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न रायपुर में चला है, न मथुरा में चलेगा, सरकारियों की हरियाली, अवंति नगर में सफल वाटर हार्वेस्टिंग वरिष्ठ पत्रकार जवाहर नागदेव की खरी… खरी….

खबर अच्छी है लेकिन असर पालन होने पर दिखेगा अन्यथा तो वही ढाक के तीन पात। हमेशा की तरह। हमारा सिस्टम ही ऐसा है।
कानून बनते हैं, लोगों की भलाई के लिये और भला होता है कानून के पालन कराने वालों का।
ये पालन कराने की जवाबदारी कंधों पर उठाने वाले व्यक्तिगत फायदे का जुगाड़ लगाते रहते हैं। उनकी तो पौ बारह हो जाती है।
मथुरा में हथियार का लाईसंेस चाहिये अथवा हथियार का लाईसेंस रिन्यू करवाना है तो दस पेड़ लगाने हांेगे, ये अनिवार्य कर दिया गया है अन्यथा लाईसेंस से वंचित रह जाएंगे।
सारे देश में पानी के लिये त्राहि-त्राहि मचती है। हर साल। छत्तीसगढ़ में भी कमोबेश यही हाल है।
छत्तीसगढ़ में जलसंकट
छत्तीसगढ़ में भी पानी की चिंता है और पानी इकट्ठा करने के लिये उपाय किये गये हैं, किये जाते रहे हैं।
हर साल पेड़ लगाने के अलावा
बारिश के समय जो बरसता है वो पानी जमीन के अंदर जमा हो और बाद में उसका सदुपयोग किया जा सके इस मकसद सेे कांक्रीट की सड़कों से होकर पानी नालों में न बह जाए इसके लिये यहां भी कानून बनाया गया है, जिसे वाटर हार्वेस्टिंग कहा जाता है।
नगर निगम ने ये नियम बनाया है कि यदि मकान में वाटर हार्वेस्टिंग नहीं करवाया गया तो नक्षा पास नहीं होगा। बरसों से ये है। लेकिन हुआ क्या ?
इस नियम के पालन के लिये पंद्रह हजार वापसी योग्य यानि रिफण्डेबल जमा कराए जाते हैं और मकान पूरा बन जाने के बाद निरीक्षक चेक करता है और तब उसके वाटर हार्वेस्टिंग कन्फर्म कर लेने के बाद वो पंद्रह हजार विभाग से वापस लिये जा सकते हैं।
वाटर हार्वेस्टिंग इतना सफल है कि रायपुर के अवंति नगर में पिछले 12 सालों में इस काम पर जोर दिया गया जिसका नतीजा ये निकला कि जहां 270 फीट पर पानी मिलता था और जमीन सूखने की समस्या बनी रहती थी, वहीं अब वहां भीषण गर्मी में भी पानी नहीं सूखता।
नियम विरूद्ध निर्माण न दिखे
इसलिये जमा राशि का क्लेम नहीं करते
वास्तविकता ये है कि कोई भी अपना जमा वापस लेने नहीं जाता क्योंकि हर मकान कुछ न कुछ नक्षे के विपरीत बना होता है इसलिये बनाने वाला ये नहीं चाहता कि निगम से कोई निरीक्षण करने आए।
इसलिये रायपुन नगर निगम में वाटर हार्वेस्टिंग की एक बड़ी रकम आज भी जमा है कोई वापस लेने वाला नहीं है।
इसमें ये न समझा जाए कि मकान बनाने वाले को कोई झटका निगम नहीं देता।
नक्शा पास कराते समय ही ‘उपर का’ उपर से ले लिया जाता है या कभी बाद में भी निर्माण के दौरान भी निगम अधिकारी माल सकेल लेते हैं। हार्वेस्टिंग हो या न हो और मकान नक्षानुसार बना हो या न बना हो अपनी बला से।
कुल मिलाकर बात ये है कि यहां पर भी नियम कायदे कमाई का साधन बनते हैं और मथुरा में भी नये कानून से पेड़ लगें या न लगें सरकारी लोगों के घरों में हरियाली जरूर लहलहाएगी।
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जवाहर नागदेव, वरिष्ठ पत्रकार, लेखक, चिन्तक, विश्लेषक
मोबा. 9522170700
‘बिना छेड़छाड़ के लेख का प्रकाशन किया जा सकता है’
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