ऐसा चाहूँ राज मैं …

ऐसा चाहूँ राज मैं …..
बेगमपुरा की कल्पना करने वाले रविदास भारत के बड़े चिंतको और दार्शनिको मे होते अगर उनका साहित्य , बोल, भाषण, लेखन हमारे बीच होता। आज उनकी कुछ लाइन, चलती फिरती हमारे बीच सामने आ जाती है लेकिन उनकी बातें दबा दी गयी, खत्म कर दी गयी, और भारत को बेगमपुरा बनाने का सपने को साकार रूप देने के लिए कई सौ साल बाद डॉ आंबेडकर द्वारा निर्मित भारत का खाका सामने आया। बेगमपुरा अर्थात ऐसा देश/ समाज जो बिना गम के हो। रविदास की ये लाइन आज भी लोगो के जेहन मे है कि जात –जात मे जाती है,ज्यो केलन को पात, रविदास मानुष नहीं जुड़ सके , जब तक जाती न जात… एक अर्थ में रविदास की यह कल्पना अदितीय है, जो अंबेडकर के उस भाषण कि याद दिलाता है ज़ो हो न सका लेकिन बाद मे खूब पढ़ा जा रहा है, यानि ‘’जाति का उच्छेद’’। जब तक जाति का विनाश नहीं होगा , रैदास का भारत, बेगमपुरा नहीं बन सकता।जब तक जाति नहीं जाएगी, तब तक ‘’भारत के लोग’’ लोग नहीं बन पाएंगे और सच्चे अर्थों वाला लोकतन्त्र तो बहुत दूर कि बात है। यदि बेगमपुरा का अर्थ महिलाओं के सन्दर्भ में लिया जाय तो उस समय भारत में महिलाओं की स्थिति कैसी रही होगी। उनके बेगमपुरा का मतलब , बेगमों से था या नहीं ये कहना मुश्किल है, लेकिन बादशाहो कि हुकूमत तो उन्होने देखी थी, और इस अर्थ मे महिलाओ के राज/भागीदारी के बारे मे रविदास क्या सोचते थे ये कहना मुश्किल है, क्योकि उनका सारा चिंतन हमारे सामने नहीं आ पाया है। बेगमपुरा की संकल्पना की झलक उनकी चौपाई ‘ ऐसा चाहूँ राज मै, जहाँ मिले सबन को अन्न,छोट बड़ा सब संग बसे रैदास रहे प्रसन्न’ में मिलती है। समाजवादी, समतावादी जैसे आधुनिक विचारों को कहने के लिए यूरोप अमेरिका का माना जा सकता है, पर रविदास के चिंतन में बिना कोई स्पष्टीकरण दिए देखा जा सकता है| बेगमपुरा मे ऊँच नीच,जातीय भेद, हिंसा, जातीय श्रेष्टता का को जगह नहीं होती।
रविदास बनारस के रहने वाले थे लेकिन आज वाराणसी से रविदास गायब हो चुके हैं| रविदास के साहित्य को गायब कर दिया गया| जिस तरीके से बुद्ध साहित्य को गायब किया गया। आज जब कि हम प्रिंटिंग दौर में है अम्बेडकर के साहित्य को उत्तर भारत कि हिन्दी पट्टी से कैसे गायब किया गया। प्रसिद्ध सामाजिक चिंतक अर्जक रामस्वरूप वर्मा ने अंबेदार साहित्य कि जब्ती और बहाली शीर्षक लेख मे लिखा है कि ‘’ब्राह्मणवादियों कि सदैव यह कोशिश रही कि बाबा साहब का साहित्य जन –जन तक न पाहुच पाये।‘’ उत्तरभरत कि हिन्दी पट्टी मे अंबेडकर का साहित्य आज भी आसानी से उपलब्ध नहीं है। इस नजरिए देखेंगे तो आपको रविदास जैसे विचारक के विचार गायब हो जाने पर आश्चर्य नही होगा। फुटकर रूप से जहाँ तहां उनके विचार मिल जाते है। सिक्खों के धार्मिक ग्रन्थ गुरु ग्रन्थ साहब में संत रविदास की वाणी मिलती है, जो उसी प्रकार है जैसे स्वतन्त्रता , समानता कि बात फ्रांस कि क्रांति से भले ही निकले ,लेकिन आज भारत सहित दुनिया भर के लोगों मे ये विचार संचारित हो रहे हैं। उसी तरह रविदाश के बेगमपुरा के विचार हिन्दी पट्टी से भले ही गायब हो गए , बुद्ध के विचारों कि तरह पर, गुरुवानी मे उनके विचार पाँच नदियो वाले प्रदेश के सरदारों के बीच संचारित हो रहे हैं। सिख समाज वर्ण /जाति की परंपरागत बीमारियों से थोड़ा मुक्त हुआ , जिसका नतीजा है की कोई सिख भीख मांगते नहीं दिखता,और आज चल रहे किसान आन्दोलन को इतने व्यवस्थित ढंग के आन्दोलन के मूल में संत रविदास की वाणी संचारित हो रही है।
जाति भारतीय सामाजिक व्यवस्था का एक कटु सत्य है। रविदास चमार जाति से आते थे उन्होंने खुल कर कहा कि मै चमार हूँ(कह रविदास ख़लास चमारा) लेकिन इसे लेकर कोई हिन भावना मन मे नहिओ थी। आज का ग्रेट चमार या कि पेरियार का आत्मसम्मान का उद्घोष का संचार रविदास से ही चला आ रहा है। ग्रामीण क्षेत्रों में चमारों की बसावट को आज भी चमरौटी या हरिजन बस्ती कहा जाता है, जो बेगमपुरा से बहुत दूर है, जिसमे कभी आग भी लगा दी जाति है तो कभी चित्कारें निकलती है पर आवाज कमजोर होती है। रविदास का खुद को चमार कहने के पीछे कोई हीन विचार नही था। वो समता के पुरज़ोर लड़ाकू थे। उन्हे मिटाने की लाखों कोशिश के बाद भी रविदास आवाज दुनिया को बेगमपुरा बनाएगी एक दिन…ऐसा राज चाहने के लिए आपको, हमको पूरी दुनिया को आगे आना होगा।    प्रस्तुति गणेश सोनकर

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