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कहां ले जाती है अहम् की लड़ाई… केवल बर्बादी, क्यों विफल हुई थी निगम की रेतघाटांे पर कंट्रेल की घोषणा, वरिष्ठ पत्रकार जवाहर नागदेव की खरी.. खरी…

 

क्या मिला दोनों को… ? एक परिवार को मौत दूसरे को जेल…. आजीवन कारावास न्याय हुआ तो। फिर कहां गयी रेत… कहां गया धन…. कहां गया रूतबा…। बचा क्या जीवन में…. ?
पिछले दिनों अवैध रेत के व्यापार के लिये कोरिया में एक परिवार के कुछ लोगों ने दूसरे परिवार के लोगों पर जानलेवा हमला किया। जिसमें रसुखदार भाजपा नेता भरतसिंह, नागेन्द्र सिंह और वीरेन्द्र सिंह की जान ले ली और दो और बुरी तरह घायल हो गये

ये हमला किसलिये हुआ ? ये हमला हुआ रेत के लिये और गाड़ियों से अवैध वसूली के लिये यानि धन के लिये और केवल धन के लिये नहीं, धन के साथ रूतबे के लिये। वर्चस्व के लिये।
*अंततः घूमफिर कर वही पैसा। तो क्या मिला धन, मिला वर्चस्व ? क्या मिला ?*

एक परिवार के प्रमुख लोग, प्रमुख कर्णधार मौत के गाल में समा गये और दूसरे के उपर कानूनी डण्डा मण्डरा रहा है। मामला चूंकि छत्तीसगढ़ के लिये अद्भुत और असामान्य है इसलिये इसे हल्के में नहीं लिया जाएगा।

*भाजपा के पदाधिकारी हलाक*

मृतक भाजपा के समर्थक होने के कारण भी इसका वजन बढ़ जाता है अन्यथा जनता कहेगी अपने ही लोगों की रक्षा नहीं कर पा रहे आम आदमी को कैसे सुरक्षा देंगे।

*इसलिये संभावना तो यही लग रही है कि आरोपियों पर कड़ी कार्यवाही होगी और कदाचित इस नृशंस, सोची-समझी, पूरे होशोहवास में और पूरे प्रदेश को भयभीत कर देने वाली घटना के लिये अपराधियों का उम्र भर की कैद की सजा मिले।*

*ते फिर क्या मिला मारने वालों को ?*

आतंक जरूर कायम हो गया कुछ समय के लिये। लेकिन इस बहादुरी का महत्व तो तब होता न जब वे आजाद होेते। जेल जाने से उन्हें क्या हासिल होगा। ऐसा धन, रूतबा किसके काम आया ? दोनों पक्षों को ये सोचना चाहिये।

*रेत खदानों को कंट्रोल*
*निगम को देने का फैसला*
*क्यों हुआ था रद्द*

एक दिलचस्प जानकारी ये है कि ऐसी ही सभी विसंगतियों से निपटने के लिये सरकार ने सात साल पहले रेत खदानों को चलाने का जिम्मा नगर निगम को सौंपने का मन बना लिया था। ग्राम पंचायत और बड़े सप्लायारों की मिली भगत से रेत का रेट बढ़ जाता था। *इससे बचने के लिये खनिज संचालनालय ने इस काम को निगम को सौंपने का फैसला किया था। मगर न जाने किन कारणों से इस पर अमल नहीं हो पाया।*

*पहले भी हुआ है ऐसा हादसा*

*यदि राजधानी के लोगों को याद हो तो बरसांे पहले रायपुर में दो बस ऑपरेटरों के बीच इसी तरह की वर्चस्व ही लड़ाई हुई थी।* जगदलपुर चलने वाली बसें धन उगलती हैं। दोनों ऑपरेटर इस रूट पर अपना दबदबा चाहते थे। विवाद बढ़ने पर एक पक्ष के एक ही परिवार के लोगों ने दूसरे पक्ष के प्रमुख कर्ताधर्ता को गोली मार कर मार डाला। आरोपी परिवार की सद्दाम टैªवल्स के नाम से शायद 11 बसें चलती थीं। पीड़ित पक्ष रायपुर का जाना-माना प्रतिष्ठित परिवार था।

*इस मामले में भी क्या हासिल हुआ ? एक पक्ष का मुख्य कर्णधार चला गया और दूसरे पक्ष के सात अपराधी जो आपस में निकट के रिश्तेदार थे जेल चले गये। उनकी बसें बताते हैं थानों मंे खड़े-खड़े कण्डम हो गयीं और सारे धन आगमन के रास्ते उस समय बंद हो गये।*

तो फायदा क्या होता है ऐसी वर्चस्व की लड़ाई का। ये कोई सैद्धांतिक लड़ाई नहीं होती। केवल और केवल धन की लड़ाई होती है जो कई जीवन लील जाती है।
*इसमें प्रशासन की ढिलाई को भी नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। यदि प्रशासन दुरूस्त होता तो ऐस काण्ड कभी नहीं होते। पर जहां स्थानीय नेता सरपरस्त हों तो पहले से बिगड़े अधिकारी भला क्यों ईमानदारी से अपने कर्तव्य का पालन करंेगे ?*

जवाहर नागदेव वरिष्ठ पत्रकार , लेखक, चिन्तक, विश्लेषक
मोबा 9522170700

 

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