Ro no D15139/23

वरिष्ठ पत्रकार चंद्रशेखर शर्मा की बात बेबाक… मूर्ति खड़ी है बगल में, पर नजर से ओझल, राजनीति की धूप में, सच्चाई भी झुलस गई कल। चुनावी नारे, बड़े-बड़े भाषण, सबका खेल यही रहा, इतिहास को धूल में दबा दिया, मतलब का दिखावा पुरा रहा।

हैलो मंत्री जी मैं सावरकर बोल रहा हूँ –

फाइलें बदलती हैं, कुर्सियाँ बदलती हैं, अध्यक्ष बदलते हैं
पर मेरी जगह क्यों नहीं ?


सालों से शहर के मध्य वीर सावरकर भवन के एक अंधेरे कोने में खरपतवार के बीच उपेक्षित पड़ी स्वतंत्रता संग्राम सेनानी विनायक दामोदर सावरकर (वीर सावरकर) की मूर्ति अपने स्थापना काल से ही नर्सिंग कॉलेज की ओर ताकती बेबस खड़ी है । नगरपालिका में चार – चार भाजपा अध्यक्ष बदले पर मूर्ति का स्थानांतरण कहे या उचित जगह स-सम्मान स्थापना का आदेश आज पर्यंत तक नही आ पाया । बताते है पुराने अध्यक्ष और इंजीनियर स्थानांतरण के लिए फंड का रोना रोते रोते कुर्सी से ही उतार दिए गए कुछ रिटायर हो गए नए आ भी गए पर सावरकर के सम्मान जनक स्थानांतरण के लिए फण्ड का जुगाड़ नही हो पाया । बड़े शर्म की बात है कि शहर के मुख्य चौक भारत माता चौक महामाया मंदिर के सामने अंबेडकर चौक के पास वीर सवारकर भवन के एक अंधेरे कोने में खरपतवार के बीच स्थापित वीर सावरकर की मूर्ति आज फिर चर्चा में है। वजह वही पुरानी सम्मान और आदर की कमी की ।
वीर सवारकर भवन के कोने में अपनी नियती को कोसते खड़ी मूर्ति भी नर्सिंग कॉलेज की ओर टकटकी लगाए मानो पूछ रही हो, “आख़िर भवन के बाजू से सामने की ओर सम्मानजनक स्थान पर मेरा ट्रांसफ़र ऑर्डर किस फाइल में अटक गया है ? मेरे लिए फण्ड का जुगाड़ कब होगा , कम से कम मेरा लूट लिया गया चश्मा ही दिलवा देते इसके लिए किसकी सिफारिश लगेगी नेता जी ?”
बीते कुछ वर्षों में पालिका में एक कांग्रेसी सहित चार भाजपाई अध्यक्ष बदले, पर किसी ने भी मूर्ति का स्थान बदलवाने का महान व कठिन मिशन पूरा नहीं किया। सावरकर के नाम से राजनीति की दुकानदारी चमकाने वाले साल में एक बार मूर्ति का जलाभिषेक व माल्यार्पण का एक दिवसीय आयोजन कर अपने सालाना दस्तूर को निभा जिम्मेदारी व कर्तव्यों से इतिश्री पा भाषणों में सावरकर का सम्मान जिंदा रखे हुए है । वीर सावरकर के नाम पर कांग्रेस भाजपा आपस मे खोखली बयानबाजी करते नजर आते है । आज सावरकर जी होते तो अपने ही नेताओं से अपनी अनदेखी व बेकद्री देख शर्मसार हो जाते की क्या मैंने इनके लिए कालेपानी की सजा पाई थी ।
आज उनकी मूर्ति के पास खड़े होने से अहसास होता है मानो उनकी उम्मीद भरी नजरें कह रही हों “बेटा छात्राओं को नर्सिंग पढ़ते और डिग्री पाते देखते-देखते इतने सालों से यहीं खड़ा हूँ, अब तो नर्सिंग में ऑनररी डिप्लोमा मुझे भी मिल सकता है ।”
वैसे एक बार फिर सावरकर की मूर्ति को सम्मान दिलाने के मुद्दे को ले शहर में बहस फिर तेज़ हो गई है किंतु राजनैतिक गलियारे के विशेषज्ञों का अनुमान है कि बहस के चार चक्र पूरे होने तक पांचवा अध्यक्ष भी बन जाय और मूर्ति वहीं की वहीं नर्सिंग कालेज की ओर बेबस निगाहों से ताकती खड़ी रहे तो इसमें कोई आश्चर्य नही होना चाहिए । अपनी बेकद्री , अनदेखी , मतलबपरस्ती को झेलती स्वतंत्रता संग्राम सेनानी विनायक दामोदर सावरकर की मूर्ति शहर की राजनीतिक टाइमलाइन की एक शांत , किंतु अचल गवाही ।

चलते चलते :-
क्या यह सच है कि कोतवाली क्षेत्र के गंगानगर जुआ कांड में खिलाड़ी तो एक फ़ोन पे बच निकले किंतु वो नौ हजार की रकम लापता हो गई ?

और अंत में :-

मूर्ति खड़ी है बगल में, पर नजर से ओझल,
राजनीति की धूप में, सच्चाई भी झुलस गई कल।
चुनावी नारे, बड़े-बड़े भाषण, सबका खेल यही रहा,
इतिहास को धूल में दबा दिया, मतलब का दिखावा पुरा रहा।

#जय_हो 26 नवम्बर 2025 कवर्धा (कबीरधाम)

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