
7 अक्टूबर 1976 को ग्वालियर के एक साधारण परिवार में जन्मे शरद केलकर आज अपनी जिंदगी के 50वें पड़ाव पर कदम रख चुके हैं. जब भी पर्दे पर शरद केलकर का चेहरा आता है, तो उनकी रोबीली पर्सनैलिटी अपने आप दर्शकों का ध्यान खींच लेती है. लेकिन क्या आप जानते हैं कि उनकी पहचान का एक ऐसा अनसुना पहलू भी है, जिसने उन्हें इंडस्ट्री के बाकी तमाम कलाकारों से बिल्कुल अलग मुकाम पर ला खड़ा किया?
वह सिर्फ फिल्मों और वेब सीरीज में अपनी ऑन-स्क्रीन एक्टिंग के लिए ही नहीं जाने जाते, बल्कि भारतीय सिनेमा के सबसे मशहूर वॉइस आर्टिस्ट और डबिंग आर्टिस्ट में से एक हैं. पर्दे पर उनका चेहरा जितना कड़क और असरदार दिखता है, उतनी ही भारी और जादुई उनकी आवाज है.
जब एस.एस. राजामौली की ऑल-टाइम ब्लॉकबस्टर ‘बाहुबली’ हिंदी में रिलीज हुई, तो पर्दे पर प्रभास का विशालकाय अवतार दिखा, लेकिन जब सिनेमाघरों में उनकी दहाड़ गूंजी तो वह आवाज शरद केलकर की थी. उन्होंने न सिर्फ ‘अमरेंद्र बाहुबली’ बल्कि ‘महेंद्र बाहुबली’ दोनों किरदारों के मिजाज को अपनी आवाज के दम पर पूरी तरह से जीवंत कर दिया था.
आखिर एक एक्टर ने डबिंग स्टूडियो में बैठकर ऐसा क्या जादू चलाया कि ‘बाहुबली’ का हर हिंदी डायलॉग हमेशा-हमेशा के लिए अमर हो गया? और कैसे ग्वालियर का यह लड़का हॉलीवुड के सबसे बड़े एक्शन हीरोज की ऑफिशियल हिंदी आवाज बन गया?
7 अक्टूबर को शरद केलकर के 50वें जन्मदिन के खास मौके पर ‘अनसुनी दास्तान’ के इन 4 रोमांचक चैप्टर्स में पढ़िए एक एक्टर से ‘वॉइस किंग’ बनने, राजामौली के उस एक फैसले और हॉलीवुड पर राज करने वाली उनकी जादुई आवाज की पूरी कहानी
चैप्टर 1: ग्वालियर में जन्म, फिजिकल ट्रेनर से मॉडल और फिर विलेन बनकर मिली पहचान
शरद केलकर का बचपन मध्य प्रदेश के ग्वालियर में बीता. कम ही लोग जानते हैं कि एक्टिंग की दुनिया में आने से पहले वह एक प्रोफेशनल जिम ट्रेनर और मॉडल हुआ करते थे. 2002 में उन्होंने ‘ग्रैसिम मिस्टर इंडिया’ के फाइनल तक का सफर तय किया और यहीं से उनके लिए मुंबई के दरवाजे खुले.
शुरुआती दिनों में टीवी सीरियल ‘सात फेरे’ और ‘कुछ तो लोग कहेंगे’ से उन्होंने अपनी पहचान बनाई, लेकिन बॉलीवुड में उन्हें असली ब्रेक मिला संजय लीला भंसाली की फिल्म ‘गोलियों की रासलीला राम-लीला’ से.
- कड़क पर्सनैलिटी से मचाया तहलका: ‘राम-लीला’ में रणवीर सिंह के खिलाफ उनके विलेन वाले किरदार और भारी आवाज ने दर्शकों को झकझोर कर रख दिया.
- अक्षय के सामने चुरा ली महफिल: फिल्म ‘लक्ष्मी’ में एक ट्रांसजेंडर का किरदार निभाना हो या अजय देवगन के साथ ‘तानाजी: द अनसंग वारियर’ में छत्रपति शिवाजी महाराज का ऐतिहासिक रोल शरद ने हर बार साबित किया कि उनका स्क्रीन प्रेजेंस किसी भी बड़े सुपरस्टार से कम नहीं है.
चैप्टर 2: जब राजामौली ने देखा शरद का अंदाज, और ऐसे बने प्रभास की ‘बाहुबली’ वाली दहाड़
जब एस.एस. राजामौली ‘बाहुबली’ के हिंदी डबिंग वर्जन के लिए किसी दमदार आवाज की तलाश कर रहे थे, तब कई बड़े-बड़े डबिंग आर्टिस्ट्स के नाम रेस में थे. लेकिन राजामौली को एक ऐसी आवाज चाहिए थी जिसमें एक राजा की गरिमा भी हो और युद्ध के मैदान की दहाड़ भी.
शरद केलकर ने बताया था कि राजामौली साहब उनसे मिले और काफी देर तक उनकी पर्सनैलिटी, बोलने के तरीके और बॉडी लैंग्वेज को चुपचाप देखते रहे. उस मुलाकात के तुरंत बाद उन्होंने तय कर लिया कि प्रभास के लिए शरद केलकर से बेहतर कोई विकल्प हो ही नहीं सकता.
- एक ही इंसान, दो अलग आवाजें: शरद ने अमरेंद्र बाहुबली की गंभीर और परिपक्व आवाज के साथ-साथ महेंद्र बाहुबली के युवा और चंचल अंदाज को अपनी डबिंग से पूरी तरह अलग दिखाया.
- इतिहास रच दिया: “जय महिष्मती” और “मेरा वचन ही है मेरा शासन…” जैसे डायलॉग्स जब सिनेमाघरों में गूंजे, तो दर्शकों के रोंगटे खड़े हो गए. आज हिंदी पट्टी में जब भी प्रभास का जिक्र आता है, तो दिमाग में शरद केलकर की ही गूंजती हुई आवाज सुनाई देती है.
चैप्टर 3: ‘मैं डब नहीं करता, वॉयस एक्ट करता हूं’, स्टूडियो के अंदर का अनसुना सच
अक्सर लोग मानते हैं कि डबिंग का मतलब सिर्फ माइक के सामने बैठकर पन्नों पर लिखे डायलॉग्स को पढ़ देना है, लेकिन शरद केलकर का डबिंग को लेकर नजरिया बिल्कुल अलग और बेहद संजीदा है.
उन्होंने अपनी इस आर्ट पर बात करते हुए साफ कहा था:









