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PM Modi @ 76: Rising Power से Shaping Power तक भारत की विदेश नीति का सफर

जब नरेंद्र मोदी 2014 में भारत के प्रधानमंत्री बने, तब भारत को दुनिया पहले से ही एक Rising Power यानी उभरती हुई शक्ति के रूप में देख रही थी. अर्थव्यवस्था का विस्तार हो रहा था, अमेरिका के साथ रणनीतिक रिश्ते मजबूत हो चुके थे और शीत युद्ध के दौर की गुटनिरपेक्षता की सीमाओं से भारत धीरे-धीरे आगे बढ़ चुका था.

लेकिन मोदी दौर की खासियत यह नहीं थी कि भारत का उदय उनके साथ शुरू हुआ. असली बदलाव भारत की रणनीतिक सोच, महत्वाकांक्षा और आत्मविश्वास में दिखाई देता है.

प्रधानमंत्री मोदी के जन्मदिन के मौके पर भारत की विदेश नीति के इसी बदलाव को समझने की कोशिश की है इजरायल की India Expert Dr Lauren Dagan Amoss ने.

Rising Power से Shaping Power तक का सफर

Dr Lauren Dagan Amoss के विश्लेषण के मुताबिक, पिछले करीब 12 वर्षों में भारत की अंतरराष्ट्रीय भूमिका में सबसे महत्वपूर्ण बदलाव उसके Self-Perception यानी खुद को देखने के नजरिये में आया है.

अब भारत की कूटनीति में भाषा और व्यवहार दोनों में Agency यानी पहल करने की क्षमता अधिक दिखाई देती है.

दूसरे शब्दों में, भारत अब केवल यह नहीं कहता कि वह भविष्य में बड़ी शक्ति बनेगा. वह अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं, क्षेत्रीय समीकरणों और वैश्विक मुद्दों पर अपनी भूमिका को सक्रिय रूप से परिभाषित करने की कोशिश करता है.

Strategic Autonomy का नया मतलब क्या है?

भारत की विदेश नीति का एक पुराना सिद्धांत रहा है—Strategic Autonomy यानी रणनीतिक स्वायत्तता.

मोदी दौर में इसकी व्याख्या का दायरा बदला है.

इसी वजह से भारत एक साथ अलग-अलग रणनीतिक मंचों पर सक्रिय दिखाई देता है.

एक तरफ भारत Quad में अमेरिका, जापान और ऑस्ट्रेलिया के साथ काम करता है. दूसरी तरफ वह BRICS और Shanghai Cooperation Organisation (SCO) जैसे मंचों पर भी सक्रिय है. विदेश मंत्रालय की आधिकारिक सूची में भारत की Quad, BRICS और SCO सहित विभिन्न बहुपक्षीय संस्थाओं में भागीदारी दर्ज है.

यही नीति Multi-Alignment की ओर संकेत करती है- यानी किसी एक शक्ति-गुट में पूरी तरह शामिल होने के बजाय अलग-अलग देशों के साथ अपने हितों के अनुसार साझेदारी.

अमेरिका के साथ नजदीकी, रूस से रिश्ता भी कायम

मोदी सरकार के दौरान भारत-अमेरिका रणनीतिक संबंधों में लगातार विस्तार हुआ है. लेकिन इसी दौरान भारत ने रूस के साथ अपने पुराने रक्षा और रणनीतिक संबंधों को भी बनाए रखा.

भारत की कोशिश यह रही है कि अमेरिका और पश्चिमी देशों के साथ नई तकनीक, रक्षा, इंडो-पैसिफिक और आर्थिक सहयोग बढ़ाया जाए, जबकि रूस जैसे पुराने साझेदारों के साथ भी रणनीतिक संपर्क बना रहे.

यही वह जगह है जहां Strategic Autonomy और Multi-Alignment एक-दूसरे से जुड़ते हैं.

West Asia में भी एक साथ कई रिश्ते

भारत की विदेश नीति में यही पैटर्न पश्चिम एशिया में भी दिखाई देता है.

इजरायल के साथ भारत के रक्षा, तकनीक और रणनीतिक संबंध मजबूत हुए हैं. साथ ही UAE और सऊदी अरब जैसे अरब देशों के साथ भारत की साझेदारी भी बढ़ी है.

इसके समानांतर भारत ने ईरान के साथ भी अपने संबंधों को पूरी तरह समाप्त नहीं किया.

इसका मतलब यह है कि भारत पश्चिम एशिया में किसी एक धुरी के साथ खड़े होने के बजाय अलग-अलग शक्ति केंद्रों के साथ अपने हितों के आधार पर संबंध बनाए रखने की कोशिश करता है.

