
Sathyaraj Birthday Special: यह कहानी सिर्फ सिनेमा के एक किरदार की नहीं है. यह कहानी उस जुनून की है, जब इंसान ठान ले तो अपनी बंद किस्मत का ताला भी खुद ही खोल देता है. जब भी भारतीय सिनेमा के सबसे यादगार और बड़े किरदारों की बात होती है, तो ‘बाहुबली’ के वफादार योद्धा कटप्पा का नाम सबसे पहले दिमाग में आता है.
हाथ में चमचमाती तलवार, चेहरे पर गंभीरता और बाहुबली के प्रति वफादारी, इस किरदार को पर्दे पर यादगार बनाने वाले बेहतरीन एक्टर सत्यराज का आज यानी 3 अक्टूबर को जन्मदिन है.
लेकिन जिस एक्टर को आज पूरा देश कटप्पा के नाम से जानता है, उनके इस बड़े मुकाम के पीछे एक ऐसा दौर भी छुपा है जब घर में खाने के लाले पड़े थे और मां रोते-रोते फिल्मों में न जाने की भीख मांगती थी.
मां चाहती थी नौकरी, पर बेटे के सिर पर था सिनेमा का भूत
कहानी शुरू होती है 3 अक्टूबर 1954 से, जब तमिलनाडु के कोयंबटूर में रंगाराज सुब्बैया का जन्म हुआ. यही रंगाराज आगे चलकर सत्यराज के नाम से मशहूर हुए. बचपन से ही उन्हें फिल्मों का काफी शौक था. वह उस दौर के बड़े एक्टर्स एमजीआर और शिवाजी गणेशन की नकल किया करते थे.
लेकिन घर का माहौल सख्त था. मां बिल्कुल नहीं चाहती थी कि उनका बेटा फिल्मों की चकाचौंध में बर्बाद हो. मां की एक ही जिद थी- बेटा कोई सीधी-सादी पक्की नौकरी करे और शांति से जिंदगी बिताए. अब सवाल यह था कि क्या रंगाराज मां की बात मानेंगे या अपने दिल की सुनेंगे?
नहीं मिली नौकरी तो बेचनी पड़ी जमीन
मां और घर वालों के कहने पर रंगाराज ने कॉलेज में एडमिशन तो ले लिया. विषय मिला- बॉटनी यानी पेड़-पौधों का विज्ञान. रंगाराज ने दिन-रात एक करके B.Sc. की डिग्री तो हासिल कर ली, लेकिन असली झटका तब लगा जब डिग्री हाथ में होने के बावजूद उन्हें दर-दर भटकने पर भी एक नौकरी तक नहीं मिली.
उधर किस्मत ने ऐसा पासा पलटा कि परिवार को खेती में भारी नुकसान हुआ और नौबत यहाँ तक आ गई कि अपनी जमीन तक बेचनी पड़ गई. हाथ खाली थे, दिमाग में टेंशन थी और घर में तंगी छाने लगी. इसी सोच के बीच रंगाराज ने एक ऐसा फैसला लिया, जिसने उनकी पूरी जिंदगी बदल दी.
‘तू भूखा मर जाएगा’, मां ने दी थी वॉर्निंग
जब नौकरी के सारे रास्ते बंद हो गए, तो रंगाराज ने हिम्मत जुटाकर मां से कह दिया कि वह चेन्नई जा रहे हैं और फिल्मों में काम करेंगे. मां बहुत डर गई. आंखों में आंसू भरकर बोलीं- ‘वहां तेरा कोई नहीं है बेटा, तू भूखा मर जाएगा’
लेकिन रंगाराज के सिर पर तो अपनी तकदीर बदलने की धुन सवार थी. साल 1976 में मां के आंसुओं को दिल में समेटकर वह चेन्नई के कोडंबक्कम पहुंच गए. दिलचस्प बात यह थी कि उन्हें सिर्फ हीरो बनने का घमंड नहीं था. उन्होंने मन में सोच लिया था कि कैमरे के पीछे छोटा-मोटा काम भी मिले, तो वह पीछे नहीं हटेंगे. पर क्या चेन्नई की सड़कों ने उनका आसानी से स्वागत किया? बिल्कुल नहीं
आसान नहीं था रास्ता, 75 फिल्मों में बने विलेन
चेन्नई पहुंचकर हफ्तों तक स्टूडियो के चक्कर काटे और धक्के खाए. शुरुआत में उन्होंने थिएटर में काम किया और सेट पर छोटे-मोटे काम संभाले.
- पहला रोल (1978): फिल्म ‘सट्टम एन कयिल’ में उन्हें पहला मौका मिला, पर हीरो बनकर नहीं. वह मुख्य विलेन के पीछे खड़े रहने वाले चंद गुंडों में से एक थे.
- कमल हासन की फिल्म: इसी दौरान 1978 में कमल हासन की फिल्म ‘एनाक्कुल ओरुवन’ में भी उन्हें एक छोटा सा रोल मिला.
