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हिंदू हित की बात करना कट्टरपंथ और मुसलमानों की पैरवी सेक्युलरिज्म क्यों?

भारतीय समाज में इन दिनों धर्म का बोलबाला है. चारों ओर धार्मिक वातावरण नजर आता है. कोई भगवान शिव की उपासना कर रहा है, तो कोई पांचों वक्त नमाज पढ़ रहा है. कोई रोज चर्च जाकर प्रेयर कर रहा है, तो कोई गुरुद्वारे में सेवा कर रहा है. चंदन-टीका, कुफी टोपी और रोजरी की खूब बिक्री हो रही है. ऐसा नहीं है कि इससे पहले यह सबकुछ नहीं हो रहा था, लेकिन आजकल इसकी फ्रीक्वेंसी बढ़ गई है. धर्म के साथ-साथ जो धार्मिक कट्टरता बढ़ रही है, उसकी वजह से समाज में कई तरह के सवाल भी खड़े हो रहे हैं? कुछ प्रमुख सवालों पर जिस तरह की चर्चा की जा रही है, वो हमारे डिनर टेबल तक आ पहुंचे हैं-

इन दो सवालों का जवाब तलाशने के लिए हमें पहले यह समझना होगा कि धर्म क्या है?

भारतीय संस्कृति में धर्म का अर्थ था- वो जो धारण करने योग्य हो. इसमें व्यक्ति के पूजा-पाठ और उसके आचार-व्यवहार सभी शामिल थे. धर्म व्यक्ति को एकसूत्र में बांधने का जरिया भी है. इसकी वजह यह है कि जब धर्म का जन्म हुआ, तो उसके पीछे सुरक्षा और भय की भावना शामिल थी. आज के दौर में देखें तो धर्म जीवन जीने का एक तरीका है, जो लोगों को एकसूत्र में बांधता है. समाजशास्त्र धर्म को केवल व्यक्ति की निजी आस्था तक सीमित करके नहीं देखता. धर्म सामाजिक जीवन, सामूहिक विश्वासों, परंपराओं और समुदाय के निर्माण से भी जुड़ा है. फ्रांसीसी समाजशास्त्री एमिल दुर्खीम ने अपनी पुस्तक The Elementary Forms of Religious Life में धर्म को सामूहिक जीवन और सामाजिक एकता से जोड़कर समझाया है. उनके अनुसार धार्मिक विश्वास और अनुष्ठान लोगों को एक साझा समुदाय से जोड़ते हैं. जब लोग एक जैसे प्रतीकों, परंपराओं और धार्मिक आयोजनों में भाग लेते हैं, तो उनके बीच सामूहिकता का भाव मजबूत होता है.

धर्म को लेकर क्यों समाज में बढ़ा है विवाद?

भारत जैसे बहुधार्मिक और बहुसांस्कृतिक देश में धार्मिक पहचान का सवाल अक्सर राजनीतिक और सामाजिक बहस का हिस्सा बन रहा है. कोई व्यक्ति अपने धर्म, परंपराओं और सांस्कृतिक विरासत पर गर्व करता है, तो इसे उसकी धार्मिक स्वतंत्रता और निजी पहचान का हिस्सा माना जा सकता है. कोई समुदाय अपने धार्मिक स्थलों, शैक्षणिक संस्थानों, भाषा या सांस्कृतिक अधिकारों की सुरक्षा की मांग करता है, तो यह भी लोकतांत्रिक व्यवस्था में जायज है. लेकिन कई बार ऐसी मांगों को धार्मिक कट्टरपंथ या सांप्रदायिकता के चश्मे से देखा जाने लगता है.

धार्मिक पहचान कब बनती है राजनीतिक मुद्दा?

धार्मिक पहचान जब सार्वजनिक जीवन और राजनीति का हिस्सा बनती है, तो उसके अर्थ और प्रभाव बदल सकते हैं. कोई समुदाय अपने धार्मिक स्थल की सुरक्षा, धार्मिक शिक्षा, परंपराओं के पालन या सांस्कृतिक अधिकारों की मांग करता है, तो यह उसकी सामूहिक आवाज हो सकती है. लेकिन राजनीतिक दल और संगठन भी धार्मिक पहचान को समर्थन जुटाने, लोगों को लामबंद करने और अपने राजनीतिक हितों को पूरा करने के लिए जब इसका इस्तेमाल करते हैं तो यह राजनीतिक मुद्दा बन जाता है.

मार्क्स के इस दृष्टिकोण को समझें, तो हमें यह स्पष्ट हो सकता है कि कट्टरपंथ की शुरुआत कहां से होती है. हालांकि धार्मिक पहचान का राजनीतिक होना अपने आप में कट्टरपंथ का प्रमाण नहीं है. लोकतंत्र में धार्मिक समुदायों को अपनी समस्याएं उठाने और नीतियों पर अपनी राय रखने का अधिकार है. परेशानी तब होती है जब उस राजनीतिक मांग का उद्देश्य दूसरों को कमतर आंकना और नीचा दिखाना होता है.यहां गौर करने वाली बात यह है कि क्या कोई समुदाय अपने समुदाय के लिए समान अधिकार मांग रही है या दूसरे समुदायों के अधिकार सीमित करना चाहती है? क्या वह लोकतांत्रिक संवाद का रास्ता अपना रही है या धमकी, हिंसा और नफरत को बढ़ावा दे रही है?

संविधान धार्मिक स्वतंत्रता और समानता दोनों की बात करता है

भारतीय संविधान इस बहस को समझने के लिए एक महत्वपूर्ण आधार देता है. संविधान के अनुच्छेद 25 के तहत सभी व्यक्तियों को अंतःकरण की स्वतंत्रता तथा धर्म को मानने, उसका पालन करने और उसका प्रचार करने का अधिकार है. अनुच्छेद 26 धार्मिक संप्रदायों को अपने धार्मिक मामलों का प्रबंधन करने का अधिकार देता है. विवाद तब होता है जब एक समुदाय दूसरे समुदाय के हितों की अनदेखी करके उसपर अपने अधिकारों को थोपता है या थोपने की कोशिश करता है.

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