
Ganesh Chaturthi Special: : 2026 का पावन पर्व 14 सितंबर, सोमवार को मनाया जाएगा. प्रभात खबर की ‘गणेश चतुर्थी स्पेशल’ सीरीज में अब तक आपने भगवान गणेश के जन्म और उनके गजानन बनने की रोचक कथा जानी. इसके बाद हमने जाना कि भगवान गणेश का एक दांत कैसे टूटा और वे ‘एकदंत’ क्यों कहलाए. फिर सीरीज की अगली कड़ी में आपने भगवान गणेश और उनके भाई कार्तिकेय से जुड़ी वह दिलचस्प कथा पढ़ी, जिसमें दोनों भाइयों के बीच संसार की परिक्रमा करने की प्रतियोगिता हुई और गणेश जी ने अपनी बुद्धि से बाजी जीत ली. यह प्रसंग शिव पुराण की रुद्र संहिता के कुमारखंड से जुड़ा बताया जाता है. अब इस सीरीज की अगली कड़ी में जानिए धन के देवता कुबेर और भगवान गणेश से जुड़ी एक ऐसी रोचक कथा, जिसमें कुबेर ने के लिए भव्य भोज का आयोजन किया, लेकिन गणेश जी की भूख शांत होने का नाम नहीं ले रही थी.
हिंदू धर्म की पौराणिक कथाओं में भगवान गणेश को बुद्धि, विवेक और विघ्नहर्ता माना गया है, जबकि कुबेर धन-संपत्ति के देवता और देवताओं के कोषाध्यक्ष माने जाते हैं. गणेश जी और कुबेर से जुड़ी यह कथा धन, दिखावे और अहंकार के बीच का फर्क समझाती है. इसका लोकप्रिय वर्णन शिव पुराण की रुद्र संहिता से जोड़ा जाता है. अलग-अलग परंपराओं में कथा के कुछ प्रसंग और अंत अलग मिलते हैं.
कुबेर को था अपनी दौलत पर घमंड
कथा के अनुसार कुबेर के पास अपार धन और वैभव था. उनकी नगरी अलकापुरी सोने, रत्नों और भव्य महलों से सजी हुई थी. धीरे-धीरे उन्हें अपने धन पर अभिमान होने लगा. उन्होंने सोचा कि ऐसा भव्य भोज रखा जाए, जिससे देवताओं को उनकी संपत्ति और ऐश्वर्य का पता चल सके.
कुबेर भगवान शिव और माता पार्वती को भोज का निमंत्रण देने कैलाश पहुंचे. भगवान शिव ने उनका निमंत्रण स्वीकार नहीं किया और अपने पुत्र गणेश को भेजने की बात कही. साथ ही उन्होंने संकेत दिया कि गणेश जी की भूख साधारण नहीं है. कुबेर को अपने धन पर इतना भरोसा था कि उन्हें लगा कि गणेश जी को भूख शांत करना उनके लिए कोई बड़ी बात नहीं होगी.
गणेश जी ने शुरू किया भव्य भोज
अलकापुरी में भोज की तैयारियां जोर-शोर से हुईं. तरह-तरह के पकवान बनाए गए. गणेश जी पहुंचे और भोजन करना शुरू किया. उन्होंने देखते ही देखते एक के बाद एक सारे पकवान खा लिए.
कुबेर ने और भोजन मंगवाया. लेकिन गणेश जी की भूख शांत नहीं हुई. रसोई में रखा भोजन भी कम पड़ने लगा. कथा के लोकप्रिय संस्करण में बताया जाता है कि गणेश जी की भूख इतनी बढ़ गई कि वे भोजन के साथ बर्तन और महल की दूसरी चीजें भी खाने लगे. कुबेर घबरा गए. जिस धन और वैभव का उन्हें घमंड था, वह गणेश जी की भूख के सामने छोटा पड़ गया.
टूट गया कुबेर का अहंकार
आखिरकार कुबेर को समझ आया कि यह सिर्फ भोजन की बात नहीं है. उन्हें अपने अहंकार का एहसास कराने के लिए ही यह लीला हुई थी. वे भगवान शिव की शरण में पहुंचे और अपनी गलती स्वीकार की.
कथा के अलग-अलग संस्करणों में आगे का प्रसंग थोड़ा अलग मिलता है. कहीं माता पार्वती द्वारा दिए गए थोड़े से चावल या अक्षत का उल्लेख है, तो कहीं साधारण प्रसाद या मोदक का. महत्वपूर्ण बात यह है कि वह छोटा-सा अर्पण सच्ची श्रद्धा और विनम्रता से दिया गया था, इसलिए गणेश जी की भूख शांत हो गई.
ग्रंथों में भक्ति को क्यों दी गई है इतनी अहमियत?
इस कथा की सीख को भगवद्गीता के प्रसिद्ध सिद्धांत से भी समझा जा सकता है. गीता के नौवें अध्याय में भगवान कृष्ण कहते हैं कि भक्त प्रेम और भक्ति से पत्ती, फूल, फल या जल भी अर्पित करे तो वे उसे स्वीकार करते हैं. यानी भगवान के लिए वस्तु की कीमत से ज्यादा भावना और श्रद्धा महत्वपूर्ण है.
इसी भाव को गणेश-कुबेर की कथा भी सामने रखती है. कुबेर के पास अपार धन था, लेकिन शुरुआत में उनके भोज के पीछे दिखावे का भाव था. जब अहंकार टूट गया और विनम्रता आई, तब छोटा-सा प्रसाद ही पर्याप्त हो गया.
कथा की सबसे बड़ी सीख
शिव पुराण की इस लोकप्रिय कथा का संदेश साफ है—धन होना गलत नहीं है, लेकिन धन का अहंकार इंसान को भीतर से कमजोर कर देता है. कुबेर धन के देवता थे, फिर भी उन्हें यह सीखना पड़ा कि सच्ची समृद्धि केवल सोने-चांदी में नहीं, बल्कि विनम्रता, भक्ति और अच्छे भाव में होती है.
यही वजह है कि गणेश जी और कुबेर की यह कथा आज भी सिर्फ पौराणिक प्रसंग नहीं, बल्कि जीवन में अहंकार छोड़कर श्रद्धा और सरलता अपनाने का संदेश देती है.









