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कद्दू कटा, सबमें बंटा-बम खाली लखमा पे फटा, भारत-पाक मैच,मजा नहीं आया,वरिष्ठ पत्रकार जवाहर नागदेव की खरी… खरी….

 

जब कभी पाकिस्तान के साथ मैच होता, देखने का दिल करता। एक कारण ये कि पुरानी खुन्नस है। जीतते हैं तो खुशी दोगुनी हो जाती है। जब हम आतंकवाद मे दादागिरी में उससे नहीं जीत पाते थे तब तो मैच जीतकर ही अपने आत्मसम्मान को बचा लेते थे।

अब हालांकि ऐसा नहीं है क्योंकि भारत पाकिस्तान को हर मोर्चे पे धो रहा है। रगड़-रगड़कर धो रहा है। लगता है पिछले तीन सालों में बहुत से आतंकी पाकिस्तान के अंदर गन शूटर से मारे गये हैं वो कारनामा भारत का ही है।

 

लास्ट बाॅल पे आउट
या लास्ट बाॅल पे छक्का

दूसरा कारण मैच देखने का ये था कि दोनांे टीमे दमदार हुआ करती थीं और नेक टू नेक फाईट हुआ करती थी। कल्पना कीजिये- 70 बाॅल पे 70 रन बनाने हों, फिर 30 बाॅल पे 36 बनानें हों। फिर 5 बाॅल पे 12 बनाने हों। तो कैसा लगता है। सांस उपर की उपर और नीचे की नीचे। लगता था जैसे टेªन छूट जाए चाहे पर ये मैच नहीं छूटना चाहिये।

पर अब ये कारण समाप्त हो गये। आतंक वाद में अब उसकी लंगोट भी हमने उतार दी है। वो बिचारा मारा-मारा फिर रहा है। और मैच में भी उसकी पेन्ट गीली हुई रखी है। कदाचित् पिछले नौ मैच में 8 हमने जीते हैं।
इसीलिये कहा कि मैच देखा, मजा नहीं आया। इकतरफा था।
रोमांच नहीं था, उत्तेजना नहीं थी। उनको पीटने का मजा नहीं था।

लखमा नाम की धूम
क्या बाकी मासूम

माननीय सुप्रीम कोर्ट के आदेश से छत्तीसगढ़ के पूर्व आबकारी मंत्री कवासी लखमा लगभग एक साल के बाद जेल से बाहर आए हैं। आरोप से बरी नहीं हुए हैं,अभी केवल जमानत मिली है।

कानून का ज्ञान नहीं था बोलकर कोई किसी अपराध से बरी होने का हकदार नहीं हो जाता। कोइ राॅंग साईड चल रहा हो और पकड़े जाने पर बोले पता नहीं था कि यहां से जाना मना है तो भी उसके साथ कोई रियायत नहीं होती। कानूनी डण्डा उस पर चलता ही है।

इसलिये अपनी चाल को हमेशा सही रखना चाहिये अन्यथा इंसान धर लिया जाता है। कवासी लखमा का ये कहना नितान्त सत्य है कि उन्हें पढ़ना लिखना नहीं आता। पर इस कारण से प्रदेश में घटित हजारों करोड़ के घोटाले से उन्हें मुक्त नहीं किया जा सकता।

सियासत का लक्ष्य ‘पैसा’

इस मामले में पता नहीं कि हुआ क्या है। पर ये सर्वविदित है कि सियासत का अंतिम लक्ष्य ‘पैसा’ है। धन कमाना है। काला धन। अपवादों की गिनती नहीं होती। व्हाईट मनी किसी को पुसाती नहीं क्यांेकि एक नंबर में कोई कितना पैसा शो कर सकता है ? मामूली सा। बहुत थोड़ा सा। फिर एक नंबर में फालतू की टैक्स देनी पड़ती है। और सियासत मे…. ?

*सियासत मे फोकट में पद पर होने का पैसा मिलता है। केवल साईन करने का पैसा। नाजायज पैसा। किसी और को नाजायज फायदा पहुंचाने के लिये नाजायज कमीशन लेना।*

आदिवासी नेक और मासूम
पर ये बचाव का हथियार नहीं

आदिवासियों की मासूमियत, निष्कपटता उल्लेखनीय है। ऐसे में कोई आदिवासी समुदाय का इंसान इतना बड़ा घोटाला अकेले कर लेगा इस पर यकीन करना मुश्किल है।
कवासी लखमा ने हस्ताक्षर किये, अधिकारियों के कहने पर किये। ये हस्ताक्षर करते समय उन्हें किसी किस्म का लालच नहीं था या ये कहना कि उन्हें उसमें कोई लाभ नहीं हुआ, पचता नहीं। कुछ न कुछ तो दाल में काला अवश्य है।

पर सोचने लायक ये है कि इतने बड़े घोटाले का पूरा ठीकरा पूर्व आबकारी मंत्री कवासी लखमा के सर पर फोड़ा जा रहा है।

अव्वल तो अनपढ़ को ऐसा दायित्व सौंपना ही नहीं चाहिये,लेकिन संविधान में ऐसी कोई व्यवस्था नहीं है। दूसरा आप लोगों ने कई बार सुना होगा कि जब किसी कार्यालय में कोई बाबू रिश्वत लेते पकड़ा जाता है तो कहता है ‘साहब के लिये लेता हूं या उपर तक पहुंचाता हूं।’
सोचिये पांच-दस हजार की रिश्वत भी बिना उपरी सहमति और संरक्षण के लेना नामुमकिन है। ऐसे में हजारों करोड़ रूप्ये की हेराफेरी कोई बिना उपरी मिलीभगत के कैसे संभव है।

हंसे सभी, फंसे लखमा

लखमा को 15 जनवरी 2025 को ईडी ने गिरफ्तार किया था।

सितंबर में माननीय उच्च न्यायालय ने शराब घोटाले में मनी लाॅण्ड्रिग के आरोपी लखमा की जमानत याचिका खारिज कर दी थी।
*उपमुख्यमंत्री अरूण साव ने कहा कि भूपेश बघेल के शासन में अनपढ़ होने के कारण कवासी लखमा की स्थिति का फायदा उठाया गया और सारे गलत दस्तखत उनके ही करवा लिये गये*।

कदाचित उनका कहना सही है। राहुल गांधी को पता न हो ऐसा संभव नहीं। क्या ये चर्चा कि माल उपर तक पहुंचता है सही है ?
*यानि अच्छे समय में हंसे सभी, बुरे समय में फंसे लखमा….*

जवाहर नागदेव, वरिष्ठ पत्रकार, लेखक, चिन्तक, विश्लेषक
मोबा. 9522170700

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