- इसी दौर में उन्होंने अपना नाम बदलकर ‘सत्यराज’ रख लिया.लेकिन असली संघर्ष तो अभी बाकी था. 1978 से 1985 के बीच सत्यराज ने करीब 75 फिल्मों में काम किया और लगभग हर फिल्म में उन्हें खौफनाक विलेन बनाकर पर्दे पर लाया गया. लोग उन्हें पर्दे पर देखते ही गालियां देते थे. पर सवाल यह था कि क्या वह जिंदगी भर सिर्फ गुंडों की मार ही खाते रहेंगे?
‘वेदम पुदिधु’ से बदली पहचान, फिर बने साउथ के नंबर-1 हीरो
सत्यराज जानते थे कि सोने को निखरने के लिए आग में तपना ही पड़ता है. 1980 के दशक के आखिर में फिल्म ‘वेदम पुदिधु’ आई और लोगों की आँखें फटी रह गईं. जिस सत्यराज को लोग सिर्फ मारधाड़ करते देखते थे, उसकी संजीदा एक्टिंग देखकर हर कोई हैरान रह गया. इसके बाद 1990 के दशक में वह तमिल सिनेमा के सबसे बड़े लीड हीरो बनकर उभरे:
‘अमैधि पदई’ में सत्यराज ने पिता और बेटे का डबल रोल निभाया था. खास बात यह है कि वह शुरुआत में इस फिल्म को करने को लेकर हिचक रहे थे, क्योंकि पिता का किरदार नेगेटिव था. इसके बावजूद उन्होंने यह रोल किया और फिल्म उनके करियर की यादगार फिल्मों में शामिल हो गई. इसके बाद ‘नडिगन’ और ‘वाल्टर वेत्रीवेल’ जैसी फिल्मों ने भी उनकी पहचान को और मजबूत किया.
1995 में खुद बने डायरेक्टर, एक ही फिल्म में निभाए 3-3 रोल
सत्यराज की कहानी की सबसे अनोखी बात यह है कि उन्होंने खुद को सिर्फ एक्टिंग तक सीमित नहीं रखा. 1995 में उन्होंने ‘विल्लादी विलेन’ नाम की एक फिल्म डायरेक्ट की.
पर असली सस्पेंस यह था कि इस फिल्म में उन्होंने खुद ही 3 अलग-अलग किरदार निभाए, एक चालाक वकील, एक रोड रोलर ड्राइवर और एक अलग लुक वाला कैरेक्टर. फिल्म ऑल-टाइम ब्लॉकबस्टर साबित हुई. लेकिन करियर की इस ऊंचाई के बाद भी उनके जीवन का सबसे बड़ा धमाका होना अभी बाकी था.
60 की उम्र में लिया वो एक फैसला, जिसने पूरे देश को चौंका दिया
उम्र 60 के पार पहुँच चुकी थी. लोग इस उम्र में रिटायरमेंट की सोचने लगते हैं, लेकिन तभी एंट्री हुई महान डायरेक्टर एस.एस. राजामौली की. 2015 में राजामौली ने जब ‘बाहुबली: द बिगनिंग’ के लिए सत्यराज को चुना, तो किसी को अंदाजा नहीं था कि आगे क्या होने वाला है. सत्यराज ने ‘कटप्पा’ का किरदार बहुत शानदार तरीके से निभाया. और जब फिल्म के आखिरी सीन में उन्होंने बाहुबली की पीठ में तलवार घोंपी, तो पूरा देश सन्न रह गया. 2 सालों तक हिंदुस्तान के कोने-कोने में सिर्फ एक ही सवाल गूंजता रहा:
- 2017 में ‘बाहुबली 2’ आई और इस एक रोल ने 60 साल के सत्यराज को पूरे भारत का सबसे बड़ा पैन-इंडिया स्टार बना दिया.
मजेदार राज: परिवार से भी छुपाकर रखा बाहुबली का सबसे बड़ा सस्पेंस
‘कटप्पा ने बाहुबली को क्यों मारा?’ का राज सिर्फ आम जनता से ही नहीं छुपाया गया था.
सत्यराज ने मार्च 2017 के बाहुबली 2 प्री-रिलीज इवेंट में खुद खुलासा किया था कि उन्होंने अपने घर वालों तक को फिल्म का सच नहीं बताया था. जब भी घर वाले रात को खाने की टेबल पर उनसे पूछते, तो वह हंसकर कह देते- “राजामौली ने सच छुपाने के अलग से पैसे दिए हैं, इसलिए चुपचाप खाना खाओ”
शाहरुख खान के फैन बनकर की ‘चेन्नई एक्सप्रेस’
सत्यराज की हिंदी फिल्मों से जुड़ी एक और बड़ी दिलचस्प कहानी है. जब रोहित शेट्टी ने उन्हें ‘चेन्नई एक्सप्रेस’ ऑफर की, तो कहानी सुनने के बाद सत्यराज को लगा कि उनका रोल बहुत बड़ा नहीं है. उन्होंने यह बात रोहित शेट्टी और शाहरुख खान को बताई भी.
लेकिन फिर भी उन्होंने फिल्म की, जानते हैं क्यों? क्योंकि वह शाहरुख खान की एक्टिंग के बहुत बड़े फैन थे और उनके साथ स्क्रीन शेयर करना चाहते थे. 2013 में आई इस फिल्म में उन्होंने दीपिका पादुकोण के सख्त पिता का रोल निभाकर हिंदी दर्शकों का दिल भी जीत लिया.









