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केंद्र सरकार को झटके लगते ही क्यों मुखर हो जाते हैं NDA के साथी? चिराग, मांझी और कुशवाहा की राजनीति समझिए

Chirag Paswan-Jitan Ram Manjhi Politics: गठबंधन की राजनीति में साथ रहना और हर मुद्दे पर एक जैसी राय रखना, दोनों अलग-अलग बातें हैं. केंद्र में सत्तारूढ़ राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (NDA) में भी इसकी झलक देखने को मिलती है. बिहार में चिराग पासवान, जीतन राम मांझी और उपेंद्र कुशवाहा जैसे सहयोगी नेता कई मुद्दों पर अपनी अलग राय रखते हैं. कभी यह राय सरकार के फैसलों से मेल खाती है, तो कभी असहमति भी सामने आती है.

हाल के दिनों में दिल्ली में कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) के प्रदर्शन को लेकर केंद्रीय मंत्री चिराग पासवान का बयान चर्चा में रहा. वहीं, NEET-UG विवाद के बाद तत्कालीन शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा और किसान आंदोलन के दौरान कृषि कानूनों की वापसी जैसे घटनाक्रम भी केंद्र सरकार के सामने आए बड़े दबाव के उदाहरण हैं. ऐसे में सवाल उठता है कि इन घटनाओं का NDA के सहयोगी दलों की राजनीति से क्या संबंध है? और वे सरकार के साथ रहते हुए भी अपनी अलग आवाज क्यों उठाते हैं?

CJP के प्रदर्शन पर चिराग ने क्यों रखी अलग राय?

10 अक्टूबर 2026 को दिल्ली के जंतर-मंतर पर CJP ने मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग को लेकर प्रदर्शन का आह्वान किया था. प्रदर्शन से पहले रेलवे ने दिल्ली पहुंचने वाली कई ट्रेनों को रद्द किया. इस फैसले पर केंद्रीय मंत्री और लोक जनशक्ति पार्टी (रामविलास) के प्रमुख चिराग पासवान ने सवाल उठाए.

चिराग ने कहा कि भारत के युवाओं को रोका नहीं जा सकता. उन्होंने शांतिपूर्ण प्रदर्शन को लोकतांत्रिक अधिकार बताया. उनका बयान इसलिए अहम था, क्योंकि वह केंद्र सरकार में मंत्री हैं और उनकी पार्टी NDA की सहयोगी है.

इस मामले में चिराग का रुख यह संकेत देता है कि गठबंधन में शामिल दल हर फैसले का बचाव करना जरूरी नहीं समझते. वे अपने समर्थकों और युवा मतदाताओं के बीच अपनी अलग पहचान भी बनाए रखना चाहते हैं. हालांकि, किसी एक बयान से यह निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता कि चिराग केंद्र सरकार के खिलाफ हैं.

NEET विवाद और धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा

NEET-UG 2026 परीक्षा में कथित अनियमितताओं और पेपर लीक के आरोपों ने केंद्र सरकार पर दबाव बढ़ाया था. छात्रों के विरोध प्रदर्शन के बीच 25 जुलाई 2026 को शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने इस्तीफा दिया. इसके बाद शिक्षा मंत्रालय का अतिरिक्त प्रभार केंद्रीय मंत्री प्रह्लाद जोशी को सौंपा गया.

यह घटनाक्रम बताता है कि बड़े जनआंदोलन और किसी मुद्दे पर लगातार उठते सवाल सरकार के लिए राजनीतिक चुनौती बन सकते हैं. ऐसे समय में सहयोगी दलों के लिए भी यह जरूरी हो जाता है कि वे जनता के सामने अपना पक्ष रखें. लेकिन धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे को केवल सहयोगी दलों के दबाव का नतीजा मानना सही नहीं होगा. इसके लिए अलग से ठोस प्रमाण जरूरी हैं.

किसान आंदोलन: जब सरकार को वापस लेने पड़े कृषि कानून

केंद्र सरकार के सामने दबाव का एक बड़ा उदाहरण 2020-21 का किसान आंदोलन था. तीन कृषि कानूनों के विरोध में पंजाब, हरियाणा और पश्चिमी उत्तर प्रदेश के किसानों ने दिल्ली की सीमाओं पर लंबा आंदोलन किया. किसानों को आशंका थी कि इन कानूनों से न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) की व्यवस्था कमजोर होगी और खेती पर बड़े कॉरपोरेट घरानों का प्रभाव बढ़ेगा.

करीब एक साल तक चले आंदोलन के बाद 19 नवंबर 2021 को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने तीनों कृषि कानून वापस लेने की घोषणा की. संसद ने भी बाद में इन्हें निरस्त कर दिया.

