बौद्ध धर्म को बढ़ाने भिक्षुओं को गांव-गांव प्रचार करने की जरुरत है-छत्तीसगढ़ के गांव गांव में बौद्ध धर्म का प्रचार करने घुमेंगे बौद्ध भिक्षु, नंद कुमार बघेल

महासमुंद, 14 मार्च 2021।(IMNB NEWS AGENCY )  तीन दिवसीय अंतरराष्ट्रीय सिरपुर बौद्ध महोत्सव एवं शोध संगोष्ठी-2021 के समापन अवसर पर  आज समारोह के मुख्यअतिथि बाबूजी नंद कुमार बघेल ने कहा कि बौद्व भिक्षुओं को सन्यासी बनने के बाद घर वापस नहीं जाकर गांव-गांव बुद्व धर्म के प्रचार प्रसार के लिए जीवन को समर्पित करना चाहिए। सिर्फ चीवर धारण करने मात्र से बुद्व धम्म लोगों तक नहीं पहुंच सकेंगे। उन्होंने कहा कि बुद्व धर्म की स्थापना के लिए नव जवानों को आगे आने की जरुरत है। श्री बघेल ने कहा कि प्रदेश के सभी ब्लॉक स्तर में बुद्व की शिक्षा , ज्ञान व संदेशों को फैलाने के लिए मंगल भवन बनाए जाए। जहां शिक्षा व स्वास्थ्य के लिए भी ज्ञान मिल सके।

श्री बघेल ने आगे यह भी कहा कि कांग्रेस नेता सोनिया गांधी व राहुल गांधी पिछड़ों को 52 प्रतिशत आरक्षण देने के लिए संकल्प ले तो उत्तर प्रदेश में राहुल गांधी को मुख्यमंत्री बनाने के लिए सहयोग करेंगे। बाबू जी ने कहा कि अभी उनकी उम्र 85 साल की है 15 साल और जीवन जीने को बांकी है। अब जीवन के 15 सालों में हर दिन बुद्व धर्म के प्रचार के लिए गांव –गांव दौरा करेंगे।

इस मौके पर पं. रवि शंकर शुक्ल विश्वविद्यालय के कुलपति डॉ केएल वर्मा भाषाविद ने कहा कि बुद्वके संदेश के माध्यम से समाज में समरसता लाने का प्रयास करना चाहिए। मानवीय मूल्यों को जन-जन तक पहुंचाएं तभी जन कल्याण भी होगा। उन्होंने कहा कि बुद्व के समय में पाली भाषा लिपी में साहित्य का लेखन होता रहा है। पाली व छत्तीसगढी भाषा के व्याकरण में काफी समानताएं भी हैं। कुलपति डॉ वर्मा ने कहा कि पं.रविशंकर विवि में जल्द ही पाली भाषा व बौद्व अध्ययन केंद्र शुरु करने प्रयास किया जाएगा।

प्रोफसर रतन लाल ने कहा कि अंबेडकर और बुद्व पर आधारित साहित्य को लेकर निबंध का आयोजन करने से ही सभी धर्म , जाति व वर्ग के लोग बुद्व के विचारों से जुड़ सकेंगे। डॉ अंबेडकर ने कहा था कि बुद्व के मंदिर इतना बढा होना चाहिए की लोग इसको देखने दूर दूर से आए। बाबा साहब ने सामाजिक व नैतिक शिक्षा पर जोर दिया है। बुद्व को दर्शन पर नहीं अध्ययन पर शामिल करना चाहिए। डॉ अंबेडकर के भक्त होने से उनकी विचार धारा को खतरा है। बौद्व धर्म के प्रचार के लिए बुद्व विहारों पर सामुहिक प्रत्येक सप्ताह पूजा, चर्चा व चिंतन होना चाहिए। हमें बुद्विस्ट बनने का सिस्टम बनाना पड़ेगा।

प्रोफसर चौथी लाल यादव ने कहा कि 21 वीं शताब्दी डॉ अम्बेडकर का युग है। इस देश की पहचान गांधी, नेहरु, अंबेडकर व बुद्व के नाम से जाना जाता है। प्रो. यादव ने कहा कि 20 वीं शताब्दी का सबसे पढा लिखा व्यक्ति डॉ अंबेडकर हैं। हमें अब जमीन पर उतर कर सड़क पर आंदोलन करने की जरुरत है। सिरपुर की धरती बुद्व , अंबेडकर व कांशीराम की क्रांति की भूमि रही है। बुद्व व अंबेडकर के सपनों के भारत को जमीन पर उतारने बहुजन समाज को बनाने की जरुरत है। सभी जाति अलग-थलग पड़ी हुई है आज से हमें बहुजन समाज बनाने की संकल्पना करना होगा। जातियों में बिखरे समाजों को दलित लेखक प्रेरणादायी लेखक बुद्वजीव, चितंक मार्गदर्शन दिखाने का कार्य कर सकते हैं।

आदिवासी सत्ता के संपादक के आर शाह ने कहा कि बुद्व के विचार कल और आज भी प्रासंगिक हैं। समाज में भाईचारा लाने के लिए हमें प्रयास करने की जरुरत है। सिरपुर में आयोजित तीन बौद्व महोत्सव में सभी समाज व वर्ग के लोगों की भागीदारी होनी चाहिए। सिरपुर की विरासत को जानने और समझने यहां के आसपास के लोग नहीं आते इसे जन-जन तक जोड़ने की जरुरत है। तभी सिरपुर का वैभव शाली इतिहास पर हमें गर्व होगा।

इन विभूतियों को मिला सिरपुर पुरावैभव सम्मान –

छत्तीसगढ की सामाजिक, सांस्कृतिक, कला व साहित्य के क्षेत्र में जनजागृति लाने में आजीवन योगदान देने वाले विभूतियों को छत्तीसगढ़ कल्चर एवं हेरिटेज फाउंडेशन द्वारा अंतरराष्ट्रीय सिरपुर बौद्ध महोत्सव एवं शोध संगोष्ठी-2021के समापन अवसर नंदकुमार बघेल के हाथों सम्मानित किया गया। समारोह में डॉ. आरके सुखदेवे को छत्तीसगढ तर्क परिषद के द्वारा अंध विश्वास, पाखंड को दूर कर समाज में वैज्ञानिक एवं बौद्विक चेतना जगाने के लिए सिरपुर पुरा वैभव सम्मान से सम्मानित किया गया। इसी तरह प्रथम छत्तीसगढ़ी फिल्म  कहि देबे संदेश के निर्माता निर्देशक को फिल्म  निर्माण एवं सामाजिक सरोकार के लिए मनुनायक को सम्मानित हुए। आदिवसी सत्ता  मासिक पत्रिका के संपादक केआर शाह, कविता वासनिक को छत्तीसगढ़ी  लोकगीत गायन एवं समर्पण के लिए व चित्रकारी एवं कला के प्रति समर्पण के लिए बसंत साहू को सम्मानित किया गया। इस मौके पर महोत्सव में स्टॉल लगाने वाले चित्रकारों व कलाकारों को भी प्रमाण पत्र दिया गया। चित्रकार प्रवीण वासनिक, भोजराज ढोंगर, अमोल मेश्राम, विपीन भगत, यादव सुशांत सिदार, दिप्ति ओग्रे , शिवा मानिकपुरी, जादवां फिरदौस, प्रियांशी को भी पेंटिंग कला, फाइन आर्ट के लिए मंच से सम्मानित किया गया।

सावित्री कहार की अरपा पैरी की धार से …… झूम डठे दर्शक

मुख्यमंच पर सांस्कृतिक कार्यक्रम के रुप में आज कवि सम्मेलन का आयोजन किया गया। कवि सम्मेलन में भी कवियों ने बुद्व व अंबेडकर के संदेशों पर आधारित क्रांति कारी व व्यंगयात्मक पंक्तियों पर आधारित रचना प्रस्तुत किए। अज्ञान के अंधकार को मिटाकर बुद्व के ज्ञान ने प्रकाश दिए। सांस्कृतिक कार्यक्रम में देर रात चले प्रस्तुति में लोक गायिका सावित्री देवी कहार की लोक गीतों से दर्शक झुम उठे। रात्रि कालीन लोकगीतों की धुने से समापन अवसर पर छत्तीसगढ़ी गीतों की शानदार प्रस्तुति ने महोत्सव के मंच को संगीत से सराबोर कर दिया। सावित्रि कहार के सुमधुर संगीत में राउत नाचा की धमाकेदार संगीत से दर्शकों को अपनी ओर खींच लिया। सतनाम के हो बाबा पूजा करो जैतखाम के जैसी पंथी गीतों की बहार से मंच संगीत से चहक उठा। अरपा पैरी के धार राज्य गीत की महक से छत्तीसगढ महातारी का गुणगान संगीत की लहरे में झमक रहा था।

शोध संगोष्ठी का अध्यक्षता करते हुए आदिवासी सत्ता के संपादक केआर शाह ने कहा कि बौद्व धर्म, मुश्लिम धर्म, इसाई धर्म व हिंदू धर्म से पहले प्रकृति पर आधारित धर्म संचालित हो रहा था। दुनियाभर में धर्म का इतिहास 2 से 3 हजार साल पहले ही शुरु हुई है। जबकि भारत में बौद्विक विकास की शुरुआत अंग्रेजों के आने के बाद हुई है। सामाजिक सत्ता में एससी व एसटी समाज हमेशा से प्रताड़ित होता रहा है। देश में सर्वणों के अत्याचार के विरुद्व क्रंाति इसी वर्ग के लोगों के माध्यम से हुआ है। शोध संगोष्ठी के दोनों सत्रों में लगभग 60 से अधिक शोधार्थियों ने बौद्व अध्ययन पर आधारित शोध पत्र का वाचन किया। शोध पत्र के माध्यम से बौद्व के महत्व समाज के लिए  कार्यों पर किया गया। शोध छात्रों को प्रमाण पत्र का वितरण किया गय।

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