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28 साल की हुई ममता बनर्जी की तृणमूल कांग्रेस, अस्मिता की राजनीति को नया रूप दिया

पश्चिम बंगाल में सत्तारूढ़ तृणमूल कांग्रेस पार्टी 28वें साल में प्रवेश कर चुकी है. इस 28 साल में टीएमसी सुप्रीमो ममता बनर्जी ने बंगाल में अस्मिता की राजनीति को नया रूप दिया है. कांग्रेस पार्टी से अलग होकर 1 जनवरी 1998 को ममता बनर्जी ने तृणमूल कांग्रेस का गठन किया था.

TMC News: पश्चिम बंगाल में 15 साल से शासन कर रही तृणमूल कांग्रेस अपनी स्थापना के 28वें वर्ष और एक नये चुनावी चक्र में प्रवेश कर चुकी है. ममता बनर्जी की पार्टी एक ओर अपनी वैचारिक स्थिति को नये सिरे से गढ़ रही है, तो दूसरी ओर वह बंगाली ‘अस्मिता’ को ‘बंगाली हिंदू पहचान’ की अधिक स्पष्ट अभिव्यक्ति के साथ जोड़ रही है. इसका उद्देश्य यह है कि वह अपने पारंपरिक अल्पसंख्यक वोट बैंक को असहज किये बिना हिंदू समर्थन को मजबूत कर सके. इसका एक और मकसद है भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के तुष्टीकरण के विमर्श का मुकाबला करना.

1 जनवरी 1998 को ममता बनर्जी ने बनायी थी तृणमूल कांग्रेस

कांग्रेस से अलग होकर ममता बनर्जी ने 1 जनवरी 1998 को वाम मोर्चा के जमे-जमाये शासन को चुनौती देने के उद्देश्य से तृणमूल कांग्रेस की स्थापना की थी. वर्ष 2011 में ‘मां, माटी, मानुष’ के नारे के इर्द-गिर्द जमीनी स्तर पर हुए व्यापक जन आंदोलन के दम पर टीएमसी सत्ता में आयी थी.

बंगाल में तीखी हुई अस्मिता की राजनीति

वर्ष 2026 के बंगाल विधानसभा चुनाव को अब महज 3 महीने बचे हैं. पार्टी एक बदले हुए राजनीतिक परिदृश्य का सामना कर रही है, जहां अस्मिता की राजनीति अधिक तीखी हो चुकी है. भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के साथ मुकाबला और भी कड़ा होता जा रहा है.

ममता बनर्जी की चुनावी रणनीति में स्पष्ट दिख रहा बदलाव

मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की चुनावी रणनीति में भी यह बदलाव स्पष्ट रूप से दिख रहा है. उन्होंने दक्षिण बंगाल के दीघा में 213 फुट ऊंचे जगन्नाथ मंदिर, कोलकाता में दुर्गा मंदिर और सांस्कृतिक परिसर (दुर्गा आंगन) और सिलीगुड़ी में महाकाल मंदिर जैसी कई मंदिर परियोजनाओं के उद्घाटन या निर्माण की घोषणा की है.

TMC News: अल्पसंख्यक तुष्टीकरण के आरोपों का जवाब दे रही ममता बनर्जी

पार्टी के अंदरूनी सूत्रों ने निजी तौर पर स्वीकार किया है कि यह प्रयास भाजपा द्वारा ममता बनर्जी को अल्पसंख्यक तुष्टीकरण से प्रेरित नेता के रूप में लगातार पेश किये जा रहे आरोपों का जवाब देने के उद्देश्य से किया गया है.

बंगाली हिंदुओं तक पहुंचने की कोशिश कर रहीं बंगाल की सीएम

राजनीति विश्लेषक बिश्वनाथ चक्रवर्ती इसे सोच-समझकर बनायी गयी, लेकिन जोखिम भरी रणनीति बताते हैं. उनका मानना है कि ममता बनर्जी मुसलमानों के खिलाफ खड़े हुए बिना बंगाली हिंदुओं तक पहुंचने की कोशिश कर रही हैं.

 

ममता बनर्जी चंडी पाठ करती हैं, अपने ब्राह्मण वंश का भी देतीं हैं हवाला

एक अन्य विश्लेषक ने कहा कि बंगाल के राजनीतिक विमर्श के भीतर ममता बनर्जी के दृष्टिकोण को तेजी से हिंदुत्ववादी के रूप में वर्णित किया जा रहा है. हिंदू राष्ट्र के विचार को खारिज करते हुए टीएमसी सुप्रीमो ममता बनर्जी ने सार्वजनिक कार्यक्रमों में ‘चंडी पाठ’ का पाठ करने से लेकर भाजपा नेता शुभेंदु अधिकारी के साथ विधानसभा चुनाव में तीखी बहस के दौरान अपने ब्राह्मण वंश का हवाला देने तक, अपने व्यक्तिगत विश्वास को अधिक स्पष्ट रूप से सामने रखा है, जबकि वह ईद और क्रिसमस समारोहों में भाग लेना जारी रखती हैं.

सौगत रॉय बोले- नरम हिंदुत्व की ओर नहीं बढ़ रही तृणमूल कांग्रेस

तृणमूल कांग्रेस नेतृत्व इस वैचारिक झुकाव को खारिज करता है. वरिष्ठ सांसद सौगत रॉय ने ‘नरम हिंदुत्व’ के आरोप को नकारते हुए जोर देकर कहा कि पार्टी दृढ़ता से धर्मनिरपेक्ष बनी हुई है. रॉय कहते हैं कि तृणमूल कांग्रेस नरम हिंदुत्व की ओर नहीं बढ़ी है. सभी समुदायों की धार्मिक भावनाओं का सम्मान करने का मतलब धर्मनिरपेक्षता का त्याग करना नहीं है.

  

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