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’मोर गांव मोर पानी महाअभियान’ से भू-जल संवर्धन को मिलेगी नई गति

 
जिले में 587 लूज बोल्डर चेक डैम एवं 37 गैबियन संरचनाओं का हुआ निर्माण
बरसाती पानी का होगा अधिकतम संचयन, भू-जल स्तर बढ़ाने के साथ कृषि और पेयजल व्यवस्था को मिलेगा लाभ

अम्बिकापुर 06 जुलाई 2026/  कलेक्टर श्री अजीत बसंत के निर्देशन तथा जिला पंचायत सीईओ श्री विनय कुमार अग्रवाल के मार्गदर्शन में जिले में वर्षा जल संरक्षण एवं भू-जल संवर्धन को बढ़ावा देने के उद्देश्य से मनरेगा अंतर्गत ’मोर गांव मोर पानी महाअभियान’ का प्रभावी क्रियान्वयन किया जा रहा है। अभियान के तहत बारिश के पानी को गांवों में ही रोककर अधिक से अधिक जल का भू-जल में पुनर्भरण सुनिश्चित करने के लिए व्यापक स्तर पर लूज बोल्डर चेक डैम एवं गैबियन संरचनाओं का निर्माण कराया जा रहा है।

अभियान के अंतर्गत जिले के सभी सात विकासखंडों में जल संरक्षण कार्यों को प्राथमिकता दी गई है। विकासखंड अम्बिकापुर में 122, लुण्ड्रा में 107, सीतापुर में 16, बतौली में 34, मैनपाट में 136, उदयपुर में 46 तथा लखनपुर में 126 लूज बोल्डर चेक डैम स्वीकृत किए गए हैं। इस प्रकार जिले में कुल 587 लूज बोल्डर चेक डैम तथा 37 गैबियन संरचनाओं के निर्माण की स्वीकृति प्रदान की गई है। वर्तमान में अधिकांश संरचनाओं का निर्माण पूर्ण हो चुका है, जबकि शेष कार्य अंतिम चरण में हैं। मानसून से पूर्व अधिकतम संरचनाओं को तैयार कर लिया गया है, जिससे इस वर्ष वर्षा जल का अधिकतम संचयन सुनिश्चित किया जा सके।

नालों में निर्मित की जा रही ये संरचनाएं वर्षा जल के बहाव की गति को नियंत्रित कर पानी को कुछ समय तक रोककर रखती हैं। इससे पानी धीरे-धीरे जमीन में रिसता है और भू-जल स्तर में वृद्धि होती है। साथ ही बरसात का पानी गांव से बाहर बहने के बजाय स्थानीय जल स्रोतों को पुनर्भरित करता है, जिससे कुएं, हैंडपंप एवं बोरवेल में जल उपलब्धता लंबे समय तक बनी रहती है। पहाड़ी एवं ढलान वाले क्षेत्रों में इन संरचनाओं से मिट्टी के कटाव पर भी प्रभावी नियंत्रण होता है।

गैबियन संरचनाएं तेज बहाव वाले नालों के लिए अधिक प्रभावी

गैबियन संरचनाएं लोहे की जाली में भरे पत्थरों से तैयार की जाती हैं, जो तेज जल प्रवाह वाले नालों में भी मजबूती से टिके रहती हैं। सामान्य लूज बोल्डर चेक डैम की तुलना में गैबियन संरचनाएं अधिक टिकाऊ होती हैं तथा तेज बहाव के दौरान भी अपनी जगह से नहीं हटतीं। भूमि में हल्का धंसाव होने पर भी इनमें दरार नहीं आती, बल्कि यह जमीन के अनुरूप स्वयं को समायोजित कर लेती हैं, जिससे इनकी आयु अधिक होती है।

इन संरचनाओं के बीच बने रिक्त स्थानों में वर्षा का पानी दो से तीन दिनों तक ठहरता है, जिससे पानी का अधिकतम भाग जमीन में समाहित हो जाता है। परिणामस्वरूप आसपास के क्षेत्रों में भू-जल स्तर तेजी से बढ़ता है और पेयजल स्रोतों को नया जीवन मिलता है। साथ ही नालों के किनारों एवं तलहटी का कटाव भी रुकता है, जिससे खेतों की उपजाऊ मिट्टी सुरक्षित रहती है।

कम लागत में टिकाऊ समाधान, मिल रहा रोजगार
लूज बोल्डर चेक डैम एवं गैबियन संरचनाएं स्थानीय स्तर पर उपलब्ध पत्थरों एवं सीमित संसाधनों से निर्मित की जाती हैं। इनमें सीमेंट एवं रेत का उपयोग नगण्य होता है, जिससे निर्माण लागत कम आती है। निर्माण कार्य पूरी तरह मनरेगा के माध्यम से कराया जा रहा है, जिससे ग्रामीण मजदूरों को स्थानीय स्तर पर रोजगार भी उपलब्ध हो रहा है। एक बार निर्माण होने के बाद इन संरचनाओं का रखरखाव भी अत्यंत कम होता है तथा ये वर्षों तक जल संरक्षण का प्रभावी माध्यम बनी रहती हैं।

जल संरक्षण के साथ कृषि को मिलेगा संबल
इन संरचनाओं के निर्माण से भू-जल स्तर में वृद्धि होने के साथ-साथ खरीफ के अलावा रबी एवं ग्रीष्मकालीन फसलों के लिए भी अतिरिक्त सिंचाई जल उपलब्ध होगा। गर्मी के मौसम में सूखने वाले कुएं एवं हैंडपंपों में जल उपलब्धता बनी रहेगी, जिससे ग्रामीणों को पेयजल संकट से राहत मिलेगी। कृषि उत्पादन में वृद्धि, जल संरक्षण और पर्यावरण संतुलन की दिशा में यह अभियान जिले के लिए एक महत्वपूर्ण पहल साबित हो रहा है।

जिला प्रशासन ने नागरिकों एवं किसानों से वर्षा जल संरक्षण के इस जनअभियान में सहभागिता निभाने तथा जल स्रोतों के संरक्षण के प्रति जागरूक रहने की अपील की है, ताकि आने वाली पीढ़ियों के लिए जल संसाधनों को सुरक्षित रखा जा सके।

 

 

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