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92 हजार टीकों से मुस्कुराया पशुधन, संवर रही ग्रामीण अर्थव्यवस्था

 

​रायपुर, 20 जुलाई 2026/ पशुधन को खुरपका-मुंहपका, गलघोंटू, और लंगड़ा बुखार जैसी घातक बीमारियों से बचाने के लिए समय पर टीकाकरण सबसे प्रभावी उपाय है। इससे न केवल पशुओं की असमय मृत्यु रुकती है, बल्कि उनका दूध व मांस उत्पादन भी सुरक्षित रहता है। पशु चिकित्सा टीकों का महत्व सुरक्षित और कुशल खाद्य उत्पादन तथा पशुओं और मनुष्यों में उभरती और दुर्लभ बीमारियों के नियंत्रण में निहित है। पशु चिकित्सा टीकों का उपयोग पशुधन और मुर्गीपालन में पशु स्वास्थ्य बनाए रखने और समग्र उत्पादन में सुधार के लिए किया जाता है।

​मानसून की पहली दस्तक के साथ ही बस्तर के वनांचल जिले नारायणपुर में पशुपालकों की धड़कनें तेज हो जाती थीं। बारिश की फुहारों के साथ घड़सरा, एकटंगिया, लंपी स्किन डिजीज और एंटेरोटॉक्सिमिया जैसी जानलेवा संक्रामक बीमारियों का साया मंडराने लगता था। ये बीमारियां न केवल पशुओं का स्वास्थ्य छीनती थीं, बल्कि दूध उत्पादन घटाकर और इलाज का खर्च बढ़ाकर गरीब पशुपालकों की आजीविका पर भी भारी चोट करती थीं। ​लेकिन इस वर्ष मानसून की शुरुआत में ही नारायणपुर जिले ने बीमारी के इस खतरे के खिलाफ एक मजबूत ‘सुरक्षा कवच’ तैयार कर लिया।

​समय पर लिया गया प्रशासनिक संकल्प

​राज्य शासन की मंशा के अनुरूप कलेक्टर के मार्गदर्शन और उपसंचालक के नेतृत्व में पशुधन विकास विभाग ने 1 जुलाई 2026 से जिलेभर में एक वृहद व सघन निःशुल्क टीकाकरण अभियान का आगाज किया। ​विभाग की 10 पशु चिकित्सालय एवं औषधालयों की टीमों ने केवल कस्बों तक सीमित न रहकर दूरस्थ, दुर्गम और वनांचल गांवों का रुख किया। बारिश की परवाह किए बिना मैदान में उतरे अमले ने न केवल चौपालों पर जागरूकता फैलाई, बल्कि ‘डोर-टू-डोर’ पहुंचकर पशुधन को सुरक्षा टीके लगाए।

​ ​ विभाग की इस सक्रियता और मुस्तैदी के परिणामस्वरूप जिले में 92,000 से अधिक टीके सफलतापूर्वक लगाए जा चुके हैं। जिसमें ​घड़सरा रोधक टीके: 51,893,​लंपी स्किन डिजीज टीके 27,679,​एंटेरोटॉक्सिमिया टीके 8,655,​एकटंगिया रोधक टीके 4,650 तथा ​संक्रमण के अन्य खतरों को मात देने के लिए 11,013 पशुओं को कृमिनाशक दवा पिलाई गई और 10,938 पशुओं का किलनीनाशक उपचार किया गया।

​बढ़ता भरोसा, मुस्कुराते पशुपालक

​ स्थानीय पशुपालको का कहना है कि पहले मानसून आते ही चिंता घेर लेती थी कि बीमारी फैली तो इलाज कैसे कराएंगे। अब विभाग की टीम खुद घर तक आकर टीके लगा रही है। हमारे पशु सुरक्षित हैं, दूध का उत्पादन सही है और खेती के काम के लिए बैल भी तंदुरुस्त हैं। ​समय पर मिली इस डॉक्टरी ढाल से दूरस्थ क्षेत्रों के पशुपालकों के चेहरे पर राहत और मन में अटूट भरोसा लौट आया है।

​आजीविका सुरक्षा का सफल मॉडल

​ नारायणपुर का यह सघन अभियान केवल एक विभागीय कार्यक्रम नहीं है, बल्कि यह समयबद्ध रोकथाम, जनजागरूकता और बेहतर प्रशासनिक समन्वय की एक मिसाल बन चुका है। इसने साबित कर दिया है कि यदि समय रहते एहतियाती कदम उठाए जाएं, तो न सिर्फ पशुधन की रक्षा की जा सकती है, बल्कि ग्रामीण अर्थव्यवस्था की रीढ़ को भी मजबूत और सुरक्षित रखा जा सकता है।

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