
Chaturdashi Shradh 2026: पंचांग (मिथिला, महावीर और द्रिक) के अनुसार, आज 9 अक्टूबर 2026 को आश्विन कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी तिथि है. श्राद्ध के लिए कुतुप, रौहिण और अपराह्न मुहूर्त क्या है. पितृ पक्ष की चतुर्दशी तिथि पर किन पूर्वजों का श्राद्ध किया जाएगा. चतुर्दशी तिथि के श्राद्ध (तर्पण, पिंडदान) क्या महत्व है. साथ ही तर्पण की विधि और चतुर्दशी श्राद्ध के जुड़े नियम क्या हैं, जानिए.
चतुर्दशी श्राद्ध के लिए मुहूर्त
- कुतुप मुहूर्त- 11 बजकर 12 मिनट से 11 बजकर 59 मिनट तक
- रौहिण मुहूर्त- 11 बजकर 59 मिनट से दोपहर 12 बजकर 46 मिनट तक
- अपराह्न मुहूर्त- दोपहर 12 बजकर 46 मिनट से 3 बजकर 07 मिनट तक
नोट- यहां दिए गए श्राद्ध के मुहूर्त द्रिक पंचांग के अनुसार हैं. अलग-अलग शहर में सूर्योदय के अनुसार मुहूर्त में कुछ मिनटों का अंतर आ सकता है.
आज पितृ पक्ष की चतुर्दशी तिथि पर किन पूर्वजों का श्राद्ध करें
कर्मकांड के जानकार वरुण झा (महापात्र) ने बताया कि की चतुर्दशी तिथि (शुक्ल पक्ष या कृष्ण पक्ष) पर मृत पूर्वज का श्राद्ध इसी तिथि पर करना चाहिए.
निर्णय सिंधु नामक धर्म ग्रंथ में बताया गया है कि पितृ पक्ष की चतुर्दशी तिथि पर उन दिवंगत लोगों के लिए श्राद्ध (तर्पण, पिंडदान) करना चाहिए, जिनकी मृत्यु पेड़ के गिरकर, पानी में डूबकर, जहर खाकर या आग की वजह से हुई. इसके अलावा चतुर्दशी तिथि का श्राद्ध उनके मृत व्यक्तियों के लिए किया जाता है, जिनकी मृत्यु सांप काटने या किसी शस्त्र से हुई.
अकाल मृत्यु या असमय दिवंगत हुए पूर्वजों का श्राद्ध भी इसी तिथि पर होना चाहिए ऐसा शास्त्रों में बताया गया है. शास्त्रों के अनुसार, इस दिन शस्त्र और जहर आदि से मृत महिलाओं के लिए भी श्राद्ध किया जाता है. लेकिन, जिन महिलाओं की मृत्यु प्रसव (शिशु को जन्म देते वक्त) हुई हो उनका श्राद्ध चतुर्दशी तिथि को नहीं करना चाहिए.
क्यों जरूरी है चतुर्दशी तिथि का श्राद्ध?
शास्त्रों के अनुसार, जिनकी अकाल मृत्यु होती है, उनकी आत्मा सामान्य श्राद्ध से तृप्त नहीं होती. इसलिए उनके लिए पितृ पक्ष की चतुर्दशी तिथि पर श्राद्ध का विधान है. धर्मशास्त्र के जानकार पं. धर्मनाथ झा ने बताया कि चतुर्दशी तिथि पर श्राद्ध करने से पूर्वज की आत्मा तृप्त होती है. इससे उनके वंशज खुशहाल रहते हैं.
पितृ पक्ष की चतुर्दशी श्राद्ध से जुड़े नियम
दक्षिण दिशा की ओर मुंह करके बैठ जाएं. जनेऊ को दाएं कंधे पर (अपसव्य) रखें. दाएं हाथ में कुश, काले तिल और जल लेकर पितरों का नाम और गोत्र को बोलते हुए उन्हें जल अर्पित किया जाता है.
दाएं हाथ तर्जनी (इंडेक्स फिंगर) उंगली और अंगूठे के बीच (पितृ तीर्थ) से जल और तिल जमीन पर या किसी बर्तन में गिराएं. ऐसा तीन बार तीनों पूर्वजों (पिता, दादा और परदादा) के लिए करें. ऐसा करते वक्त ‘ॐ पितरः तृप्यन्ताम्’मंत्र बोलें.
संभव हो, तो तर्पण के बाद घर में बनाए गए सात्विक भोजन पहले गाय, कुत्ता, कौआ, चींटी और देवता के लिए अलग कर उन्हें दें. इसके बाद ब्राह्मण भोजन कराएं.
ब्राह्मण भोजन कराना संभव न हो, तो किसी जरूरतमंद व्यक्ति को अनाज (चावल, आटा, दाल आदि) दान करें. इसके अलावा तिल, गुड़ और कपड़े आदि का दान करने की परंपरा है.









