
यहां धरना देंगे, बिना अनुमति चुनाव आयोग से मिलेंगे, जिधर से जाना मना है वहीं से जाएंगे, सारा देश एक तारीख की रैली को विरोध कर रहा है तब भी एक को ही करेंगे। ये कैसी जिद है भाई ?
आपको सरकार को परेशान करना है कि जनता को ?
बरसों पीछे जाएं तो पाएंगे ऐसी ही रैलियों में लूटपाट का रिकाॅर्ड रहा है। ट्रेन मे रास्ते में पड़ने वाले स्टेशन लूट लिये जाते रहे हैं। जहां रैली वहां के दुकानदार लूटे जाने की खबरें आती रहीं।
ऐसे में दस लाख को कौन कंट्रोल कर पाएगा। फिर जब नेता ही जिद्दी ओर अमर्यादित आचरण करे तो समर्थकों से क्या उम्मीद कर सकते हैं ? एक नवंबर की दिल्ली रामलीला मैदान की रैली में कांग्रेस की पोल खुलने वाली है, क्यांेकि सबको पता है कि दस लाख आने वाले नहीं है। लेकिन गिनेगा कौन ? एक लाख को आठ लाख बताने में कौन सा जुर्माना लग जाएगा ?
पर अनहोनी की आशंका तो है।

यदि सदर बाजार में बीस हजार लोग घुस गये और दस-बीस दुकानों को लूट लिया तो… ? रास्ते में लोगों ने स्टेशनों पर और ट्रेन में सफर करने वालों के लिये तकलीफ खड़ी कर दी तो… ? एक भी निरपराध लूटा गया या घायल हुआ तो कौन जवाबदार होगा ? क्या आयोजक जिम्मेदारी उठाएंगे ?
तो सरकार को क्या करना चाहिये ?
सुरक्षा सुनिश्चित करे सरकार
ट्रेनें रद्द,रास्ते बंद,बचाए व्यापार
ऐसे अनिश्चय की स्थिति को देखते हुए और भीड़ की मानसिकता को देखकर खतरे को भांपकर सरकार को चाहिये कि आजकल में जितनी संभव हो सके दिल्ली की ओर चलने वाली ट्रेनें केंसिल कर दे।
ट्रेनें केंसिल हो जाने से फोकट में ट्रेनों से केवल मजे मारने के लिये जाने वाले लोगों का रास्ता बंद हो जाएगा और एक बड़ा खतरा टल जाएगा। वस्तुतः अधिकांश लोग दिल्ली देखने और मजे के लिये जाए जाते हैं, आंदोलन के लक्ष्य की उन्हें कोई जानकारी भी नहीं होती और परवाह भी नहीं होती।
इसी तरह दिल्लीे जाने वाले रास्तों पर रोक लगा दी जाए और कार्ड देखकर केवल वास्तविक जरूरतमंदों को ही एंट्री मिले।
निस्संदेह इससे जनता की सुरक्षा सुनिश्चित करने में आसानी होगी और ऐसे कदमों से जनता को खुशी ही होगी।
सत्ता में नहीं है आना
व्यर्थ है चीखना-चिल्लाना

सरकार विरोधियों, मोदी विरोधियों, भाजपा विरोधियों का हाल एक जैसा ही हो गया है। जब कोई सामने वाले से निपट नहीं पाता और समझ जाता है कि उसके लिये चारों ओर से सारे रास्ते बंद हो गये हैं। तब वो जैसी प्रतिकिया व्यक्त करता है ठीक वैसी ही प्रतिकिया ये लोग व्यक्त कर रहे हैं। और ये प्रतिकियाएं स्वतः ही सरकार विरोधी न होकर देश विरोधी हो जाती हैं। इनसे देश का ही नुकसान होता है।
बात-बात में अड़ जाते हैं, बिना ठोस आधार के।