Global South की आवाज बनने की कोशिश

मोदी सरकार की विदेश नीति का एक और महत्वपूर्ण पहलू है—Global South.

जनवरी 2023 में भारत ने Voice of Global South Summit की मेजबानी की. इसमें 125 देशों ने भाग लिया. भारत ने विकासशील देशों की प्राथमिकताओं और चिंताओं को वैश्विक मंच पर सामने लाने के लिए इसे एक महत्वपूर्ण मंच के रूप में प्रस्तुत किया.

2023 में भारत की G20 अध्यक्षता के दौरान भी Global South को वैश्विक निर्णय प्रक्रिया में अधिक प्रतिनिधित्व देने पर जोर दिया गया. भारत की अध्यक्षता के दौरान African Union को G20 का स्थायी सदस्य बनाया गया.

इससे भारत की विदेश नीति में एक नया आयाम जुड़ा—भारत सिर्फ अपने लिए नहीं, बल्कि विकासशील देशों की सामूहिक आवाज के प्रतिनिधि के रूप में भी भूमिका तलाश रहा है.

क्या बदला भारत की सुरक्षा नीति में?

विदेश नीति के साथ-साथ राष्ट्रीय सुरक्षा के क्षेत्र में भी एक महत्वपूर्ण बदलाव दिखाई देता है.

भारत की रणनीतिक संस्कृति में लंबे समय से Strategic Restraint का महत्व रहा है. लेकिन 2016 की Surgical Strikes और 2019 के Balakot Air Strike के बाद सीमित सैन्य कार्रवाई के इस्तेमाल को लेकर भारत की नीति में अधिक स्पष्टता दिखाई दी.

2025 में Operation Sindoor ने इस चर्चा को फिर केंद्र में ला दिया.

भारत सरकार के अनुसार, 7 मई 2025 को Operation Sindoor के तहत पाकिस्तान और पाकिस्तान अधिकृत जम्मू-कश्मीर में आतंकवादी ढांचे से जुड़े नौ ठिकानों को निशाना बनाया गया. सरकार ने इसे focused, measured और non-escalatory कार्रवाई बताया था.

बाद के आधिकारिक विवरणों में Operation Sindoor को multi-domain और tri-services response के रूप में भी प्रस्तुत किया गया.

यहां महत्वपूर्ण बात यह है कि इसे भारत की विदेश नीति में सैन्य शक्ति के बढ़ते इस्तेमाल के बजाय व्यापक रणनीतिक साधनों के एक हिस्से के रूप में देखा जा सकता है.

शक्ति का मतलब सिर्फ सेना नहीं

मोदी दौर में भारत की रणनीतिक सोच केवल सैन्य क्षमता तक सीमित नहीं है.

कूटनीति, तकनीक, अर्थव्यवस्था, ऊर्जा, सप्लाई चेन, डिजिटल क्षमता, रक्षा उत्पादन और वैश्विक संस्थाओं में भागीदारी- इन सभी को राष्ट्रीय शक्ति के अलग-अलग उपकरणों के रूप में देखा जा रहा है.

इसीलिए Shaping Power का अर्थ केवल सैन्य रूप से शक्तिशाली भारत नहीं है.

इसका अर्थ है ऐसा भारत जो—

  • वैश्विक संस्थाओं में सुधार की मांग करे,
  • अलग-अलग शक्ति केंद्रों के साथ संबंध बनाए,
  • Global South के मुद्दों को वैश्विक मंच पर उठाए,
  • इंडो-पैसिफिक में सक्रिय भूमिका निभाए,
  • अपनी तकनीकी और रक्षा क्षमता बढ़ाए,
  • और जरूरत पड़ने पर अपनी रणनीतिक प्राथमिकताओं को लागू करने की क्षमता प्रदर्शित करे.

मोदी की विदेश नीति में Continuity भी है, Change भी

Dr Lauren Dagan Amoss के अनुसार मोदी की विदेश नीति को पूरी तरह पुरानी भारतीय विदेश नीति से अलग करके देखना सही नहीं होगा.

Strategic Autonomy, राष्ट्रीय हित, बहुपक्षीयता और स्वतंत्र निर्णय की परंपरा भारत की विदेश नीति में पहले से मौजूद रही है.

बदलाव मुख्यतः Scale, Ambition और Self-Confidence में दिखाई देता है.

यानी मोदी दौर की विदेश नीति को एक पूर्ण बदलाव की बजाय पुरानी रणनीतिक परंपराओं के अधिक सक्रिय और आत्मविश्वासी इस्तेमाल के रूप में देखा जा सकता है.

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