
बॉलीवुड में सुपरस्टार की कहानी अक्सर उसके स्टारडम, बॉक्स ऑफिस और कामयाबी के इर्द-गिर्द घूमती है. लेकिन उस लेखक की कहानी क्या, जिसने उसी सुपरस्टार के लिए ऐसे डायलॉग लिखे, जिन्हें बोलकर वह पर्दे पर गुस्से की पहचान बन गया? और जब उसी लेखक को अपने पुराने दोस्त को उसके नाम से बुलाने के बजाय ‘सर जी’ कहने की सलाह मिली, तो उसे कैसा लगा होगा?
यह कहानी है कादर खान की. वही कादर खान, जिन्होंने अमिताभ बच्चन की कई फिल्मों के लिए संवाद लिखे, कभी खलनायक बनकर पर्दे पर खौफ पैदा किया और कभी गोविंदा के साथ ऐसी कॉमेडी की कि दर्शक आज भी उनकी जोड़ी को याद करते हैं. लेकिन उनकी जिंदगी का एक किस्सा फिल्मों की कामयाबी से ज्यादा उनके स्वाभिमान और अमिताभ के साथ रिश्तों में आई दूरी के कारण चर्चा में रहा.
22 अक्टूबर को कादर खान की जयंती पर उनकी जिंदगी के उन पहलुओं को जानना जरूरी है, जो पर्दे पर दिखाई नहीं देते. गरीबी से निकलकर लेखक बनने की कहानी, पहली फीस, सुपरहिट फिल्मों का सफर और एक ऐसी दोस्ती, जिसके बदलने की कसक उन्होंने खुद अपने इंटरव्यू में जाहिर की थी.
‘अमित नहीं, सर जी कहो!’ दोस्ती के बीच कहां आ गई औपचारिकता?
कादर खान और अमिताभ बच्चन ने हिंदी सिनेमा को कई यादगार फिल्में दीं. दोनों के बीच काम का रिश्ता इतना मजबूत था कि कादर खान अमिताभ को ‘अमित’ कहकर बुलाते थे. उनके लिए अमिताभ सिर्फ पर्दे के महानायक नहीं, बल्कि पुराने परिचित थे, जिनके साथ उन्होंने फिल्मी सफर के कई अहम पड़ाव साझा किए थे.
फिर एक दिन ऐसा प्रसंग आया, जिसका जिक्र कादर खान ने एक इंटरव्यू में किया. उनके मुताबिक, दक्षिण भारतीय फिल्म इंडस्ट्री के एक निर्माता ने उनसे पूछा कि क्या वह ‘सर जी’ से मिले हैं. कादर खान ने पूछा कि वह किसकी बात कर रहे हैं. निर्माता ने अमिताभ बच्चन का नाम लिया.
कादर खान ने कहा कि वह तो अमित हैं. इस पर निर्माता ने उन्हें समझाया कि अब अमिताभ बड़े आदमी बन चुके हैं, इसलिए उन्हें ‘सर जी’ कहकर बुलाना चाहिए.
बात सुनने में छोटी लग सकती है, लेकिन कादर खान के लिए इसका मतलब कुछ और था. जिस इंसान को वह बरसों से नाम लेकर बुलाते आए थे, उसके लिए अचानक संबोधन बदलना उन्हें सहज नहीं लगा. उनके बयान के मुताबिक, वह अमिताभ को ‘सर जी’ नहीं कह पाए और दोनों के बीच पहले जैसी बातचीत नहीं रही.
यहीं इस कहानी का सबसे दिलचस्प पहलू है. क्या दो लोगों के बीच दूरी सिर्फ एक संबोधन से पैदा हो सकती है? शायद रिश्तों में असली परेशानी शब्द नहीं, बल्कि उस बदलाव का एहसास होता है जो उन शब्दों के पीछे छिपा होता है. हालांकि, इस घटना को कादर खान के नजरिये से ही समझना चाहिए. अमिताभ बच्चन की तरफ से इसे रिश्तों में दूरी की वजह बताने वाला कोई समान बयान सामने नहीं है.
