Ro no D15139/23

वरिष्ठ पत्रकार चंद्रशेखर शर्मा की बात बेबाक …तू ना समेटा कर ये जुल्फे अपनी,  कि, मुझे बहुत पसंद है इनमें उलझना ।

छत्तीसगढ़ की राजनीति में धुरविरोधी व अपनी अपनी पार्टी के धुरंधर नेता पूर्व मुख्यमंत्री भूपेश बघेल और उपमुख्यमंत्री विजय शर्मा विधानसभा से बाहर पहली बार आमने-सामने थे , मुद्दा प्रधानमंत्री आवास योजना को लेकर एक दूसरे को दी गई चुनौती का और इनकी आपस की चुनौती का गवाह बना रायपुर प्रेस क्लब । गरीबो के आवास को लेकर चल रही राजनीति में नेताओ की आंकड़ेबाजी को देखकर लगा कि छत्तीसगढ़ में गरीब का मकान भले ही सिंगल मंजिल हो लेकिन इस पर हो रही राजनीति कई मंजिल ऊपर पहुंच चुकी है। सवाल यह भी है कि घर गरीब का बनेगा तो श्रेय किसी पार्टी को मिलेगा ?

प्रेस क्लब रायपुर में दिग्गजों की जुबान से लगभग 80 मिनट तक आंकड़ों की ऐसी बरसात हुई कि मौसम विभाग की तरह जनता भी दिग्भ्रमित हो गई कि कितने मकान स्वीकृत हुए, कितने बने, कितने अधूरे हैं, पोर्टल कब खुला-कब बंद हुआ, केंद्र ने कितना दिया और राज्य ने कितना किया, हर आंकड़े की अपनी राजनीतिक छतरी थी इन सब के बीच आवास के नाम पर चल रही कथित कमीशनखोरी , आधे अधूरे बने आवास , गरीबो का पैसा खा कर भाग गए ठेकेदार , छुटभैये नेताओ की एफआईआर , मजूरी को भटकते आवास मित्रों की पीड़ा आंकड़ेबाजी की अंधड़ में भुला दी गई ।

नेताओ की आंकड़ेबाजी के बीच गरीब बेचारा शायद सोच रहा होगा “मोर झोपड़ी के ऊपर नाम काखर छपहि ओला बाद मं बताहु … पहिली ये बतावव कि चाबी कब मिलही ?” इन सबके बीच आवस मित्रो की अपनी पीड़ा है वे सोच रहे होंगे “ मय झोपड़ी ल पक्का आवास बनवा डारेव अब आंकड़ा ल बाद मं बताहु … अभी ये बताओ कि आवास बन गए त हमर रोजी मंजूरी कब मिलही मालिक ?”

राजनीति में सवाल ना तो चाबी का होता है और ना ही आवास मित्रों की मजदूरी का , सवाल होता है आवास की दीवार और चाबी पर लगे टैग में नाम किस पार्टी का होगा और सारा झगड़ा भी इसी नाम का है ।

भूपेश बघेल अपने कार्यकाल के आंकड़ों और केंद्र से जुड़े मुद्दों का हवाला देते रहे , तो विजय शर्मा मौजूदा सरकार की प्रगति और निर्माण की रफ्तार गिनाते रहे । दोनों तरफ से तर्कों की ईंटें आती जाती रहीं , गणितीय गुना भाग लगाए जाते रहे और आरोपों का सीमेंट मजबूती से लगाया जाता रहा नतीजा यह कि राजनीति का भवन मजबूत होता गया । सारी बहस में कमाल की बात यह रही कि आवास योजना में सबसे ज्यादा चर्चा मकान की नहीं, आंकड़ों की थी जैसे गरीब को घर नहीं एक्सेल शीट में एक सेल चाहिए था ?

एक पक्ष कहता केंद्र ने सहयोग नही किया फिर भी हमने इतना कराया तो दूसरे पक्ष से जवाब आता आपने इतना नहीं कराया। पहला फिर कहता है आपने हमारा आंकड़ा गलत पढ़ा। दूसरा पलटकर कहता है आपने अपना कार्यकाल ठीक से नहीं चलाया तभी तो बाबा ने इस्तीफा दिया था।

दोनो की लाइव बहस के बीच जनता खड़ी खड़ी सोच रही “भइया, तुमन दुनों अपन अपन गणित लगावत रहव, मोला तो बस चार दीवार अउ एक छत दे देव अऊ घर के दीवार अऊ चाबी में नाम काखरो लिखावव बोट के बेरा में हम बताबो कउन बनाइस हमर घर ल ।

” प्रधानमंत्री आवास योजना गरीब के सिर पर छत देने के साथ साथ बेरोजगार युवाओं को आवसमित्र के बहाने रोजगार देने की भी योजना है और ऐसे आवसमित्र युवाओं को समय पर मजूरी का ना मिलना कामचोर और कमीशनखोर अफसरों पर उंगली उठाने के लिए काफी है । प्रधानमंत्री आवास योजना को राजनीतिक उपलब्धि की ऊंची इमारत में बदल देना आवसमित्रो के बिना संभव नहीं और गरीब को न प्रेस क्लब में बहस चाहिए, न आंकड़ों की आतिशबाजी , उसे चाहिए मकान, समय पर किस्त और हाथ में चाबी बाकी श्रेय के लिए नेताओं के पास वैसे भी और भी योजनाएं है जिसके लिए जरूरत होती है बस एक बयान बाजी , एक एआई जनरेटेड पोस्टर , एक तड़कता फड़कता भाषण और फिर धरना प्रदर्शन और पुतला दहन की।

 

और अंत में :-

तू ना समेटा कर ये जुल्फे अपनी,

कि, मुझे बहुत पसंद है इनमें उलझना ।

 

#जय_हो 17 सितंबर 2026 कवर्धा (छत्तीसगढ़)

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