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अमेरिका में कमजोर हुए ट्रंप, डेमोक्रेट्स की जीत का भारत-US रिश्तों पर क्या होगा असर? एक्सपर्ट से समझिए

अमेरिका में हुए मिडटर्म चुनाव में रिपब्लिकन पार्टी की हार और डेमोक्रेटिक पार्टी की बड़ी जीत से वहां की राजनीति में बड़ा बदलाव आया है. इसका असर भारत-अमेरिका के रिश्तों पर भी देखने को मिल सकता है. दरअसल, दोनों देशों के बीच पिछले कुछ समय से रिश्तों में उतार-चढ़ाव देखने को मिल रहा है. ऐसे में अमेरिकी चुनाव के नतीजों ने भारत के सामने नई चुनौतियां खड़ी कर दी हैं.

सवाल है कि अमेरिका की बदलती राजनीति के बीच भारत अपने रिश्तों को कैसे मजबूत बनाए रखेगा और उसके सामने कौन-सी चुनौतियां होंगी?

डेमोक्रेट्स की जीत से कितने कमजोर हुए ट्रंप

अमेरिकी मिडटर्म चुनाव में रिपब्लिकन पार्टी को प्रतिनिधि सभा (House of Representatives) और सीनेट (Senate) दोनों में नुकसान उठाना पड़ा है. ताजा रिपोर्ट के अनुसार.

  • प्रतिनिधि सभा: डेमोक्रेट्स को 228 सीटें मिलीं, जबकि रिपब्लिकन पार्टी 139 सीटों पर आगे है. वहीं 68 सीटों पर नतीजे आने बाकी हैं.
  • सीनेट: डेमोक्रेट्स और उनके साथ रहने वाले निर्दलीय सांसदों को 54 सीटें मिलीं, जबकि रिपब्लिकन पार्टी के खाते में 44 सीटें आईं हैं.
  • मिडटर्म चुनाव के नतीजों में डेमोक्रेटिक पार्टी की जीत से ट्रंप प्रशासन के लिए संसद में अपने फैसलों और प्रस्तावों को पास कराना मुश्किल हो सकता है. अब डेमोक्रेटिक सांसद ट्रंप प्रशासन के फैसलों पर सवाल उठाने के साथ-साथ और कई मुद्दों पर सरकार को घेर सकते हैं.
  • हालांकि, मिडटर्म चुनाव में डेमोक्रेट्स की जीत का मतलब यह नहीं है कि ट्रंप की सत्ता खत्म हो गई है. वह जनवरी 2029 तक राष्ट्रपति बने रहेंगे और विदेश नीति से जुड़े बड़े फैसले लेने की ताकत उनके पास होगी.

    US के साथ मजबूत रिश्ते रखना भारत के लिए क्यों है जरूरी?

    विदेश नीति मामलों के जानकार सी. राजा मोहन ने अपने एक लेख में अमेरिकी मिडटर्म चुनाव के नतीजों और भारत-अमेरिका संबंधों पर पड़ने वाले असर को समझाया है.

    • मिडटर्म चुनाव के नतीजों के कारण अमेरिकी राजनीति में आए बदलाव को लेकर सी. राजा मोहन का मानना है कि भारत को फिलहाल ट्रंप प्रशासन के साथ बातचीत आगे बढ़ाना चाहिए और दोनों देशों के बीच लंबे समय से अटके व्यापार समझौते को पूरा करने की कोशिश करनी चाहिए. इसके अलावा रक्षा, ऊर्जा और तकनीक के क्षेत्र में भी भारत को अमेरिका के साथ सहयोग बढ़ाना चाहिए.
    • उनका कहना है कि भारत को अमेरिका के साथ अपने रिश्ते किसी एक राष्ट्रपति या राजनीतिक पार्टी के भरोसे नहीं छोड़ने चाहिए. भारत के लिए अमेरिका आने वाले समय में सबसे अहम साझेदारों में से एक रहेगा. इसलिए दोनों देशों के रिश्तों को मजबूत बनाए रखना जरूरी है.
    • सी. राजा मोहन अपने लेख यह भी कहते हैं कि डेमोक्रेटिक पार्टी की मौजूदा जीत को भविष्य की राजनीति का पक्का संकेत नहीं मानना चाहिए. उनका कहना है कि मिडटर्म चुनाव के नतीजों से यह तय नहीं होता कि 2028 में राष्ट्रपति चुनाव कौन जीतेगा या अगले चुनाव में अमेरिका में किस पार्टी को बहुमत मिलेगा.
      • अमेरिका में मिडटर्म चुनावों में डेमोक्रेटिक पार्टी की जीत के बावजूद ट्रंप अभी दो साल से ज्यादा समय तक राष्ट्रपति रहेंगे. उनके पास अपने कार्यकाल के आखिरी दिन तक विदेश नीति से जुड़े बड़े फैसले लेने की ताकत रहेगी. इसलिए भारत को मौजूदा अमेरिकी सरकार के साथ अपने काम को धीमा नहीं करना चाहिए.
      • भारत और अमेरिका के बीच पिछले कुछ समय में कई मुद्दों पर तनाव देखने को मिला है, जिसे बातचीत के जरिए दूर करना जरूरी है. मिडटर्म चुनाव के जरिए हुए राजनीतिक बदलाव के कारण भारत के पास दोनों देशों के रिश्तों को फिर से मजबूत करने का अवसर है.

