
Ram Hanuman Meeting: मंगलवार को हनुमान जी की पूजा के साथ-साथ उनसे जुड़ी कहानी को सुनने और जानने का खास महत्व है. जब भक्त हनुमान जी से जुड़ी कथा-कहानी को पढ़ते, सुनते और सुनाते हैं तो उनकी भक्ति होती है. क्या आप जानते हैं कि हनुमान जी ने प्रभु श्रीराम को पहली नजर में कैसे पहचान लिया था? आइए, रामचरितमानस से जानते हैं.
जब सीता जी की खोज में ऋष्यमूक पर्वत पहुंचे श्रीराम-लक्ष्मण
रामचरितमानस के किष्किंधाकांड में हनुमान जी और प्रभु श्रीराम के मिलन की कथा है. कथा के अनुसार, वनवास के दौरान माता सीता को खोजने के लिए निकले. इस दौरान वे ऋष्यमूक पर्वत के करीब पहुंच. उस वक्त सुग्रीव (वानर में राजा) अपने कुछ साथियों के साथ इसी पर्वत पर रह रहे थे. तब सुग्रीव की नजर दो लोगों पर पड़ी, जो हाथ में धनुष (तीर चलाने वाला) थे. उन्हें देखकर वे चिंतित हो गए. सुग्रीव को लगा कि कहीं दोनों युवक उनके भाई बाली की तरफ से भेजे गए लोग तो नहीं हैं. इसके बाद उन्होंने हनुमान जी से दोनों युवकों के बारे में पता लगाने के लिए कहा.
ब्राह्मण का रूप बनाकर पहुंचे हनुमान
सुग्रीव जी के कहने पर हनुमान जी ने ब्राह्मण का रूप बनाकर श्रीराम और लक्ष्मण जी के पास पहुंचे. उन्होंने दोनों भाइयों (राम-लक्ष्मण) से पहले परिचय पूछा और फिर जंगल में आने की वजह जानने की कोशिश की. हनुमान जी ने आदर के साथ दोनों भाइयों से बातचीत की जिससे श्रीराम बहुत प्रभावित और खुश हुए.
हनुमान जी से कैसे प्रभावित हुए श्रीराम
रामचरितमानस के अनुसार, श्रीराम हनुमान जी की वाणी और स्वभाव का उल्लेख करते हुए लक्ष्मण जी से कहते हैं कि जिसने ऋग्वेद, यजुर्वेद और सामवेद का अध्ययन नहीं किया हो, वह इस तरह की सुंदर और व्यवस्थित वाणी नहीं बोल सकता. श्रीराम, हनुमान जी की बात और स्वभाव से प्रभावित होते हैं.
बातचीत में खुला हनुमान जी का परिचय
बातचीत आगे बढ़ी तो हनुमान जी ने श्रीराम को अपने बारे में बताया. उन्होंने कहा कि वे सुग्रीव के मंत्री हैं और सुग्रीव इस समय अपने भाई वाली की डर से ऋष्यमूक पर्वत पर रह रहे हैं.
इसके बाद श्रीराम ने भी अपना परिचय दिया और बताया कि वे अयोध्या के राजा दशरथ के पुत्र राम हैं. उनके साथ उनका छोटे भाई लक्ष्मण है. वे अपनी पत्नी सीता की खोज करते हुए जंगल में आए हैं. श्रीराम की यह सुनकर हनुमान जी का मन उनके के लिए भक्ति और प्यार से भर गया. इसके बाद हनुमान जी ने दोनों भाइयों को सुग्रीव के पास ले जाने का विचार किया.
यहीं से शुरू हुआ श्रीराम और हनुमान जी का अद्भुत संबंध
हनुमान जी ने अपना ब्राह्मण रूप को छोड़कर वास्तविक स्वरूप में आ गए. इसके बाद श्रीराम-लक्ष्मण को अपने कंधों पर बैठाकर सुग्रीव के पास ले गए. जहां श्रीराम और सुग्रीव की दोस्ती हुई. प्रभु श्रीराम से हनुमान जी की इसी मुलाकात की घटना का जिक्र रामचरितमानस में की गई है. इस घटना के बाद से ही हनुमान जी ने प्रभु श्रीराम के काम को अपना धर्म बना लिया और उनके कामों के लिए हमेशा तैयार रहे.
हनुमान-राम मिलन प्रसंग में रामचरितमानस की चौपाइंयां
आगें चले बहुरि रघुराया
रिष्यमूक पर्बत निअराया
तहं रह सचिव सहित सुग्रीवा
आवत देखि अतुल बल सींवा
अति सभीत कह सुनु हनुमाना
पुरुष जुगल बल रूप निधाना
धरि बटु रूप देखु तैं जाई
कहेसु जानि जियं सयन बुझाई
को तुम्ह स्यामल गौर सरीरा
छत्री रूप फिरहु बन बीरा
कठिन भूमि कोमल पद गामी
कवन हेतु बिचरहु बन स्वामी
सुनु कपि जियं मानसि जनि ऊना
तैं मम प्रिय लछिमन ते दूना
समदरसी मोहि कह सब कोऊ
सेवक प्रिय अनन्यगति सोऊ
इस प्रसंग से क्या सीखें?
रामचरितमानस का यह प्रसंग सिर्फ श्रीराम और हनुमान जी की पहली मुलाकात नहीं है, बल्कि इसमें हनुमान जी की बुद्धिमत्ता, विनम्रता, वाणी की मधुरता और प्रभु श्रीराम के प्रति उनकी भक्ति की पहली झलक मिलती है. हनुमान जी ने अपनी समझदारी और संवाद के तरीके से श्रीराम का मन जीत लिया.
इस प्रसंग से मनुष्य को सीख मिलती है कि बुद्धि के साथ विनम्रता, मधुर वाणी और सही समय पर सही बात कहना जीवन में बहुत महत्वपूर्ण है. साथ ही, हनुमान जी का श्रीराम के प्रति समर्पण हमें अपने कर्तव्य के प्रति निष्ठावान और समर्पित रहने की प्रेरणा देता है.