इस उदाहरण से समझा जा सकता है कि व्यापक जनविरोध सरकार को अपने फैसलों पर पुनर्विचार करने के लिए मजबूर कर सकता है. हालांकि, हर आंदोलन का असर एक जैसा नहीं होता. उसका प्रभाव मुद्दे, जनसमर्थन और राजनीतिक परिस्थितियों पर निर्भर करता है.

BJP की बहुमत से दूर स्थिति और सहयोगियों की अहमियत

2024 के लोकसभा चुनाव के बाद केंद्र में BJP अपने दम पर बहुमत हासिल नहीं कर सकी. NDA की सरकार सहयोगी दलों के समर्थन से बनी. ऐसे में गठबंधन के भीतर सहयोगियों की भूमिका महत्वपूर्ण हो गई.

नीतीश कुमार की JDU और चंद्रबाबू नायडू की TDP जैसे दलों का समर्थन सरकार के लिए अहम है. इसका अर्थ यह नहीं कि वे हर मुद्दे पर सरकार से असहमत हैं. लेकिन गठबंधन की व्यवस्था में सहयोगियों के पास अपनी मांगें रखने और नीतिगत फैसलों पर बातचीत करने की गुंजाइश रहती है.

इसी राजनीतिक गणित के बीच बिहार के छोटे सहयोगी दल भी अपनी बात रखने की कोशिश करते हैं. उन्हें अपने सामाजिक आधार, क्षेत्रीय मुद्दों और समर्थकों की अपेक्षाओं का ध्यान रखना पड़ता है.

लोजपा, HAM और RLM अपनी अलग पहचान क्यों चाहते हैं?

बिहार में लोक जनशक्ति पार्टी (रामविलास), हिंदुस्तानी आवाम मोर्चा (सेक्युलर) और राष्ट्रीय लोक मोर्चा NDA के सहयोगी हैं. इन दलों के सामने दोहरी चुनौती रहती है. एक तरफ उन्हें गठबंधन के साथ बने रहना है. दूसरी तरफ अपने मतदाताओं को यह भी दिखाना है कि उनकी अपनी राजनीतिक आवाज है.

चिराग पासवान युवाओं और सामाजिक न्याय जैसे मुद्दों पर अपनी राय रखते हैं. जीतन राम मांझी और HAM भी अपने सामाजिक आधार से जुड़े सवाल उठाते रहे हैं. उपेंद्र कुशवाहा और RLM भी अपनी राजनीतिक प्राथमिकताओं के अनुसार मुद्दों पर पक्ष रखते हैं.

ऐसे बयान सहयोगियों को अपने समर्थकों तक संदेश पहुंचाने का मौका देते हैं. इससे वे यह दिखा सकते हैं कि गठबंधन में शामिल होने का अर्थ अपनी स्वतंत्र राजनीतिक पहचान छोड़ देना नहीं है.

हालांकि, हर बयान को सरकार पर दबाव बनाने की रणनीति मानना भी सही नहीं होगा. कई बार नेताओं की असहमति किसी खास नीति या घटना को लेकर वास्तविक होती है. यह तय करने के लिए कि कोई बयान राजनीतिक सौदेबाजी का हिस्सा है या नीतिगत विरोध, उसके संदर्भ और बाद के घटनाक्रम को देखना जरूरी है.

क्या केंद्र पर दबाव बढ़ने से सहयोगियों की ताकत बढ़ती है?

गठबंधन की राजनीति में सहयोगियों की अहमियत केवल उनके सांसदों या विधायकों की संख्या से तय नहीं होती. चुनावी समर्थन, सामाजिक आधार और क्षेत्रीय प्रभाव भी उनकी भूमिका को मजबूत करते हैं. जब सरकार किसी बड़े विवाद में घिरती है, तो सहयोगी दल अपनी मांगें सामने रखने के लिए अधिक मुखर हो सकते हैं.

लेकिन इसका यह अर्थ नहीं कि हर विवाद के बाद सरकार कमजोर हो जाती है या सहयोगी दल उसे छोड़ने की तैयारी में हैं. असहमति और गठबंधन टूटने के बीच बड़ा अंतर है.

बिहार की राजनीति में भी यही समीकरण दिखाई देता है. चिराग पासवान, जीतन राम मांझी और उपेंद्र कुशवाहा जैसे नेता NDA का हिस्सा रहते हुए अपनी अलग पहचान बनाए रखना चाहते हैं. केंद्र के सामने आने वाले विवाद उन्हें अपनी बात रखने का अवसर दे सकते हैं. लेकिन किसी दल की वास्तविक रणनीति का आकलन उसके बयानों के साथ-साथ उसके फैसलों और गठबंधन में निभाई जा रही भूमिका से ही किया जा सकता है.

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