      अमेरिका की राजनीति में हालात तेजी से बदलते रहते हैं. ऐसे में भारत को सिर्फ चुनावी नतीजों पर ध्यान देने के बजाय अमेरिकी राजनीति, वहां की पार्टियों और उनके अंदर चल रहे बदलावों को गहराई से समझना होगा.

    • भारत के सामने क्या हैं तीन चुनौतियां?

      सी. राजा मोहन के मुताबिक, अमेरिका की बदलती राजनीति के बीच भारत के सामने तीन बड़ी चुनौतियां हैं. भारत को इन चुनौतियों से निपटने के लिए अपनी विदेश नीति और कूटनीति के तरीके में बदलाव करना होगा.

      1. अमेरिका की राजनीति को गहराई से समझना होगा

      • भारत को यह सोच छोड़नी होगी कि रिपब्लिकन पार्टी हमेशा भारत के हित में काम करती है और डेमोक्रेटिक पार्टी भारत के खिलाफ है. या फिर इसका उल्टा. दरअसल, अमेरिका की दोनों बड़ी पार्टियों के अंदर अलग-अलग सोच रखने वाले नेता हैं. कई बार एक ही पार्टी के नेताओं के बीच भी बड़े मुद्दों पर सहमति नहीं होती.
      • उदाहरण के लिए, रिपब्लिकन पार्टी में कुछ नेता दूसरे देशों के साथ व्यापार बढ़ाने के पक्ष में हैं, जबकि कुछ अमेरिकी कंपनियों और कारोबार को प्राथमिकता देते हैं. इसी तरह डेमोक्रेटिक पार्टी में भी विदेश नीति, रक्षा बजट और दूसरे देशों के साथ रिश्तों को लेकर अलग-अलग राय है.
      • ऐसे में भारत को सिर्फ यह देखकर अपनी नीति नहीं बनानी चाहिए कि अमेरिका में किस पार्टी की सरकार है. उसे यह समझना होगा कि वहां कौन से नेता और राजनीतिक समूह किस मुद्दे पर क्या सोचते हैं. इससे भारत को अपनी बात सही लोगों तक पहुंचाने और अपने हितों की रक्षा करने में कितनी मदद मिलेगी.
      • 2. अमेरिका को लेकर छोड़नी होगी ये गलतफहमी

        • भारत में अक्सर यह माना जाता है कि चीन की बढ़ती ताकत को रोकने के लिए अमेरिका को भारत की जरूरत है। इसलिए अमेरिका भारत के साथ अपने रिश्ते खराब नहीं कर सकता. सी. राजा मोहन का मानना है कि भारत को इस सोच से बाहर निकलना होगा.
        • अमेरिका अपनी जरूरत और अपने हितों के हिसाब से फैसले लेता है. ट्रंप के दूसरे कार्यकाल में यह बात और साफ हुई है. अमेरिका भारत पर व्यापार को लेकर दबाव बना सकता है. रूस के साथ भारत के रिश्तों पर सवाल उठा सकता है और कई मुद्दों पर अपनी शर्तें भी रख सकता है.
        • भारत को यह समझना होगा कि दोनों देशों के अपने-अपने हित हैं. अमेरिका को भी भारत की जरूरत है और भारत को भी अमेरिका के सहयोग की जरूरत है. दोनों देशों के बीच रिश्ते तभी मजबूत रह सकते हैं, जब भारत सहयोग के साथ-साथ अपने हितों को भी प्राथमिकता दे.

