
भारतीय राजनीति में एक पुरानी बहस को फिर तेज कर दिया है. सवाल सिर्फ इतना नहीं कि मोदी सरकार को बदलने की मांग की जा सकती है या नहीं. बड़ा सवाल यह है कि लोकतंत्र में सरकार बदलने की इच्छा को कब सामान्य राजनीतिक असहमति और कब देश को अस्थिर करने की कथित साजिश के रूप में पेश किया जाता है?
इस राजनीतिक टकराव के बीच सोशल मीडिया पर भी एक शब्द अपनी मूल परिभाषा से आगे बढ़कर राजनीतिक पहचान का प्रतीक बन रहा है, ‘रिजीम चेंज’.
अब यह समझना जरूरी है कि इसका वास्तविक अर्थ क्या है, इसे लेकर विवाद क्यों है और किसी शब्द को बार-बार षड्यंत्र से जोड़कर पेश करने का आम लोगों की राजनीतिक समझ पर क्या असर पड़ता है.
भाजपा को आपत्ति क्यों है?
15 अक्टूबर 2026 को दिल्ली में मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार और मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) को लेकर चल रहे विरोध प्रदर्शनों के बीच प्रशांत भूषण ने कहा कि आंदोलन अब ‘रिजीम चेंज’ की लड़ाई बन चुका है. उन्होंने दलील दी कि लोकतंत्र में सरकार बदलने की मांग करना अपने-आप में अपराध नहीं है.
भाजपा ने इसे विपक्ष की मंशा का खुलासा बताते हुए आरोप लगाया कि आंदोलन का उद्देश्य केवल चुनावी सुधार नहीं, बल्कि चुनी हुई सरकार को सत्ता से हटाना है.






