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एआई के दौर में मौलिक अभिव्यक्ति और भाषाई संवेदना को बचाए रखना जरूरी : प्रो. संजय द्विवेदी

 

 

हिंदी दिवस पर आशा पारस फाउंडेशन द्वारा ‘एआई और भाषायी चुनौतियां’ विषय पर राष्ट्रीय संगोष्ठी आयोजित

भोपाल, 15 सितंबर 2026।
हिंदी दिवस के अवसर पर आशा पारस फॉर पीस एंड हारमनी फाउंडेशन, भारत द्वारा मंगलवार को *“एआई और भाषायी चुनौतियां”* विषय पर राष्ट्रीय संगोष्ठी का आयोजन किया गया। संगोष्ठी में शिक्षा, साहित्य, पत्रकारिता एवं भाषा के क्षेत्र से जुड़े विद्वानों ने कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) के बढ़ते प्रभाव, भाषाई मौलिकता तथा मानवीय अभिव्यक्ति से जुड़े विभिन्न पहलुओं पर विचार व्यक्त किए।

कार्यक्रम के मुख्य अतिथि प्रो. संजय द्विवेदी, पूर्व महानिदेशक, भारतीय जन संचार संस्थान, नई दिल्ली ने कहा कि एआई के दौर में स्वयं की वैचारिक अभिव्यक्ति धीरे-धीरे कम होती जा रही है। आज साहित्य को पढ़कर और समझकर लिखने के बजाय उसे सर्च करके लिखने की प्रवृत्ति बढ़ रही है, जो चिंता का विषय है। उन्होंने कहा कि डिजिटल युग में हिंदी किस प्रकार सक्षम और प्रभावशाली बने, इसकी जिम्मेदारी केवल तकनीक की नहीं बल्कि हम सभी की भी है। हमें हिंदी को डिजिटल माध्यमों पर अधिक समृद्ध और सक्षम बनाने के लिए सक्रिय भूमिका निभानी होगी।

मुख्य वक्ता प्रो. आनंद वर्धन शर्मा, निदेशक, यूजीसी मालवीय मिशन टीचर ट्रेनिंग सेंटर, बीएचयू, वाराणसी ने कहा कि एआई शब्दों को पकड़ सकता है, लेकिन भाव और भावना को नहीं पकड़ सकता। हालांकि भविष्य में तकनीक किस स्तर तक पहुंचेगी, यह कहना कठिन है। उन्होंने कहा कि वर्तमान समय में भाषाई संवेदना को बचाए रखना अत्यंत आवश्यक है। एआई हमारे लिए उपयोगी उपकरण है और हमें इसका उपयोग करना चाहिए, लेकिन इसका उपयोग करते समय अपनी मौलिकता और रचनात्मकता को नहीं छोड़ना चाहिए।

अध्यक्षीय उद्बोधन में प्रो. आशा शुक्ला, पूर्व कुलपति
एवं प्रबंध निदेशक, आशा पारस फॉर पीस एंड हारमनी फाउंडेशन, भारत ने कहा कि एआई ने हमारे समय और श्रम को काफी हद तक बचाया है, लेकिन एआई द्वारा उपलब्ध कराई गई सामग्री का सत्यापन करना हमारी बौद्धिक जिम्मेदारी है। उन्होंने कहा कि किसी विषय की सामग्री को सही ढंग से परख और सत्यापित वही व्यक्ति कर सकता है, जिसे उस विषय की गहरी समझ हो। इसलिए हमें एआई का विरोध करने के बजाय उसका स्मार्ट और जिम्मेदार उपयोग करना सीखना चाहिए।

विशिष्ट वक्ता श्री पंकज शुक्ला, वरिष्ठ संपादक, सुबह सवेरे एवं सलाहकार, मध्यप्रदेश विधानसभा, भोपाल ने कहा कि आज हम एआई को जितना अधिक और बेहतर इनपुट देंगे, वह उतना ही समृद्ध होता जाएगा। इसलिए हिंदी भाषा की समृद्धि और विविधता को एआई तक पहुंचाना आवश्यक है। उन्होंने कहा कि हिंदी को तकनीकी एवं डिजिटल माध्यमों में मजबूत बनाने के लिए हिंदी भाषी समाज को अधिक सक्रियता से योगदान देना होगा।

कार्यक्रम में स्वागत एवं प्रस्तावना वक्तव्य प्रो. अंजली औधिया, प्राचार्य, शासकीय कमला देवी महिला महाविद्यालय, राजनांदगांव, छत्तीसगढ़ द्वारा दिया गया। उन्होंने एआई और भाषाओं के भविष्य को लेकर महत्वपूर्ण प्रश्न उठाते हुए कहा कि जो भाषाएं एआई की दुनिया से दूर रह जाएंगी, क्या वे धीरे-धीरे विलुप्त होने की स्थिति में पहुंच सकती हैं, यह चिंतन का विषय है। उन्होंने कहा कि तकनीक कितनी भी विकसित हो जाए, लेकिन मानव मस्तिष्क की रचनात्मकता का अपना विशिष्ट महत्व है। मानवीय सोच, संवेदना और सृजनशीलता को तकनीक के साथ संतुलित रखना आवश्यक है।

संगोष्ठी में वक्ताओं ने इस बात पर विशेष जोर दिया कि कृत्रिम बुद्धिमत्ता को मानव रचनात्मकता का विकल्प नहीं, बल्कि सहायक उपकरण के रूप में देखा जाना चाहिए। भाषा, साहित्य और शिक्षा के क्षेत्र में एआई के उपयोग के साथ-साथ मौलिक चिंतन, मानवीय संवेदना, तथ्यपरकता और भाषाई विविधता की रक्षा करना समय की आवश्यकता है।

कार्यक्रम में शिक्षाविदों, शोधार्थियों, विद्यार्थियों, साहित्यकारों, सामाजिक कार्यकर्ताओं एवं भाषा प्रेमियों ने ऑनलाइन सहभागिता की।

कार्यक्रम के अंत में आभार प्रदर्शन लव चावड़ीकर, कार्यकारी प्रबंधक, आशा पारस फॉर पीस एंड हारमनी फाउंडेशन, भारत द्वारा किया गया।

जारीकर्ता:
आशा पारस फॉर पीस एंड हारमनी फाउंडेशन, भारत
भोपाल, मध्यप्रदेश

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