        3. अमेरिका से रिश्ते बनाने का पुराना तरीका फिर अपनाना होगा

        • सी. राजा मोहन का कहना है कि भारत को 1990 और 2000 के दशक में अपनाई गई कूटनीति से सीख लेनी चाहिए. उस समय भारत ने अमेरिका के साथ रिश्ते मजबूत करने के लिए सिर्फ राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री के स्तर पर बातचीत नहीं की थी. भारत ने अमेरिकी सांसदों, कारोबारियों, विश्वविद्यालयों, थिंक टैंकों और वहां रहने वाले भारतीय मूल के लोगों के साथ भी लगातार संपर्क बनाया था.
        • इसका सबसे बड़ा उदाहरण 2008 का भारत-अमेरिका सिविल न्यूक्लियर समझौता है. इस समझौते को पूरा करने के लिए तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति का समर्थन जरूरी था, लेकिन सिर्फ राष्ट्रपति की सहमति से काम नहीं चल सकता था. इसके लिए अमेरिकी कांग्रेस में रिपब्लिकन और डेमोक्रेटिक दोनों पार्टियों के नेताओं का समर्थन हासिल करना भी जरूरी था.
        • भारत ने समझौते का विरोध करने वाले लोगों से बातचीत की और उन्हें अपनी बात समझाई. इस तरह भारत ने अमेरिका में अपने पक्ष में एक मजबूत समर्थन तैयार किया. सी. राजा मोहन का कहना है कि आज भारत को फिर से इसी तरह की कोशिश करने की जरूरत है.
        • फायदे के लिए समर्थक और आलोचक दोनों से रखने होंगे रिश्ते

          • सी. राजा मोहन ने अपने लेख में इस बात को हाईलाईट किया है कि अमेरिका की राजनीति सिर्फ राष्ट्रपति और दो राजनीतिक पार्टियों तक सीमित नहीं है. वहां कई ऐसी संस्थाएं और संगठन हैं, जिनका सरकार के फैसलों पर असर पड़ता है. अमेरिकी कांग्रेस, बड़ी कंपनियां, विश्वविद्यालय, मीडिया, थिंक टैंक और सामाजिक संगठन भी वहां की नीतियों को प्रभावित करते हैं.
          • ऐसे में भारत को सिर्फ व्हाइट हाउस यानी अमेरिकी राष्ट्रपति कार्यालय के साथ अच्छे रिश्ते बनाकर संतुष्ट नहीं हो जाना चाहिए. उसे इन सभी संस्थाओं और संगठनों के साथ भी अपने संपर्क मजबूत करने होंगे. इससे फायदा यह होगा कि अमेरिका में राष्ट्रपति या सरकार बदलने के बावजूद भारत के साथ रिश्तों को आगे बढ़ाने वाले लोग और संगठन मौजूद रहेंगे.
          • सी. राजा मोहन का मानना है कि भारत को अमेरिका में केवल उन लोगों से संबंध नहीं बनाने चाहिए जो भारत का समर्थन करते हैं. उसे उन नेताओं और समूहों से भी बातचीत करनी चाहिए जो भारत की नीतियों की आलोचना करते हैं. उदाहरण के लिए, अमेरिका में कुछ लोग रूस के साथ भारत के रिश्तों पर सवाल उठाते हैं. कुछ मानवाधिकार के मुद्दों पर भारत की आलोचना करते हैं, तो कुछ व्यापार और इमिग्रेशन से जुड़े मामलों पर भारत से असहमत हैं.
  • भारत को इन सभी लोगों से बातचीत करनी चाहिए और अपनी नीतियों के बारे में उन्हें समझाना चाहिए. खासकर अमेरिकी डेमोक्रेटिक पार्टी के प्रोग्रेसिव नेताओं के साथ भारत को फिर से अपने रिश्ते बनाने होंगे. अमेरिका में नई पीढ़ी के नेताओं, बढ़ती आबादी और अलग-अलग सामाजिक समूहों का राजनीतिक प्रभाव बढ़ रहा है. ऐसे में भारत को अमेरिकी राजनीति के इन नए वर्गों को भी समझना और समझाना होगा.
  • भारत की विपक्ष पार्टियों को भी आगे आना होगा

    सी. राजा मोहन का मानना है कि अमेरिका के साथ रिश्ते मजबूत करने की जिम्मेदारी केवल सरकार की नहीं है. भारत की विपक्षी राजनीतिक पार्टियों, कारोबारियों, विश्वविद्यालयों और सामाजिक संगठनों को भी अमेरिका के साथ अपने संपर्क बढ़ाने चाहिए. वो लेख में लिखते हैं कि BJP और RSS अमेरिका में अपने स्तर पर संपर्क बढ़ा रहे हैं. वहीं राहुल गांधी भी कई बार अमेरिका का दौरा कर चुके हैं. लेकिन कांग्रेस पार्टी को अमेरिकी समाज और वहां के राजनीतिक संगठनों के साथ ज्यादा व्यवस्थित तरीके से जोड़ने की जरूरत है. मतलब यह कि भारत की राजनीतिक पार्टियों को केवल अपनी सरकार या पार्टी के नेताओं तक सीमित नहीं रहना चाहिए. उन्हें अमेरिका की राजनीति और समाज को प्रभावित करने वाले अलग-अलग समूहों तक पहुंच बनानी चाहिए.

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