहास और सरकारी दस्तावेजों में ही दर्ज होकर सांस्कृतिक धरोहर को नहीं सहेज पाने की कसक हर किसी के मन से खलती रहेगी। स्टेशन रोड पर आज बस्तरवाड़ा के जगह इमारतें खड़ी हो गईं। अब तो इसके बोर्ड भी हट गए हैं, जहां विज्ञापन के होर्डिंग टंगे दिखने लगे।

बता दें कि सन 1818 ईसवी में छत्तीसगढ़ के राजा रघुजी भोसले के शासनकाल में नागपुर में सभी सरकारी कामकाज होते थे, लेकिन जब धीरे-धीरे रायपुर दफ्तर स्थानांतरित हुए तो यहां बस्तर के राजा प्रवीरचंद भंजदेव ने इस बस्तरवाड़ा का निर्माण कराया था। जहां राजवाड़े काम कराने के लिए यहीं स्र्कते थे। इनकी रानी और इनके बेटे प्रवीरचंद्र भंजदेव भी यही ठहरते थे। बाद में सन 1854 में अंग्रेजी शासन के बस्तर के राजघराने के बच्चों के लिए सन 1882 में राजकुमार कॉलेज की स्थापना हुई थी।

बस्तर के लेखक ने तैयार कराया था रमसगरी तालाब

राजधानी के बढ़ईपारा इलाके का रामसागरपारा मशहूर क्षेत्र है, लेकिन अधिकतर लोग इसके नामकरण के बारे में कम ही जानते हैं। अभी नगर निगम के परिसीमन के बाद इस क्षेत्र के वार्ड को भी विलोपित कर दिया गया है। इतिहासकारों की मानें तो 1908 की बस्तर भूषण किताब और जन कवि सुरेंद्रनाथ मिश्र ‘सुरता के अनुसार देश के बस्तर भूषण के लेखक पं. केदारनाथ ठाकुर के माता-पिता की मृत्यु कार्तिक पूर्णिमा के दिन हुई थी। उन्होंने अपने माता-पिता की याद में रामसागर तालाब खुदवाया था। तालाब के आसपास लोग घर बनाकर रहने लगे और क्षेत्र का नाम रामसागरपारा पड़ गया।

इतिहासकार डा.रमेंद्रनाथ मिश्र बताते हैं कि पं. केदारनाथ ने तालाब के किनारे आम के पेड़ लगवाए थे। यह लगभग 125 साल पुरानी बात है। केदारनाथ राजगुरु परिवार से थे। रायपुर में पुरानी बस्ती के टूरी हटरी में उनका निवास था। यहां अभी भी एक पुराने समय का टीला है। बढ़ईपारा के बृजमोहन शर्मा और इमरती लाल बताते हैं कि यह टीला आज भी पुराने जमाने की याद दिलाता है। अब रमसगरी तालाब के आसपास ज्यादातर अवैध कब्जे हो चुके हैं। वर्तमान में तालाब का अस्तित्व खतरे में है। तालाब के आसपास घनी बस्ती बस गई है। चारों तरफ से तालाब घरों से घिर गया है।

हलांकि IMNB के सर्वे और चर्चा से यह बात भी सामने आई है कि स्टेशन से लगे राम नगर,राम सागर पारा और राम कुंड और आमापारा एक दूसरे से लगे हुए इलाके हैं सौ साल पहले यह आम के बगीचे थे। इस लिए इनके आसपास का इलाका आमापारा कहलाता है। आमापारा का एक हिस्सा रामसागर पारा और बढ़ाईपारा से लगा हुआ है।रामकुंड और राम सागर पारा के आसपास आम के पेड़ और आमा तालाब के नाम से कम से कम चार तालाब और आम के घने जंगल थे। राम सागर का तालाब तो आधुनिकता में पट गया अब रामकुंड और आमापारा में दो आमा तालाब बच गए हैं। जिसमें से एक आमा तालाब के चारो कोने में नाथ संप्रदाय के चार मंदिर है। जिसमें मच्छेन्द्र नाथ और उनके शिष्य गुरू गोरख नाथ सहित भूत नाथ और एक किनारे में औघड़ नाथ की प्राचीन मूर्ति स्थापित है। चारो दिशा में शिव लिगं और भगवान गणेश की मूर्ति स्थापित है। तालाब से लगा लक्ष्मी नारायण मठ है जो दो सौ साल पहले साधु संतो की तपोभूमि थी। वह लक्ष्मी नारायण मठ है। मठ के महंत महाराज वेद प्रकाश ने बताया कि मठ का प्रभाव आसपास था। साधु संत तालाब के किनारे आम के बगीचे में योगा साधना तप जप  किया करते थे। जिनकी आसपास समाधियां भी स्थापित है। जिसका कुछ हिस्सा समता कालोनी में आता है। बहारहाल रायपुर में आम बगीचा और आमा तालाब अब लुप्त हो चुके हैं। दो आमा तालाब और उनके किनारे स्थित प्राचीन 4 नाथो की मंदिर अपना महत्व बताती है। जिसमें महायोगी मच्छेन्द्र नाथ और उनके शिष्य योगी गोरक्ष नाथ महाराज सहित दो सिद्ध नाथो का नाम भी आसपास के लोग लेते हैं। जिसमें भूत नाथ और औघड़नाथ के नाम से मंदिर है। 9 नाथ परंपरा अनुसान यहां शिव लिंग स्थापित है। देवी का मंदिर भी है। जिसकी देख रेख महंत लक्ष्मी नारायण मठ के महंत आसपास के रहवासियों की मदद से करते थे।

 

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