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AI ने बदल दिया बिहार के नेताओं का लुक, 80s के अंदाज में दिखे सम्राट, नीतीश, लालू, तेजस्वी और PK

12 सितंबर 2026 को नई दिल्ली में 18वें BRICS शिखर सम्मेलन की शुरुआत ऐसे समय हो रही है, जब दुनिया की राजनीति तेजी से बदल रही है. पश्चिम एशिया में युद्ध, अमेरिका-चीन प्रतिद्वंद्विता, वैश्विक व्यापार में अस्थिरता और विकासशील देशों की बढ़ती वित्तीय जरूरतों के बीच BRICS का विस्तार भी हो चुका है.

ऐसे में भारत के सामने सवाल सिर्फ यह नहीं है कि सम्मेलन कितना सफल रहता है, बल्कि यह है कि क्या भारत BRICS को एक प्रभावशाली राजनीतिक मंच से आगे ले जाकर व्यावहारिक सहयोग का संस्थान बना सकता है?

Xi-Putin एक मंच पर, भारत के लिए बड़ा कूटनीतिक क्षण

इस सम्मेलन का सबसे बड़ा आकर्षण शी जिनपिंग और व्लादिमीर पुतिन की मौजूदगी है.

जिनपिंग करीब सात वर्षों बाद भारत की यात्रा कर रहे हैं.

पुतिन भी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ एक ही मंच पर होंगे.

12 सितंबर 2026 को नई दिल्ली में 18वें BRICS शिखर सम्मेलन की शुरुआत ऐसे समय हो रही है, जब दुनिया की राजनीति तेजी से बदल रही है. पश्चिम एशिया में युद्ध, अमेरिका-चीन प्रतिद्वंद्विता, वैश्विक व्यापार में अस्थिरता और विकासशील देशों की बढ़ती वित्तीय जरूरतों के बीच BRICS का विस्तार भी हो चुका है.

ऐसे में भारत के सामने सवाल सिर्फ यह नहीं है कि सम्मेलन कितना सफल रहता है, बल्कि यह है कि क्या भारत BRICS को एक प्रभावशाली राजनीतिक मंच से आगे ले जाकर व्यावहारिक सहयोग का संस्थान बना सकता है?

Xi-Putin एक मंच पर, भारत के लिए बड़ा कूटनीतिक क्षण

इस सम्मेलन का सबसे बड़ा आकर्षण शी जिनपिंग और व्लादिमीर पुतिन की मौजूदगी है.

जिनपिंग करीब सात वर्षों बाद भारत की यात्रा कर रहे हैं.

पुतिन भी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ एक ही मंच पर होंगे.

China के साथ व्यापार: अवसर भी, चुनौती भी

BRICS भारत के लिए आर्थिक अवसर लेकर आया है, लेकिन इसके साथ एक विरोधाभास भी है. समूह के साथ भारत का व्यापार तेजी से बढ़ा है, लेकिन व्यापार घाटा भी बढ़ा है. इसका सबसे बड़ा पहलू चीन के साथ आर्थिक संबंधों में दिखाई देता है.

इस अर्थ में BRICS भारत के लिए सिर्फ अवसर नहीं, बल्कि आर्थिक निर्भरता का आईना भी है.

क्या BRICS डॉलर को चुनौती देगा?

BRICS की चर्चा अक्सर एक साझा मुद्रा या डॉलर के विकल्प के रूप में की जाती है. लेकिन दोनों को एक ही चीज मानना ठीक नहीं होगा.

साझा BRICS currency और स्थानीय मुद्राओं में व्यापार, या डिजिटल भुगतान प्रणालियों को आपस में जोड़ने की कोशिशें अलग-अलग अवधारणाएं हैं. भारत के लिए फिलहाल अधिक व्यावहारिक लक्ष्य ऐसी भुगतान व्यवस्था विकसित करना हो सकता है, जो सीमा-पार लेनदेन को आसान बनाए और डॉलर पर अत्यधिक निर्भरता को कुछ हद तक कम करे.

लेकिन इसका अर्थ डॉलर को अचानक खत्म करना नहीं है.

भारत की अपनी ताकत क्या है?

भारत BRICS में केवल एक सदस्य नहीं, बल्कि अपनी कुछ विशिष्ट क्षमताओं के साथ मौजूद है. Digital Public Infrastructure, तेज डिजिटल भुगतान और बड़े पैमाने पर डिजिटल सेवाओं का भारतीय अनुभव विकासशील देशों के लिए उपयोगी मॉडल बन सकता है.

भारत न्यू डेवलपमेंट बैंक और स्थानीय मुद्रा में विकास वित्त जैसे मुद्दों को भी आगे बढ़ा सकता है. खासकर जलवायु परिवर्तन और बुनियादी ढांचे के लिए सस्ती पूंजी उपलब्ध कराना Global South के लिए महत्वपूर्ण है.

असली परीक्षा सम्मेलन के बाद होगी

भारत की BRICS अध्यक्षता की सफलता का आकलन केवल शिखर सम्मेलन में जारी घोषणापत्र से नहीं किया जाना चाहिए. असली सवाल यह होगा कि सम्मेलन के बाद क्या ठोस संस्थागत व्यवस्था आगे बढ़ती है.

क्या विकास वित्त में वास्तविक लाभ मिलता है? क्या भुगतान और तकनीकी सहयोग जमीन पर उतरता है? क्या सदस्य देशों के बीच मतभेदों के बावजूद सहयोग की निरंतरता बनी रहती है?

BRICS में भारत की बड़ी परीक्षा यही है, क्या वह अलग-अलग हितों वाले देशों के इस बड़े समूह को केवल एक मंच बनाए रखेगा या उसे परिणाम देने वाली साझेदारी में बदल पाएगा?

नई दिल्ली में Xi और Putin की मौजूदगी भारत की कूटनीतिक क्षमता का प्रदर्शन जरूर होगी. लेकिन भारत की वास्तविक सफलता तब मानी जाएगी, जब इस मंच से निकली बातें आने वाले वर्षों में ठोस परिणामों में दिखाई दें.

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