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पूजा के बाद परिक्रमा क्यों करते हैं? जानें किस देवी-देवता की कितनी प्रदक्षिणा है शुभ

Parikrama Niyam: मंदिर में पूजा करने के बाद आपने अक्सर लोगों को भगवान की परिक्रमा करते देखा होगा. कोई भगवान की मूर्ति के चारों ओर घूमता है, तो कोई पूरे मंदिर की परिक्रमा करता है. लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि पूजा के बाद परिक्रमा क्यों की जाती है और इसका क्या महत्व है? क्या यह बस वर्षों से चली आ रही एक परंपरा है या इसके पीछे कोई धार्मिक रहस्य छिपा हुआ है? आइए, इस आर्टिकल के माध्यम से समझते हैं परिक्रमा के महत्व के बारे में विस्तार से.

परिक्रमा का क्या मतलब है?

परिक्रमा को संस्कृत में प्रदक्षिणा कहा जाता है. ‘प्र’ का अर्थ उचित या सही तरीके से और ‘दक्षिणा’ का अर्थ दाहिनी ओर होता है. यानी परिक्रमा का भाव है कि पवित्र स्थान या देवता के चारों ओर दाहिनी ओर से घूमना.

जब हम भगवान की परिक्रमा करते हैं, तो इसका एक धार्मिक भाव यह है कि हमारे जीवन का केंद्र भगवान हैं. यानी हमें अपने जीवन में अहंकार या अपनी इच्छाओं को सबसे ऊपर रखने के बजाय ईश्वर को महत्व देना चाहिए.

पूजा के बाद क्यों की जाती है परिक्रमा?

शास्त्रों में माना गया है कि ईश्वर ही पूरी सृष्टि के केंद्र हैं. जब श्रद्धालु भगवान को केंद्र मानकर उनके चारों ओर घूमता है, तो वह यह स्वीकार करता है कि उसका संपूर्ण जीवन भगवान के इर्द-गिर्द ही केंद्रित है. माना जाता है कि प्रदक्षिणा का एक-एक कदम चलने से साधक के जाने-अनजाने में किए गए पापों का क्षय होता है और मनोकामनाएं पूरी होती हैं.

 

परिक्रमा का वास्तु महत्व

मंदिर के गर्भगृह में मुख्य मूर्ति के आसपास सकारात्मक ऊर्जा का क्षेत्र माना जाता है. जब श्रद्धालु नंगे पैर दाईं ओर से घड़ी की दिशा में परिक्रमा करते हैं, तो धार्मिक मान्यता के अनुसार इससे सकारात्मक ऊर्जा शशरीर में पहुंचती है. इससे मानसिक तनाव दूर होने और ध्यान लगाने की क्षमता बढ़ने की मान्यता है.

किस देवी-देवता की कितनी बार परिक्रमा करना शुभ?

शास्त्रों के अनुसार, अलग-अलग देवी-देवताओं की पूजा में परिक्रमा की संख्या को लेकर अलग-अलग मान्यताएं हैं.

देवी-देवतापरिक्रमा की संख्या
भगवान गणेश3 बार
भगवान विष्णु4 बार
मां दुर्गा / देवी शक्तियां4 बार
शनिदेव7 बार
हनुमान जी3 बार
भगवान शिव (शिवलिंग)आधी परिक्रमा

परिक्रमा के दौरान इन नियमों का रखें खास ध्यान

  • सही दिशा: परिक्रमा हमेशा भगवान को अपनी दाईं ओर रखते हुए करनी चाहिए. इसे दक्षिणावर्त परिक्रमा कहा जाता है.
  • शांत मन और मंत्र जाप: परिक्रमा करते समय दौड़ना नहीं चाहिए. शांत मन से सामान्य गति में चलना चाहिए. इस दौरान भगवान के नाम का जाप करते रहना शुभ माना जाता है.
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