‘खुदा गवाह’ और दूसरी फिल्मों का क्या हुआ?
कादर खान ने अपने इंटरव्यू में अमिताभ बच्चन के साथ रिश्तों में आई दूरी का जिक्र करते हुए कुछ फिल्मों की बात भी की थी. उन्होंने कहा था कि वह ‘खुदा गवाह’ में नहीं थे और ‘गंगा जमुना सरस्वती’ की स्क्रिप्ट बीच में छोड़कर अलग हो गए थे. उन्होंने दूसरी फिल्मों से दूरी बनाने की बात भी कही थी.
यहां एक जरूरी फर्क समझना होगा. कादर खान ने अपने बयान में फिल्मों से जुड़े अनुभव साझा किए थे, लेकिन इससे यह साबित नहीं होता कि हर फिल्म से उन्हें अमिताभ या किसी निर्माता ने जानबूझकर बाहर किया था. इसलिए इस किस्से को उनके करियर में आए बदलाव और उनके अपने अनुभव के तौर पर देखना ज्यादा सही होगा.
फिर भी, यह सवाल उठता है कि जिस लेखक ने अमिताभ बच्चन की फिल्मों में इतना योगदान दिया, उसके करियर का एक अहम रिश्ता आखिर इस मोड़ पर कैसे पहुंच गया? कादर खान के बयान ने इस सवाल को और दिलचस्प बना दिया.
350 रुपये की नौकरी से 1500 रुपये की पहली फिल्म तक
कादर खान की जिंदगी का दूसरा पहलू उनके संघर्ष का है. उनका जन्म 22 अक्टूबर 1937 को काबुल में हुआ था. उनका परिवार बाद में मुंबई आ गया. शुरुआती जिंदगी में आर्थिक मुश्किलें थीं, लेकिन उन्होंने पढ़ाई नहीं छोड़ी. सिविल इंजीनियरिंग की पढ़ाई पूरी करने के बाद वह मुंबई के एमएच साबू सिद्दीक कॉलेज में लेक्चरर बन गए.
उनकी तनख्वाह करीब 350 रुपये थी. लेकिन उनके भीतर अभिनय और लेखन का जुनून था. वह थिएटर करते थे, नाटक लिखते थे और अपने किरदारों को खुद मंच पर निभाते थे. इसी दुनिया ने उन्हें फिल्मों की ओर पहुंचाया.
कादर खान ने बताया था कि फिल्म ‘जवानी दीवानी’ के लिए डायलॉग लिखने पर उन्हें 1500 रुपये मिले थे. यानी फिल्म से मिली पहली कमाई उनकी कॉलेज की तनख्वाह से कई गुना ज्यादा थी. इसके बाद ‘खेल खेल में’ के लिए उन्हें 21 हजार रुपये मिले. मनमोहन देसाई की फिल्म ‘रोटी’ के लिए उनकी फीस 1.21 लाख रुपये तक पहुंचने का किस्सा भी उन्होंने साझा किया था.
सोचिए, जिस शख्स ने कुछ समय पहले तक कॉलेज में पढ़ाकर घर चलाया, उसकी कलम की कीमत फिल्म इंडस्ट्री में तेजी से बढ़ने लगी. लेकिन कादर खान की सबसे बड़ी ताकत सिर्फ पैसे कमाना नहीं थी. वह जानते थे कि किसी किरदार को यादगार बनाने के लिए संवाद में कितना गुस्सा, कितनी चोट और कितनी सच्चाई चाहिए.
अमिताभ के डायलॉग लिखे, लेकिन पहचान सिर्फ लेखक की नहीं रही
कादर खान ने अमिताभ बच्चन की कई फिल्मों में संवाद और पटकथा लेखन किया. ‘अमर अकबर एंथनी’, ‘मुकद्दर का सिकंदर’, ‘नसीब’, ‘लावारिस’ और ‘शराबी’ जैसी फिल्मों के दौर में उनकी लेखनी की अहम भूमिका रही.