जैसे कोई जिद्दी बच्चा बेवजह जिद पकड़ लेता है और मोहल्ले भर को सर पर उठा लेता है, उसके अड़ोसी-पड़ोसी, रिश्तेदार सभी उसे हिकारत की नजर से देखते हैं और उसे अपने से दूर रखने का प्रयास करते हैं। फिर भी ये लोग अनाप-शनाप बोलकर, चीखने-चिल्लाने पर अड़े रहते हैं। समझते हैं कि ऐसे अड़े रहने से हम बड़े हो जाएंगे, राजनीति में पकड़ बढ़ेगी। जनता के दिलों पर राज करने लगेंगे, जनता का विश्वास एक बार फिर जीत लेंगे।
हार की हताशा से
उपजता है आलाप
बरसों पूर्व दुर्गा काॅलेज में चुनाव के समय दो गुटों में विवाद चल ही रहा था। ऐसे में एक गुट के कुछ लड़कों ने दूसरे गुट के एक छात्र को घेर लिया और लगे आरोप लगाने और चमकाने। दूसरे छात्र ने जब खुद को अकेला, असहाय महसूस किया, धिरा हुआ समझा और अंदर से बेहद डर गया। इतना डर गया कि रोने और चिल्लाने लगा और बोलने लगा गोली मार दूंगा, समझते क्या हो… आदि। ये सुनकर विरोधी छात्रों में से एक ने उसे झापड़ रसीद दिया। मगर उसका डर, उसकी खिसियाहट और अकेलेपन ने उसे उटपटांग बोलने पर मजबूर कर दिया। वह कुछ भी अनर्गल आलाप करने लगा, डर भी गया था पर गालियां भी देते जा रहा था।
देश का विपक्ष भी हर हार और और विफलता के कारण और खास तौर पर सारे के सारे हथकण्डे व्यर्थ हो जाने के कारण खिसिया गया है। यही कारण है कि जंतर-मंतर में इकट्ठे काकरोचों ने खुलकर गंदी गालियां बकीं। ये भी नहीं सोचा कि उनके मां-बाप, उनके भाई-बहन उन्हें ऐसा बोलते और ऐसा नंगापन फैलाते टीवी पर या अखबारों में देख लेंगे। बेशर्मी के साथ वे ऐसी हरकतें करते रहे।
ये दुख कम क्यों नहीं होता बे
कहीं किसी वीडियो में एक पात्र को ये कहते सुना था कि ‘ये दुख कम क्यांे नहीं होता बे’। बस हालत विपक्ष की है, दुख कम हो ही नहीं रहा। सभी एक ही मानसिकता से गुजर रहे हैं। राहुल गांधी से खड़गे तक… । सक्रिय राजनीति में सबसे उम्रदराज खड़गे भी ऐसी ही बीमारी के शिकार हैं। लगातार विफलता से उपजी हताशा ने उन्हें फिर अनर्गल आलाप के चलते ‘मोदी का बाप भी जाएगा’ कहलवा दिया। जो नितान्त अनावश्यक था।
साथ ही कांग्रेस की एक तारीख की रैली के लिये जिद पर अड़े हैं।
मोदी विरोधियों ने लगातार ऐसे ही व्यर्थ के कटाक्ष किये हैं और जिन बातों को राजनीति से, देश की नीतियांे से, हालात से कतई कोई संबंध नहीं है ऐसी बातों को मुद्दा बनाने का प्रयास किया है। जनता उनके द्वारा उठाए जा रहे हर कदम को नकार रही है और सरकार अपने लक्ष्य की ओर चलती जा रही है। समझ लो हाथी चले बाजार, और …. भौंके हजार।
इस भड़ास, प्रदर्शन से जनता का क्या भला होना है अथवा जनता कितना प्रभावित होगी और मोदी से घृणा करने लगेगी ये समझा जा सकता है। लेकिन ये भी बिचारे क्या करें… मुद्दे हैं नहीं जिन पर सरकार को घेरें और वजूद बनाए भी रखना है। खिसियाते खम्भा नोचते रहते हैं।
— जवाहर नागदेेव






