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कार्तिकेय ने लगाई पृथ्वी की दौड़, गणेश जी ने माता-पिता की परिक्रमा से जीत ली बाजी

Ganesh Chaturthi Special:  2026 का पावन पर्व 14 सितंबर, सोमवार को मनाया जाएगा. प्रभात खबर की ‘गणेश चतुर्थी स्पेशल’ सीरीज की पहली कड़ी में आपने भगवान गणेश के जन्म और उनके गजानन बनने की रोचक कथा जानी. सीरीज की अगली कड़ी में हमने जाना कि भगवान गणेश का एक दांत कैसे टूटा और वे ‘एकदंत’ क्यों कहलाए. अब इस सीरीज की अगली कड़ी में जानिए भगवान गणेश और उनके भाई कार्तिकेय से जुड़ी एक ऐसी कथा, जिसमें दोनों भाइयों के बीच संसार की परिक्रमा करने की प्रतियोगिता हुई थी.

शिव-पार्वती ने रखी अनोखी शर्त

कथा के अनुसार, एक बार भगवान शिव और माता पार्वती के दोनों पुत्रों गणेश जी और कार्तिकेय के विवाह की बात चली. तब दोनों के सामने एक शर्त रखी गई. कहा गया कि जो सबसे पहले पूरी पृथ्वी की परिक्रमा करके वापस आएगा, उसका विवाह पहले किया जाएगा. यह प्रसंग शिव पुराण की रुद्रसंहिता के कुमारखंड में गणेश विवाह की कथा से जुड़ा है.

मोर पर सवार होकर निकल पड़े कार्तिकेय

शर्त सुनते ही कार्तिकेय अपने वाहन मोर पर सवार होकर पृथ्वी की परिक्रमा के लिए निकल पड़े. कार्तिकेय के पृथ्वी की परिक्रमा के लिए तुरंत निकलने का उल्लेख शिव पुराण की रुद्रसंहिता के कुमारखंड में मिलता है. कार्तिकेय के मोर वाहन का उल्लेख इस कथा की प्रचलित धार्मिक परंपरा और अन्य पुराणिक विवरणों में मिलता है. कार्तिकेय तेज गति से यात्रा कर सकते थे, इसलिए उन्हें भरोसा था कि वे सबसे पहले वापस लौट आएंगे. वहीं गणेश जी का वाहन मूषक था और उनके लिए इतनी लंबी यात्रा करना आसान नहीं था.

गणेश जी ने सोचा अलग रास्ता

कार्तिकेय के निकल जाने के बाद गणेश जी ने जल्दबाजी नहीं की. उन्होंने सोचा कि इस प्रतियोगिता को जीतने के लिए कोई दूसरा रास्ता निकाला जा सकता है. इसके बाद उन्होंने भगवान शिव और माता पार्वती को एक आसन पर बैठाया और उनकी पूजा की. शिव पुराण के अनुसार, गणेश जी ने माता-पिता की पूजा करने के बाद उनकी सात बार परिक्रमा की और उन्हें प्रणाम किया.

माता-पिता की कर दी परिक्रमा

पूजा करने के बाद गणेश जी ने अपने माता-पिता की परिक्रमा शुरू कर दी. शिव पुराण में गणेश जी द्वारा माता-पिता की सात बार परिक्रमा करने का उल्लेख मिलता है. इसके बाद उन्होंने भगवान शिव और माता पार्वती को प्रणाम किया और कहा कि उनके लिए माता-पिता ही पूरा संसार हैं. इसी प्रसंग में शिव पुराण में माता-पिता की पूजा और परिक्रमा को पृथ्वी की परिक्रमा के समान फल देने वाली बताया गया है.

बुद्धि से जीत गए गणेश जी

 की बात सुनकर उनकी बुद्धिमानी की प्रशंसा हुई और उन्हें प्रतियोगिता का विजेता माना गया. इस कथा का एक रूप अन्य पुराणिक परंपराओं में भी मिलता है. यहां गणेश जी ने अपनी ताकत या गति के बजाय अपनी समझदारी का इस्तेमाल किया.

कथा देती है बड़ी सीख

गणेश जी और कार्तिकेय की यह कथा हमें बताती है कि हर काम केवल ताकत के दम पर पूरा नहीं होता. कई बार सही समय पर सही फैसला लेना ज्यादा जरूरी होता है. गणेश जी ने परिस्थिति को समझा और अपनी बुद्धि से उस चुनौती का आसान रास्ता खोज लिया. शिव पुराण में भी गणेश जी की बुद्धिमानी की प्रशंसा करते हुए बताया गया है कि बुद्धि के साथ व्यक्ति मुश्किल परिस्थिति पर विजय पा सकता है.

माता-पिता के सम्मान का संदेश

इस कथा में माता-पिता के सम्मान का संदेश भी छिपा है. गणेश जी ने माता-पिता को ही अपना संसार माना. यही वजह है कि यह कहानी आज भी बच्चों और बड़ों को यह सीख देती है कि माता-पिता का सम्मान करना और उनकी अहमियत समझना जीवन में बहुत जरूरी है. पद्म पुराण में भी माता-पिता की सेवा और पूजा को बहुत महत्वपूर्ण माना गया है और उनकी परिक्रमा को पृथ्वी की परिक्रमा के समान पुण्य देने वाला बताया गया है.  

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