उनकी खासियत थी कि वह सिर्फ शब्द नहीं लिखते थे, किरदार की आवाज तैयार करते थे. पर्दे पर गुस्से में बोलने वाला नायक हो, दुख में टूटा इंसान हो या अपने अधिकार के लिए लड़ता किरदार—कादर खान संवादों में उस भाव को पकड़ने की कोशिश करते थे.
उन्होंने केवल अमिताभ के लिए ही नहीं लिखा. उनकी लेखनी ने कई दूसरे सितारों की फिल्मों को भी मजबूत बनाया. फिल्म ‘अंगार’ के लिए उन्हें 1992 में फिल्मफेयर का सर्वश्रेष्ठ संवाद लेखक पुरस्कार मिला.
यही वजह है कि कादर खान को सिर्फ किसी एक सुपरस्टार से जोड़कर देखना उनकी प्रतिभा को सीमित करना होगा. उनकी कलम की अपनी पहचान थी.
विलेन की आंखों में खौफ, कॉमेडी में ऐसा तड़का कि बन गए सबके चहेते
कादर खान का फिल्मी सफर किसी एक छवि में नहीं बंधा. उन्होंने शुरुआत में नकारात्मक और गंभीर किरदार निभाए. पर्दे पर उनकी आवाज, चेहरे के भाव और संवाद बोलने का तरीका उन्हें अलग बनाता था.
फिर आया कॉमेडी का दौर. गोविंदा के साथ उनकी जोड़ी ने दर्शकों को खूब हंसाया. ‘दुल्हे राजा’, ‘कुली नंबर 1’, ‘हीरो नंबर 1’ और ‘राजा बाबू’ जैसी फिल्मों में उनके किरदार आज भी याद किए जाते हैं.
कभी वह सख्त पिता बनते, कभी चालाक कारोबारी और कभी अपनी ही बातों में उलझने वाला ऐसा किरदार, जिसकी हरकतों पर दर्शक हंस पड़ते. कादर खान की असली कामयाबी यही थी कि वह विलेन से कॉमेडियन तक का सफर तय कर सके और दोनों भूमिकाओं में अपनी जगह बना सके.
आखिरी दौर में फिल्मों से दूरी, लेकिन किस्से रह गए
कादर खान ने अपने करियर में सैकड़ों फिल्मों में अभिनय किया और कई फिल्मों के लेखन में योगदान दिया. उम्र बढ़ने के साथ स्वास्थ्य संबंधी परेशानियां बढ़ीं और वह धीरे-धीरे फिल्मों से दूर होते गए. जीवन के आखिरी वर्षों में वह कनाडा में रहने लगे.
31 दिसंबर 2018 को टोरंटो में 81 वर्ष की उम्र में उनका निधन हो गया. उनके जाने के बाद फिल्म इंडस्ट्री ने एक ऐसे कलाकार को याद किया, जिसने पर्दे के सामने और पीछे दोनों जगह अपनी छाप छोड़ी थी.
अमिताभ बच्चन ने भी उनके निधन पर श्रद्धांजलि दी और उनकी प्रतिभा को याद किया. कादर खान के बेटे सरफराज खान ने भी एक इंटरव्यू में बताया था कि उनके पिता के मन में अमिताभ के लिए बहुत प्यार था.
इसलिए ‘अमित’ से ‘सर जी’ तक का किस्सा सिर्फ दो फिल्मी हस्तियों के बीच दूरी की कहानी नहीं है. यह उस दौर की याद भी है, जब लेखक की कलम सुपरस्टार की आवाज बनती थी और दोनों के बीच का रिश्ता फिल्मों से कहीं आगे तक जाता था.
कादर खान ने अपने किरदारों को ऐसी आवाज दी, जो दशकों बाद भी याद की जाती है. उनकी जिंदगी में कामयाबी थी, पैसा था, शोहरत थी और कुछ ऐसे रिश्ते भी थे, जिनकी कसक उनके अपने बयानों में सुनाई देती है. यही उनके सफर का वह पहलू है, जो उन्हें सिर्फ एक अभिनेता या लेखक नहीं, बल्कि हिंदी सिनेमा की एक यादगार शख्सियत बनाता है.









