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राहुल गांधी से की रायगढ़ ज़िला अध्यक्ष ने शिकायत,  वरिष्ठ पत्रकार जवाहर नागदेव की खरी… खरी….

जय बजरंग बली,

सभी मित्रों को हनुमान जयंती की हार्दिक शुभकामनाएं। कहने की बात नहीं कि प्रभु हनुमान संकटमोचन हैं और उनसे प्रार्थना करके बड़ी से बड़ी मुसीबत से बचा जा सकता है। शर्त बस एक ही है कि इंसान छल-कपट से दूर रहे और कर्म अच्छे हों।

कभी न दिखा ऐसा दृश्य देखने को मिला

शायद ये इतिहास में बहुत कम बार हुआ है कि हाईकमान के सामने किसी नेता ने अपने से वरिष्ठ नेताओं की शिकायत की हो। लगभग एक सप्ताह पहले राहुल गांधी रायपुर आए थे। और तब कांग्रेस अध्यक्ष मलिकार्जुन खड़गे और संसद में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी के सामने छत्तीसगढ़ के सभी ज़िलों के कांग्रेस अध्यक्षों को बोलने का अवसर दिया गया।

इसमें रायगढ़ के ज़िला अध्यक्ष ने जिस साहस का परिचय दिया वो यदा-कदा ही देखने को मिलता है। और ऐसा सीन क्रिएट करने की सजा भी रचियता को मिलती है। या तो पार्टी में उसे अत्यंत महत्वहीन काम में लगा दिया जाता है या फिर छह साल के लिये निष्कासित कर दिया जाता हैै।

इतना बड़ा खतरा उठाकर भी रायगढ़ कांग्रेस के ज़िला अध्यक्ष ने पूर्व मुख्यमंत्री भूपेश बघेल और प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष दीपक बैज के सामने ही बड़े नेताओं पर निशाना साध दिया।

ज़िला अध्यक्ष अनिल शुक्ला ने दुख व्यक्त किया कि सारे बड़े नेताओं के अपने-अपने गुट हैं। जब सीनियर लोग आते हैं तो ये गुट दिखाई पड़ते हैं। अन्यथा काम का सारा दारोमदार संगठन पर होता हैै। ज़िला अध्यक्ष ने साफ कहा कि जब संगठन के तत्वावधान में चुनाव लड़ा गया है तो पार्टी चुनाव जीतती है और जब जनप्रतिनिधि चुनाव लड़े हैं तो पार्टी हारी है।

बैठक में जो बात राहुल गांधी हमेशा कहा करते हैं वो फिर एक बार कही कि काम न करने वालों को हटाया जाएगा और काम करने वालों को ताकतवर बनाया जाएगा।

हाईकमान के सामने बोलने की हिम्मत

अब यहां प्रश्न ये उठता है कि इतना साहस कैसे पैदा हो गया कि हाईकमान के सामने ज़िला अध्यक्ष ने मुंह खोल दिया और दूसरा ये कि क्या कांग्रेस मे पद और प्रतिष्ठा मिलने का पैमाना बदल गया है।

परम्परा तो यही रही है कि कोई भी कांग्रेसी हाईकमान के सामने मुंह खोलता है तो केवल प्रशंसा के लिये, विरोध का तो प्रश्न ही नहीं उठता। फिर अपने आका की अनुमति के बिना कोई कांग्रेसी केवल तभी बोल पाता है जब उससे उपर के किसी नेता का प्रश्रय हो अथवा उसे अपना पद गंवाना हो।

यहां केवल तीन ही वाक्य बोले जाते हैं यस सर, जी सर, हां सर…. ।

यहां केवल जी हुजूरी और जुगाड़ का प्रभाव चलता है किसी कर्तव्यनिष्ठा, किसी ईमानदारी का नहीं। जनता के बीच कितनी भी पकड़ और लोकप्रियता हो यदि मिठलबरा नहीं हो तो पार्टी में कोई नामलेवा नहीं होता, टिकट और पद मिलना तो दूर की बात है।

तो क्या अनिल शुक्ला को किसी सीनियर छत्तीसगढ़ी कांग्रेसी नेता की शह थी या कांग्रेस से मोहभंग हो गया है।

माहौल ऐसा है कि कांग्रेस के प्रभावशाली नेताओं को यदि थोड़े से सम्मान के साथ भाजपा में प्रवेश का अवसर मिल जाए तो वे तत्काल लपक लें। किसी हालत में न छोड़ें।

एक तो भाजपा चढ़ता सूरज और कांग्रेस ढलान पर है। और उससे भी बड़ी बात कि सत्ता भाजपा की है और आगे भी यही मंजर नजर आने वाला है। यानि कांग्रेस सत्ता से दूर रहने वाली है।

कांग्रेस के ऐसे वरिष्ठ नेता द्वारा वर्तमान नेता के नंबर कम करने हों तो ऐसी हरकत करना लाजिमी है। तो क्या ऐसे किसी नेता के संरक्षण से ज़िला अध्यक्ष ने ऐेसे प्रश्न हाईकमान के आगे खड़े कर दिये ?

यानि अब कांग्रेस के नेता निकाले जाने की रिस्क लेने को तैयार हैं।

पद मिलने का पैमाना

अब रहा सवाल राहुल गांधी की घोषणा का कि काम करने वालों को पद प्रतिष्ठा मिलेगी और काम न करने वालों को बाहर का रास्ता दिखाया जाएगा। तो काम करने वाला कौन है ये कैसे तय होगा। राहुल गांधी के पास किसी की सिफारिश कौन करेगा ? और फिर अभी तक का रिकाॅर्ड रहा है कि जो मीठा बोलता है वो अच्छा लगता है।

क्या चप्पल उठाने वाला पद पाता है ये सिलसिला अब खत्म हो जाएगा ?कतई नहीं। कभी नहीं। कांग्रेस खत्म हो जाएगी और शनै-शनै हो रही है मगर चाटुकारों को सत्ता की चासनी मिलने का सिलसिला कायम है और कायम रहेगा।

इतिहास बताता है कि राहुल गांधी भी इसी परम्परा के कायल हैं। वैसे ये कहने में संकोच नहीं कि कुछ हद तक भाजपा में भी ये माहौल बन रहा है। हालांकि उसकी हद काफी छोटी है।

लेकिन यदि बिना संरक्षण, बिना पद के लालच और साहस के साथ अपनी बात अनिल शुक्ला ने रखी है तो सचमुच वे बधाई के पात्र हैं।

जवाहर नागदेव वरिष्ठ पत्रकार, चिंतक, विश्लेषक,

मोबा. 9522170700

‘बिना छेड़छाड़ के लेख का प्रकाशन किया जा सकता है’

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