
27 अक्टूबर को इजराइल में 120 सदस्यीय संसद नेसेट के लिए मतदान हो रहा है. यह 7 अक्टूबर 2023 के हमास हमले और उसके बाद के गाजा युद्ध के बाद पहला आम चुनाव है. इसलिए यह चुनाव प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू के लिए केवल एक चुनाव नहीं, बल्कि उनकी सत्ता, सुरक्षा-रिकॉर्ड और राजनीतिक भविष्य पर जनमत संग्रह जैसा है.
1. सत्ता बचाने की सबसे बड़ी परीक्षा
नेतन्याहू इजराइल के सबसे लंबे समय तक प्रधानमंत्री रहे नेता हैं और पिछले 17 में से 15 साल से अधिक समय तक सत्ता में रहे हैं. लेकिन इस बार उनकी लिकुड पार्टी और उनका दक्षिणपंथी-धार्मिक गठबंधन 61 सीटों का बहुमत हासिल कर पाएगा या नहीं, यही मुख्य सवाल है.
सर्वे के मुताबिक नेतन्याहू के गठबंधन को 49 से 55 सीटों का अनुमान है, जो नेसेट में बहुमत के लिए जरूरी 61 सीटों से कम है. इसका मतलब है कि उन्हें छोटे दलों के समर्थन पर निर्भर रहना पड़ सकता है.
2. 7 अक्टूबर हमले की जवाबदेही
7 अक्टूबर 2023 को हमास के नेतृत्व में हुए हमले को इजराइल के इतिहास का सबसे घातक हमला माना जाता है. इसके बाद गाजा में युद्ध, ईरान के साथ तनाव और क्षेत्रीय संकट ने देश की सुरक्षा-नीति को चुनावी मुद्दा बना दिया है.
नेतन्याहू के आलोचक उन पर यह हमला रोकने में चूक और सुरक्षा व्यवस्था में विफलता का आरोप लगा रहे हैं. वहीं नेतन्याहू खुद को इजराइल की सुरक्षा सुनिश्चित करने वाला सबसे अनुभवी नेता पेश कर रहे हैं.
3. विपक्ष के सामने गदी आइजनकोट
इस चुनाव में नेतन्याहू की सबसे बड़ी चुनौती पूर्व सेना प्रमुख गदी आइजनकोट के नेतृत्व वाले विपक्षी गठबंधन से है. आइजनकोट को दक्षिणपंथी और केंद्र के कई वोटरों का समर्थन मिल रहा है, जिससे चुनाव बेहद करीबी बन गया है.
विपक्ष नेतन्याहू की सरकार के बाद ‘नए युग’ और सुधार का वादा कर रहा है. लेकिन इजराइल की चुनावी व्यवस्था में कई छोटे दल होने के कारण किसी भी गठबंधन के लिए सरकार बनाना आसान नहीं होगा.
4. भ्रष्टाचार मुकदमा और वैश्विक अलगाव
नेतन्याहू 2019 से भ्रष्टाचार के आरोपों से जूझ रहे हैं. इसके अलावा गाजा युद्ध, पश्चिमी किनारे की नीति और अंतरराष्ट्रीय कानूनी कार्रवाई के कारण इजराइल बढ़ती वैश्विक आलोचना और अलगाव का सामना कर रहा है.
इस चुनाव का नतीजा यह तय करेगा कि इजराइल अंतरराष्ट्रीय समुदाय के साथ कड़ा रुख बनाए रखेगा या कूटनीतिक संबंध सुधारने की कोशिश करेगा. यही कारण है कि इस चुनाव का असर इजराइल से बाहर भी महसूस होगा.
5. गठबंधन का गणित नेतन्याहू के पक्ष में हो सकता है
अगर न नेतन्याहू का गठबंधन और न ही विपक्ष 61 सीटें पाता है, तो सरकार बनाने की प्रक्रिया लंबी हो सकती है. ऐसी स्थिति में नेतन्याहू तब तक कार्यवाहक प्रधानमंत्री बने रह सकते हैं, जब तक नया सरकार प्रमुख चुना न जाए.
यानी भले ही विपक्ष को थोड़ी बढ़त मिले, नेतन्याहू के लिए राजनीतिक गतिरोध अनुकूल हो सकता है. इसीलिए वे चाहते हैं कि लिकुड बड़ी पार्टी के रूप में उभरे और सरकार बनाने का पहला मौका उन्हें मिले.
निष्कर्ष
इजराइल चुनाव 2026 नेतन्याहू के लिए एक ऐतिहासिक जोखिम और अवसर, दोनों है. अगर उनका गठबंधन बहुमत पाता है, तो वे युद्ध के बाद अपनी सत्ता को मजबूत करेंगे; लेकिन हार की स्थिति में उनकी दशकों पुरानी प्रभावशाली राजनीति को बड़ा झटका लग सकता है. नतीजा चाहे कुछ भी हो, यह चुनाव इजराइल की सुरक्षा नीति, गाजा संकट, धर्म-राज्य के रिश्ते और अंतरराष्ट्रीय कूटनीति की दिशा तय करेगा.






